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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

उपासना का वैदिक स्वरूप(4) लेखक श्री स्वामी आत्मानन्द सरस्वती जी

* ओउम् *

(गतांक से आगे) -

भक्त ने प्रयत्न करके भगवान के आनन्द को प्राप्त कर लिया | तो इस प्राप्ति के अनन्तर उसका कोई कर्त्तव्य शेष तो नहीं रह जाता इस प्रश्न का उत्तर देने के अनुकूल भाव आगे के मन्त्र में प्रकट किये गये हैं |

मन्त्र है : -
"एहि स्तोमां" अभिस्वराभि गृणीह्यारूव |
ब्रह्मच नो वसोसचेन्द्र यज्ञं च वर्धय ||1|10|4||

अर्थ - (वसोः) हे सब प्रकार के आधार अथवा सब के अन्दर बसने वाले प्रभो ! (एहि) ह्रदय में पधारिए (स्तोमां) स्तोत्रों का (अभिस्वर) उपदेश कीजिए (इन्द्र) हे ऐश्‍वर्य भण्डार (नः) हमारे लिए (ब्रह्म) ब्रह्मज्ञान (सचा यज्ञं च) और उसके सहित यज्ञ को (अभिगृणीहि) प्रकाशित कीजिए (वर्धयच) और उन दोनों को बढ़ाइए |

प्रभु के ब्रह्मज्ञान को प्राप्त कर उपासक इतने से ही अपने कर्त्तव्य की समाप्‍ति नहीं समझता | वैदिक मर्यादा के अनुसार वह इस प्राप्ति के अनन्तर भगवान से एक और प्रार्थना करता है | वह कहता है 'प्रभो ! मैं आपको सबके अन्दर व्यापक देख रहा हूं और देख रहा हूँ कि यह सब जड़ चेतन जगत् आप के अन्दर ही निवास करता है | मैं पहले यह भी समझता था कि मैंने आपको पा लिया और मैं आप का हो गया | पर अन्तर्दृष्टि से देखा तो यह देखा कि यह जो जड़ चेतन जगत् आपके अन्दर है और यह सब ही आपका है | मैं अपने आपको ही आपका अमृत पुत्र समझ बैठा था परन्तु इस दृष्य को देख कर आंखें खुलीं कि यह तो सब प्राणी जगत् आप का ही अमृत पुत्र है और इस नाते से सब प्राणी मेरे बन्धु हैं और इसलिए अपने उद्धार के साथ-साथ उन का उद्धार भी मेरा कर्त्तव्य है | यद्यपि उद्धार सबका आपके ही हाथों में है परन्तु आप अपने उपासकों के द्वारा भी दूसरों का कल्याण करते हैं | आपने अपना पवित्र ज्ञान देकर मेरा कल्याण किया है अब दूसरी प्रार्थना यह ही है कि ब्रह्मज्ञान के साथ मेरे अन्दर यज्ञ की भावना को भी जागृत कीजिए | मैं ब्रह्मज्ञान पाकर स्वार्थी बन कर पड़ा ही न रहूँ अपने उद्धार के साथ दूसरे के लिए भी शक्ति भर उद्योग करूं | विश्‍व कल्याण की भावना मेरे अंतःकरण में जागृत हो | और जब तक शरीर के साथ मेरा सम्बंध है यज्ञ के पवित्र कार्य को निभाता हुआ विश्व कल्याण के लिए जीऊं | इसलिए हे प्रभो -

उक्थमिन्द्राय शंस्यं वर्धनं पुरु निष्षिधे |
शक्रो यथा सुतेषुणो रारणत् सख्येषु च ||1|10|5||

अर्थ - (यथा) जिस प्रकार (शक्रो) सर्व शक्तिमान् आप (सुतेषु) अपने उत्पन्न किये प्राणीमात्र को (च सख्येषु) और मित्र भावना का व्यवहार करते है उसको विशेष रूप से (रारणत्) उपदेश करते हैं, उसी प्रकार, (इन्द्राय) ऐश्‍वर्य के इच्छुक जीव के लिए (श्ंस्यम्) उपदेश के योगय (वर्धनम्) उसके बढ़ाने वाले (उक्थम्) स्तोत्र को (पुरुनिष्षिधे) मैं भी बहुत विधियों से सिद्ध करूं |

भगवन् के प्राणी मात्र पुत्र हैं | उन सबके कल्याण के लिए भगवान् सदा ही उपदेश देते रहते हैं | परन्तु वह उपदेश पड़ता उन्हीं कानों में है जो भगवान् के सखा हैं, उससे प्रेम करते हैं | भगवान के गुणों से अपनी आत्मा को अलंकृत करना ही उनके सखित्व में आना है | और ऐसा होने पर ही उपासक को भगवान् के उपदेश को सुनने का अधिकार प्राप्त होता है | बस प्राणियों को उसी अधिकार को प्राप्त कराने में मैं उनका सहयोगी बन सकूं | इस यज्ञ की पवित्र भावना से मुझे भावित कर दीजिए | ऐश्‍वर्य के लिए अभिलाषी जीवों के लिए उपदेश करने योग्य ऐसे स्तोत्र मैं उन्हें पढ़ा सकूं जिससे वे बढ़ सकें और उनका अधिकार उन्हें प्राप्त हो सके | इसके लिए जो भी अनेक प्रकार की विधिएं मुझे प्रयोग में लानीं पड़ें, वैसा करता हुआ उनके कार्य को सिद्ध करने में मैं समर्थ हो सकूं |

(क्रमशः)