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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

वेदो में विज्ञान व शिल्पविद्या के रहस्य (16)

स नो वृषन्न्मुं चरुं सत्रादावन्नपावृधि | अस्मभ्यमप्रतिष्कुतः ||6||
ऋग्वेद 1|7|6||

पदार्थ - हे (वृषन्) सुखों के वर्षाने और (सत्रादावन्) सत्यज्ञान को देनेवाले (सः) परमेश्‍वर ! आप (अस्मभ्यम्) जोकि हम लोग आपकी आज्ञा वा अपने पुरुषार्थ में वर्त्तमान हैं, उनके लिये (अप्रतिष्कुतः) निश्चय करानेहारे (नः) हमारे (अमुम्) उस आनन्द करनेहारे प्रत्यक्ष मोक्ष का द्वार (चरुम्) ज्ञानलाभ को (अपावृधि)खोल दीजिये ||6||

तथा हे परमेश्‍वर ! जो यह आपका बनाया हुआ (वृषन्)जल को वर्षाने और (सत्रादावन्) उत्तम उत्तम पदार्थों को प्राप्त करनेवाला (अप्रतिष्कुतः)अपनी कक्षा में ही स्थिर रहता हुआ सूर्य्य, (अस्मभ्यम्) हम लोगों के लिये, (अमुम्) आकाश में रहनेवाले इस (चरुम्) मेघ को (अपावृधि) भूमि में गिरा देता है ||6||

भावार्थ - जो मनुष्य अपनी दृढ़ता से सत्यविद्या का अनुष्ठान और नियम से ईश्‍वर की आज्ञा का पालन करता है उसके आत्मा में से अविद्या रूपी अन्धकार का नाश अन्तर्यामी परमेश्‍वर कर देता है, जिससे वह पुरुष धर्म और पुरुषार्थ को कभी नहीं छोड़ता ||6||

तुञ्जेतुञ्जे य उत्तरे स्तोमा इन्द्रस्य वज्रिणः |
न विन्धे अस्य सुष्टुतिम् ||7||
ऋग्वेद 1|7|7||

पदार्थ - (ये) जो (वज्रिणः) अनन्त पराक्रमवान् (इन्द्रस्य) सब दुखों के विनाश करनेहारे (अस्य) इस परमेश्‍वर के (तुञ्जेतुञ्जे) पदार्थ पदार्थ के देने में (उत्तरे) सिद्धान्त से निश्चित किये हुए (स्तोमा) स्तुतियों के समूह हैं उनसे भी (अस्य) परमेश्‍वर की (सुष्टुतिम्) शोभायमान स्तुति का पार मैं जीव (न) नहीं (विन्धे) पा सकता हूं ||7||

भावार्थ - ईश्‍वर ने इस संसार में प्राणियों के सुख के लिये इन पदार्थों में अपनी शक्ति से जितने दृष्टान्त वा उनमें जिस प्रकार की रचना और अलग अलग उनके गुण तथा उनसे उपकार लेने के लिये रक्खे हैं, उन सब के जानने को मै अल्पबुद्धि पुरुष होने से समर्थ कभी नहीं हो सकता और न कोई मनुष्य ईश्‍वर के गुणों की समाप्ति जानने को समर्थ है, क्योंकि जगदीश्‍वर अनन्त गुण और अनन्त सामर्थ्यवाला है, परन्तु मनुष्य उन पदार्थों से जितना उपकार लेने को समर्थ हो उतना सब प्रकार से लेना चाहिये ||7||

वृषा यूथेव वंसगः कृष्टीरियर्त्योजसा | ईशानो अप्रतिष्कुतः ||8||
ऋग्वेद 1|7|8||

पदार्थ - जैसे (वृषा) वीर्य्यदाता रक्षा करनेहारा (वंसगः) यथायोग्य गाय के विभागों को सेवन करनेहारा बैल (ओजसा) अपने बल से (यूथेव) गाय के समूहों को प्राप्त होता है वैसे ही (वंसगः) धर्म के सेवन करनेवाले पुरुष को प्राप्त होने और (वृषा) शुभ गुणों की वर्षा करनेवाला (ईशानः) ऐश्‍वर्यवान् जगत् का रचनेवाला परमेश्‍वर अपने (ओजसा) बल से (कृष्‍टीः) धर्मात्मा मनुष्यों को तथा (वंसगः) अलग अलग पदार्थों को पहुंचाने और (वृषा) जल वर्षानेवाला सूर्य्य (ओजसा) अपने बल से (कृष्‍टीः) आकर्षण आदि व्यवहारों को (इयर्ति) प्राप्त होता है ||8||

भावार्थ - इस मन्त्र में उपमा और श्‍लेषालंकार है | मनुष्य ही परमेश्‍वर को प्राप्त हो सकते हैं, क्योंकि वे ज्ञान की वृद्धि करने के स्वभाववाले होते हैं | और धर्मात्मा ज्ञानवाले मनुष्यों का परमेश्‍वर को प्राप्त होने का स्वभाव है | तथा जो ईश्‍वर ने रचकर कक्षा में स्थापन किया हुआ सूर्य्य है वह अपने सामने अर्थात् समीप के लोकों को चुम्बक पत्थर और लोहे के समान खींचने को समर्थ रहता है ||8||

य एकश्चर्ष‌णीनां वसूनामिरज्यति | इन्द्रः पञ्च क्षितीनाम् ||9||
ऋग्वेद 1|7|9||

पदार्थ - (यः) जो (इन्द्रः) दुष्ट शत्रुओं का विनाश करनेवाला परमेश्‍वर (चर्ष‌णीनाम्) मनुष्य (व‌सूनाम्) अग्नि आदि आठ निवास के स्थान, और (पञ्च) जो नीच मध्यम उत्तम उत्तमतर और उत्तमतम गुणवाले पांच प्रकार के (क्षितीनाम्) पृथिवी लोक हैं, उन्हीं के बीच (इरज्यति) ऐश्‍वर्य के देने और सब के सेवा करने योग्य परमेश्‍वर है वह (एकः) अद्वितीय और सब का सहाय करनेवाला है ||9||

भावार्थ - जो सबका स्वामी अन्तर्यामी व्यापक और सब ऐश्‍वर्य का देनेवाला, जिससे कोई दूसरा ईश्‍वर और जिसको किसी दूसरे की सहाय की इच्छा नही हे, वही सब मनुष्यों को इष्‍ट‌ बुद्धि से सेवा करने योग्य है | जो मनुष्य उस परमेश्‍वर को छोड़ के दूसरों को इष्‍ट‌ देव मानता है, वह भाग्यहीन बड़े बड़े घोर दुखों को सदा प्राप्त होता है ||9||

इन्द्रं वो विश्वतस्परि हवामहे जनेभ्याः | अस्माकमस्तु केवलः ||10||
ऋग्वेद 1|7|10||

पदार्थ - हम लोग जिस (विश्‍व‌तः) सब पदार्थों वा (जनेभ्याः) सब प्राणियों से (परि) उत्तम उत्तम गुणों करके श्रेष्‍ठ‌तर (इन्द्रम्) पृथिवी में राज्य देनेवाले परमेश्‍वर का (हवामहे) बार बार अपने ह्रदय में स्मरण करते हैं, वह परमेश्‍वर (वः) हे मित्र लोगो ! तुम्हारे और हमारे पूजा करने योग्य इष्‍टदेव (केवलः) चेतनमात्र स्वरूप एक ही है ||10||

भावार्थ - ईश्‍वर इस मन्त्र में सब मनुष्यों के हित के लिये उपदेश करता है - हे मनुष्यो ! तुम को अत्यन्त उचित है कि मुझको छोड़कर उपासना करने योग्य किसी दूसरे देव को कभी मत मानो, क्योंकि एक मुझको छोड़कर कोई दूसरा ईश्‍वर नहीं है | जब वेद में ऐसा उपदेश है तो जो मनुष्य अनेक ईश्‍वर वा उसके अवतार मानता है, वह सब से बढ़ा मूढ़ है ||10||

(महर्षि दयानन्द सरस्वती के ऋग्वेदभाष्य पर आधारित एवं संक्षेप में उद्दृत्)
THE SECRETS OF SCIENCE & TECHNOLOGY IN VEDAS (16)
(Based on & Reproduced from Maharshi Dayanand Saraswati's RIGVED BHASHYA)