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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

तप की महिमा

ओउम् | पवित्रं ते विततं ब्रह्मणस्पते प्रभुर्गात्राणि पर्य्येषि विश्‍व‌तः
अतप्‍त‌तनूर्न तदामो अश्‍नुते श्रृतास इद्वहन्तस्तत् समाशत ||
ऋग्वेद 9|83|1

शब्दार्थ -

हे ब्रह्मणस्पते..............हे तपोरक्षक प्रभो !
ते..........................तेरा
पवित्रम्.....................पवित्र नियम
विततम्....................सर्वत्र फैला हुआ है | तू
प्रभुः.......................सर्वसमर्थ
विश्‍व‌तः....................सब प्रकार से
गात्राणि....................श‌रीरों को
परि+एषि..................व्याप्त करता है |
अतप्ततनूः.................अतपस्वी शरीरवाला (कच्चे तन वाला)
आमः......................कच्चा मनुष्य
तत्........................उसको
न..........................नहीं
अश्‍नुते....................प्राप्त करता |
श्रतासः....................पक्के
इत्........................ही
तत्.......................उसे
वहन्तः....................धारण करते हुए
समाशत...................उत्तम रीति से भोग रहे हैं |

व्याख्या ‍-

भगवान के पवित्र नियम सर्वत्र व्याप्त हैं | वह हमारे अङ्ग अङ्ग में सङ्ग लगा हुआ है, किन्तु उसका दर्शन नहीं हो रहा, क्योंकि - अतप्‍त‌तनूर्न तदामो अश्‍नुते = कच्चे तनवाला, कच्चा मनुष्य उस विस्तृत, सर्वत्र वितत पवित्रता को नहीं पा सकता | सुवर्ण तभी कुन्दन बनता है जब वह आग में तपाया जाता है | जो तप की भट्टी में तपाया नहीं गया, पकाया नहीं गया, वह कैसे उस रस को पाए ? कच्चे घड़े में पानी नहीं डाला जाता | पानी डालने के लिए उसे आवे में पकाना पड़ता है | इसी प्रकार आनन्द भरने के लिए शरीर को तपाना पड़ेगा | आत्मा=आम आत्मा=कच्चे आत्मा को पक्का करना पड़ेगा, तभी इसमें ब्रह्मानन्द रस डाला जा सकेगा | तप की महिमा में वेद (ऋ. 10|154|2) कहता है -

तपसा ये अनाधृष्यास्तपसा ये स्वर्ययुः | तपो ये चक्रिरे महस्ताँश्‍चिदेवापि गच्छतात् |

तप के कारण जो अनाधृष्य=किसी से न धमकाये जानेवाले हैं, तप के कारण जो आनन्द को प्राप्त हुए हैं, जिन्होंने महान तप किया है, भगवान उन्हें प्राप्त होता है |
ऋग्वेद (10|154|4) में कहा -

ये चित्पूर्व ऋतसाप ऋतावान ऋतावृधः | पितृन्तपस्वतो यम ताँश्‍चिदेवापि गच्छतात् |

जो भी ऋत से सम्बन्ध रखने वाले, ऋत का सत्कार करने वाले और ऋत को बढ़ानेवाले हैं, जो तपस्वी, ज्ञानी हैं, हे नियन्तः ! तू उन्हें भी प्राप्त हो | इस प्रकार तप की और भी बहुत महिमा वेद-शास्त्र में वर्णित की गई है, जो यथार्थ‌ है | तपस्वी से सभी दबते हैं, कोई भी उसके सामने धृष्टता नहीं कर सकता | तप का अर्थ है ज्ञानपूर्वक कर्मों का अनुष्ठान |
तैत्तिरीयोपनिषत् (1|9) में कहा है -

ऋतं च स्वाध्यायप्रवचने च | सत्यं च स्वाध्यायप्रवचने च | तपश्‍च स्वाध्यायप्रवचने च | दमश्‍च‌‌ स्वाध्यायप्रवचने च | श‌मश्‍च‌‌ स्वाध्यायप्रवचने च | अग्नयश्‍च‌ स्वाध्यायप्रवचने च | अग्निहोत्रं च स्वाध्यायप्रवचने च | अतिथियश्‍च‌ स्वाध्यायप्रवचने च | मानुषं च‌ स्वाध्यायप्रवचने च | प्रजा च‌ स्वाध्यायप्रवचने च | प्रजनश्‍च‌‌ स्वाध्यायप्रवचने च | प्रजातिश्‍च‌ स्वाध्यायप्रवचने च | सत्यमिति सत्यवचा राधीतरः तप इति तपोनित्यः पौरुशिष्टिः स्वाध्यायप्रवचने एवेति नाको मौद्‍ग‌ल्यः | तद्धि तपस्तद्धि तपः ||

ऋत और अध्ययनाध्यापन तप हैं | सत्य और सत्य का पढ़ना-पढ़ाना तप है | तप और तप का करना-कराना तप है | शम और शान्त रहना और रखना तप है | ज्ञानाग्नियाँ और जानना तथा जनाना तप है | अग्निहोत्र और वेद का पढ़ना-पढ़ाना तप है | अतिथियज्ञ और ज्ञानग्रहण तथा ज्ञानदान तप है | सन्तान, सन्तान की उत्पत्ति तथा सन्तान में उत्कर्ष‌ इन बातों का जानना-जतलाना तप है | सत्यवादी राथीतर के मत में सत्य ही तप है | तपःपरायण पौरुशिष्टि तप को ही तप मानते हैं | मुद्‍गल के सन्तान नाक का कथन है कि स्वाध्याय-प्रवचन ही तप है | यही तप है, यही तप है |

सत्यवादी राथीतर का मत बताने से पूर्व ऋत आदि सभी तपों के साथ स्वाध्याय-प्रवचन‌ को भी लिया है और अन्त में फिर स्वाध्याय-प्रवचन को ही तप बताया है | इसका मर्म यह है कि स्वाध्याय और प्रवचन के बिना सारे तप अधूरे हैं, स्वाध्याय और प्रवचन से वे पूरे बनते हैं ; अतः स्वध्याय और प्रवचन मुख्य तप हैं | मनु जी का कहना है कि - जो जो नित्यप्रति स्वाध्याय करता है, वह नख से शिखा तक तप करता है | ज्ञान ही परम तप है, अतः जो तप की भट्टी में ‍- स्वाध्याय-प्रवचन की ज्वाला में जलकर किल्बिषशून्य हो गये हैं, वे ऋतास इद्वहन्तस्तस्तमाशत =पक्के होकर उसे धारते हुए उसे प्राप्त करते हैं | तप से अपने को उज्जवल, विमल, निर्मल बनाकर उसको आत्मसात् करनेवाले ही उस आनन्द‌ को प्राप्त करते हैं |

स्वामी वेदानन्द तीर्थ सरस्वती
(स्वाध्याय-सन्दोह से साभार)