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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

अथ वेदविषयविचारः (3)

..गतांक से आगे -

..भाषार्थ - उनमें से दूसरा कर्मकाण्ड विषय है, सो सब क्रिया प्रधान ही होता है | जिसके बिना विद्याभ्यास और ज्ञान पूर्ण नहीं हो सकते, क्योंकि मन का योग बाहर की क्रिया और भीतर के व्यवहार में सदा रहता है | वह अनेक प्रकार का है परन्तु उसके दो भेद मुख्य हैं - एक परमार्थ , दूसरा लोकव्यवहार | अर्थात् पहिले से परमार्थ और दूसरे से लोकव्यवहार की सिद्धि करनी होती है | प्रथम जो परम पुरुषार्थरूप कहा उसमें परमेश्‍वर की (स्तुति) अर्थात् उसके सर्वशक्तिमत्त्वादि गुणों का कीर्तन, उपदेश और श्रवण करना, (प्रार्थना) अर्थात् जिस करके ईश्वर से सहायता की इच्छा करनी, (उपासना) अर्थात् ईश्‍वर के स्वरूप में मग्न होके उसकी सत्यभाषणादि आज्ञा का यथावत् पालन करना | सो उपासना वेद और पातञ्जल योगशास्त्र की रीति से करनी चाहिये | तथा धर्म का स्वरूप न्यायाचरण है | 'न्यायाचरण ' उसको कहते हैं जो पक्षपात को छोड़ के सब प्रकार से सत्य का ग्रहण और असत्य का परित्याग करना | इसी धर्म का जो ज्ञान और अनुष्ठान का यथावत् करना है सो ही कर्म‌काण्ड का प्रधान भाग है | और दूसरा यह कि जिससे पूर्वोक्त अर्थ, काम और उनकी सिद्धि करने वाले साधनों की प्राप्ति होती है |

सो इस भेद को इस प्रकार से जानना कि जब मोक्ष अर्थात् सब दुखों से छूट के केवल परमेश्‍वर की ही प्राप्ति के लिये धर्म से युक्त सब कर्मों का यथावत् करना, वही निष्काम मार्ग कहलाता है, क्योंकि इसमें संसार के भोगों की कामना नहीं की जाती | इसी कारण से इसका फल अक्षय है | और जिसमें संसार के भोगों की इच्छा से धर्मयुक्त काम किये जाते हैं, उनको सकाम कहते हैं | इस हेतु से इनका फल नाशवान् होता है | क्योंकि सब कर्मों को करके इन्द्रिय भोगों को प्राप्त होके जन्म मरण से नहीं छूट सकता |

अग्निहोत्र से लेके अश्‍वमेध पर्यन्त जो कर्मकाण्ड हैं, उसमें चार प्रकार के द्रव्यों का होम करना होता है - एक सुगन्धयुक्त , जो कस्तूरी केश‌रादि हैं, दूसरा मिष्टगुणयुक्त, जो कि गुड़ और सहत आदि कहाते हैं, तीसरा पुष्टिकारकगुणयुक्त, जो घृत, दुग्ध और अन्न आदि हैं, और चौथा रोगनाशकगुणयुक्त जो कि सोमलतादि औषधि आदि हैं | इन चारों का परस्पर शोधन, संस्कार और यथायोग्य मिला के अग्नि में युक्तिपूर्वक जो होम किया जाता है , वह वायु और वृष्टिजल की शुद्धि करने वाला होता है | इससे सब जगत् को सुख होता है | और जिसको भोजन, छादन, विमान आदि यान, कलाकुशलता, यन्त्र और सामाजिक नियम होने के लिये करते हैं, वह अधिकांश से कर्त्ता को ही सुख देने वाला होता है |

..भाषार्थ - इसमें पूर्वमिमांसा धर्मशास्त्र की भी सम्मति है - (द्रव्य.) एक तो द्रव्य, दूसरा संस्कार, और तीसरा उनका यथावत् उपयोग करना, ये तीनों बातें यज्ञ‌ के कर्त्ता को अवश्‍य करनी चाहिये | सो पूर्वोक्त सुगन्धादियुक्त चार प्रकार के द्रव्यों का अच्छी प्रकार संस्कार करके अग्नि में होम करने से जगत् का अत्यन्त उपकार होता है | जैसे दाल और शाक आदि में सुगन्धद्रव्य और घी इन दोनों को चमचे में अग्नि पर तपा के उनसे छोंक देने से वे सुगन्धित हो जाते हैं, क्योंकि उस सुगन्ध द्रव्य और घी के अणु उनको सुगन्धित करके दाल आदि पदार्थों को पुष्टि और रुचि बढ़ाने वाले कर देते हैं, वैसे ही यज्ञ से जो भाफ उठता है, वह भी वायु और वृष्टि के जल को निर्दोष और सुगन्धित करके सब जगत् को सुखी करता है, इससे वह यज्ञ परोपकार के लिये ही होता है |

इसमे ऐतरेय ब्राह्मण का प्रमाण है कि - (यज्ञोSपि त‌.) अर्थात् जनता नाम जो मनुष्यों का समूह है, उसी के सुख के लिये यज्ञ होता है
, और संस्कार किये द्रव्यों का होम करने वाला जो विद्वान् मनुष्य है, वह भी आनन्द को प्राप्त होता है, क्योंकि जो मनुष्य जगत् का जितना उपकार करेगा उसको उतना ही ईश्‍वर की व्यवस्था से सुख प्राप्त होगा | इसलिये यज्ञ का अर्थवाद* यह है कि अनर्थ दोषों को हटा के जगत् में आनन्द को बढ़ाता है परन्तु होम के द्रव्यों का उत्तम संस्कार और होम को करने वाले मनुष्यों को होम करने की श्रेष्ठ विद्या अवश्य होनी चाहिये | सो इसी प्रकार के यज्ञ करने से सबको उत्तम फल प्राप्त होता है, विशेष करके यज्ञकर्त्ता को, अन्यथा नहीं |

(क्रमशः)

(महर्षि दयानन्द कृत ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका से संक्षिप्त में उद्धृत)