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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

सब सत्यविद्दाओं का आदिमूल‌

ओ३म् |
देवाश्चित्ते असुर्य प्रचेतसो बृहस्पते यज्यिय वेदों भागमान‌शु: |
उस्त्रा इव ज्योतिषा महो विश्वेषामिज्जनिता ब्रह्मणामसि ||
ऋग्वेद 2.23.2

शब्दार्थ _
हे असुर्य्य = प्राणाधार
बृहस्पते = महान रक्षक
देवा:+ चित् = देव ही
ते = तुझ
प्रचेतस: = सर्वोत्कृष्ट चेतावनी देनेहारे
यज्यिम् = यज्ययोग्य
भागम् = भाग को
आनशु: = प्राप्त करते हैं
इव = जिस प्रकार
सूर्य्य: = सूर्य्य
ज्योतिषा = ज्योति से युक्त
मह: = महान्
उस्त्रा: = किरणों को उत्पन्न करता है
विश्वेषाम् = सम्पूर्ण
इत् = ही
ब्रह्मणाम् = ज्यानों का , वेदों का
जनिता = उत्पन्न कर‌ने वाला
असि = है

हे प्राणाधार ! महान रक्षक ! परमज्यानिन् भगवन् ! देव ही , ज्यानी ही, तुझ सर्वोत्कृष्ट चेतावनी देनेहारे के यज्ययोग्य भाग को प्राप्त करते हैं | जिस प्रकार सूर्य्य ज्योति से युक्त , प्रकाषमय महान् किरणों को उत्पन्न करता है वैसे ही तूं सम्पूर्ण ही ज्यानों का , वेदों का उत्पन्न करने वाला है |

(स्वामी वेदानन्द् तीर्थ सरस्वती)

व्याख्या :

ज्यान का मूल स्त्रोत भगवान है | वेद में कहा भी है _ स प्रथमों बृहस्पतिश्चिकित्वान् (य्0 7.15)
वह बह्स्पति = बड़े बड़े लोक लोकान्तरों का पालक सबसे पहला और मुख्य चिकित्वान् ज्यानी है | आदि ऋषि ने कहा _ प्रथम.................चिकित्वान् , आज के ऋषि ने कहा सब सत्य विद्दाओं...........का आदिमूल |

इसी बात को प्रकृ‌‌त मन्त्र के चौथे चरण में कहा विश्वेषामिज्जनिता ब्रह्मणामसि = सभी वेदों का उत्पादक है | जब वह प्रथम: चिकित्वान् है तो सचमुच वही ज्यानों का , ज्यानों के मूल वेदों का उत्पादक है |
किरणें समस्त संसार को प्रकाश देती हैं , किन्तु किरणें कहाँ से आती हैं ? सूर्य्य से , अत: सूर्य किरणों का उत्पादक हुआ | जहाँ भी प्रकाश है , वह सूर्य का है | इसी प्रकार जहाँ भी ज्यान है , वह भगवान का है | सचमुच ज्यान भगवान् की देन है | सूर्य्य एक स्थान पर रह कर प्रकाश‌ करता है , अत: सुर्य सम्बन्धी ग्रहों_उपग्रहों के उसी भाग पर प्रकाश होता है जो सूर्य के सम्मुख होते हैं | उनके दूसरे असम्मुख भागों पर प्रकाश नहीं होता , किन्तु भगवान सर्वत्र विराज‌मान हैँ , अत: इनका ज्यानप्रकाश सर्वत्र है | आज भी भगवान ज्यान दे रहे हैं ; जब कभी पाप की इच्छा होती है , अन्दर से उसके विरुद्ध ध्वनि उठती है , वह ध्वनि परमात्मा की है | ऋषि ने कहा है - 'जो पापाचरणेच्छा समय
में भय , शंका , लज्जा उत्पन्न होती है वह अन्तर्यामी परमात्मा की और से है |' (सत्यार्थप्रकाश द्वादश सम्मुलास‌)
वैसे तो सारा संसार - क्या पापी और क्या धर्मात्मा , क्या ज्यानी और क्या मूढ़ , सभी परमात्मा के दान का उपभोग करते हैं , हुई जो सारी प्रकृ‌ति उसी की सम्पत्ति , किन्तु ज्यानी ही वास्तविक आनन्द लेते हैं | किसी वस्तु का ज्यानपूर्वक स्वाद लेने में , उपभोग लेने में जो आनन्द है वह अज्यान अवस्था में कहाँ ? इसी भाव से वेद ने कहा - देवाश्चित्ते असुर्य प्रचेतसो बृहस्पते यज्यिय वेदों भागमान‌शु:- परमेश्वर केवल ज्यान का आदी स्त्रोत ही नहीं वह असुर्य = जीवनधार भी है | यज्यिय भाग = जीवनोपयोगी भाग जीवनाधार से ही मिलेगा | मनुष्य की विशेषता ज्यान से है | ज्यान भी भगवान् के पास , ज्यान से उपभुक्त होने वाले पदार्थ भी उसी के पास , अत: ऋषि ने कहा -

सब सत्यविद्दा और जो पदार्थ विद्दा से जाने जाते हैं उन सबका आदिमूल परमेश्वर है |‌

(स्वाध्याय सन्दोह से साभार्)