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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

महर्षि दयानन्द कृत आर्याभिविनयः से (42)

***ओउम्***

स्तुति विषय

स पूर्वया निविदा कव्यतायो रिमाः प्रजा अजनयन्मनूनाम्|
विवस्वता चक्षसा द्यामपश्च देवा अग्निं धारयन्द्रविणोदाम् ||42||
ऋ. 1|7|3|2||

व्याख्यान -‍ हे मनुष्यो । सो ही "पूर्वया, निविदा" आदि सनातन, सत्यता आदि गुणयुक्त परमात्मा था, अन्य कोई कार्य नहीं था | तब सृष्टि के आदि में स्वप्रकाशस्वरूप एक ईश्वर [ने] प्रजा की उत्पत्ति की ईक्षणता (विचार) और निकृष्ट दुःखविशेष नरक और सब दृश्यमान तारे आदि लोक लोकान्तर रचे हैं, जो ऐसा सच्चिदानन्द स्वरूप परमेश्वर है, उसी "द्रविणोदाम्" विज्ञानादि धन देने वाले को "देवाः" विद्वान लोग अग्नि जानते हैं | हम लोग उसी को भजें ||42||

From MAHARSHI DAYANAND SARASWATI's 'ARYABHIVINAY'