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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

महात्मा नारायण स्वामी जी की 'केन सूक्त' पर टीका - ‍परिशिष्ट (6)

ऊर्ध्वो नु सृष्टा3स्तिर्यङ् नु सृष्टाः 3 सर्वा दिशः पुरुष आबभूवां 3 |
पुरं यो ब्रह्मणो वेद यस्थाः पुरुष उच्यते ||28||

अर्थ - (पुरुषः ऊर्ध्वः नु) पुरुष (व्यापक ईश्‍व‌र) ऊपर निश्‍च‌य से (सृष्‍टाः) फैला हुआ* (परिपूर्ण) है (तिर्यक नु सृष्‍टाः) निश्‍च‌‌य तिरछा फैला हुआ है |(पुरुषः सर्वा दिशः आबभूव) पुरुष सब दिशाओं में है | (यः ब्राह्मणः पुर वेद) जो ब्रह्म की पुरी को जानता है |(यस्याः पुरुष उच्यते) उसी को पुरुष कहते हैं |

व्याख्या

ईश्वर को सर्वव्यापक होने से पुरुष कहते हैं | शरीर से बाहर समस्त ब्रह्माण्ड और शरीर के अन्तर्गत समस्त शरीर उसकी पुरी या नगरी कही गई है | इसी नगरी के ज्ञाता जीव को पुरुष कहते हैं | भाव इसका यह हुआ कि पुरुष कहलाने का अधिकारी वही मनुष्य हो सकता है जो ब्रह्म के व्याप‌कत्व का अनुभव रखता हो | इसीलिए उपनिषदों में पुरुष का अर्थ किया गया है - "पुरु (पहले)+उष दाहे" अर्थात् जो पहले पाप को जला कर नष्ट कर दे, वही पुरुष कहा जा सकता है | देखो (बृहदारण्यकोपनिषद् 1|4|1) पुरु+स = बहुत से सीने वाला = पुरुषार्थ करने वाला भी पुरुष का अर्थ किया जाता है |

यो वै तां ब्रह्मणो वेदाSमृतेनावृतां पुरम |
तस्मै ब्रह्म च ब्राह्माश्‍च चक्षुः प्राणं प्रजां ददुः ||29||

अर्थ - (यः वैः अमृतेन आवृतां तां ब्रह्मणः पुरं वेद) जो निश्चय के साथ अमृत से परिपूर्ण ब्रह्म की पुरी को जानता है (तस्मै ब्रह्म ब्राह्माः च चक्षूः प्राणं प्रजां च ददुः) उसको ब्रह्म और ब्रह्म के उत्पन्न किए हुए सूर्यादि देव चक्षु प्राण और प्रजा देते हैं |

व्याख्या

चक्षु उपलक्षण के तौर पर है | मतलब समस्त इन्द्रियों से है | प्राण आयु का वाचक है | प्राण (श्‍वास) ही पर आयु की मात्रा निर्भर होती है | प्रजा सन्तान को कहते हैं | ब्रह्म ज्ञान का फल इस मन्त्र में बतलाया गया है कि ब्रह्म ज्ञानी स्वस्थ इन्द्रियों वाला पूर्ण आयु का भोक्ता और सन्तान प्राप्ति के सुख से सुखी हुआ करता है |

न वै तं चक्षुर्जहाति न प्राणो जरसः पुरा |
पुरं यो ब्रह्मणो वेद यस्याः पुरुष उच्यते ||30||

अर्थ - (तं जरसः पुरा चक्षुः न‌ ज‌हाति न वै प्राणः) उसको बुढ़ापे से पहिले न‌ आँख छोड़ती है और न प्राण (यः ब्रह्मणः पुरं वेद) जो ब्रह्म की पुरी को जानता है | (यस्याः पुरुष उच्यते) जिससे वह पुरुष कहा जाता है |

व्याख्या

आंख और प्राण के न छोड़ने का मतलब यह है कि बुढ़ापे से पहले न इन्द्रियों की शक्ति का ह्रास होता है और न आयु में न्यूनता | मतलब इसका यह हुआ कि ब्रह्मज्ञानी पूर्ण आयु का भोग करता है और अन्त तक स्वस्थ रहता है |

अष्टचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या |
तस्यां हिरण्ययः कोशः स्वर्गो ज्योतिषावृतः ||31||

अर्थ - (अष्टचक्रा, नव द्वारा अयोध्या देवानां पूः)
आठ चक्र और नौ द्वारों वाली अयोध्या देवों की पुरी है, (तस्यां हिरण्ययः कोशः) उसमें प्रकाष वाला कोष है , (स्वर्गः ज्योतिषा आवृतः) जो आनन्द और प्रकाश से युक्त है |

व्याख्या

मनुष्य का शरीर ही देवों की अयोध्या पुरी है | इसमें आठ चक्र हैं |

आठ् चक्र Plexes - नाड़ी गुच्छक (Ganglia)** शरीरस्थ मेरुदण्ड के दाहिने बाँये तथा सिर, गले छाती आदि अनेक स्थानों पर होते हैं | ये गुच्छक परस्पर तन्तुओं (Filaments) द्वारा नथे रहते हैं और मस्तिष्क तथा मेरु विभाग से ज्ञान और शक्ति तन्तुओं (motor and censory nerves) द्वारा सम्बन्धित रहते हैं | इन्हीं गुच्छकों से अगणित तन्तु निकल कर शरीर के अवयवों और रुधिर की नालियों इत्यादि में जाल की तरह फैले रहते हैं | क‍ईं स्थानों पर ये तन्तु एकत्रित हो जाते हैं | उन्हीं को नाड़ी ग्रन्थि या चक्र (Plexus) कहते हैं |

ये चक्र दस कहे जाते हैं, परन्तु उनमें से मुख्य आठ हैं :- (1) मूलाधार चक्र - रीढ़ की हड्डी के नीचे गुदा के पास है | इसमें उत्तेजना प्राप्त होने से वीर्य स्थिर और मनुष्य उर्ध्वरेता होता है | (2) स्वाधिष्ठान चक्र - मूलाधार से चार अंगुल ऊपर है | इसके उत्तेजित होने से प्रेम और अहिंसा के भाव जागृत होते हैं | शरीर के रोग और थकावट दूर होकर स्वस्थता लाभ होती है | (3)मणिपूरक चक्र - ठीक नाभि स्थान में है | इसमें उत्तेजना आने से शरीर संयत रहता है | (4) सूर्य चक्र - नाभि से कुछ ऊपर ह्रदय की धुकधुकी के ठीक पीछे मेरुदण्ड् के दोनो और इसका स्थान है | इसका अधिकार भीतरी सभी अवयवों पर है | प्राण का खजाना यहीं रहता है | इस पर चोट लगने से मनुष्य तत्काल मर जाता है | (पहलवान इसी पर हल्की चोट लगाकर प्रतिद्वन्दी को बलहीन कर देता है) | प्राण के लिए मस्तिष्क को भी इसी का आश्रय लेना पड़ता है | यह पेट का मस्तिष्क ही समझा जाता है | (5) अनाहत चक्र - ह्रदय स्थान में है | ह्रदय के समस्त व्यापार इससे नियमित होते हैं | ह्रदय में बल, प्रेम और भक्ति इसमें हुई उत्तेजना के फल होते हैं | (6) विशुद्धि चक्र - कण्ठ में है | कण्ठ के मूल में जहाँ दोनों और की हड्डियां आती हैं उनके बीच में अँगुष्ठ मात्रा वाला नरम स्थान इस चक्र का स्थान है | इस पर संयम करने से बाह्य जगत् की विस्मृति और आन्तरिक कार्य का प्रारम्भ होता है | तारुण्य और उत्साह प्राप्‍त होता है | (7) आज्ञा चक्र - दोनों भवों के मध्य में है | इसमें उत्तेजना आने से शरीर पर प्रभुत्व, नाड़ी और नसों में स्वाधीनता आती है और यह अनुभव होने लगता है कि आत्मा की आज्ञा ही से समस्त शरीर व्यापार चल रहा है | (8) सहस्त्रार चक्र - तालु के स्थान के ऊपर मस्तिष्क में है और समस्त शक्तियों का केन्द्र है |

नव (9) द्वार - दो आँख, दो कान, दो नाक, एक मुख, एक मल द्वार और एक मलमूत्र कुल नव द्वार |

इस प्रकार् आठ चक्र और नव द्वार वाली अयोध्या नगरी में ह्रदय ही प्रकाश-युक्त कोष है |

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सृष्ट" के अनेक अर्थों में "फैला हुआ" (Pour down) अर्थ भी है | देखो संस्कृत इंगलिश कोष आप्टे कृत |

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A Ganglion is a mass of nervous matter including nervous cells.

(क्रमशः)