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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

परमेश्‍वर सबका अधिष्ठाता है

ओउम् | आतिष्‍ठ‌न्तं परि विश्‍वे अभूषञ्छ्रियो वसानश्‍चरति स्वरोचिः |
महत्तद्‍वृष्णों असुरस्य नामाSSविश्‍वरूपो अमृतानि तस्थौ |
ऋग्वेद 3|38|4||

शब्दार्थ -

आ+तिष्‍ठ‌न्तम्..............सब और रहने वाले भगवान् को
विश्‍वे.........................सभी
परि..........................सब प्रकार से
आभूषऩ्......................शोभित करते हैं | वह
स्वरोचिः......................स्वप्रकाश
श्रियः.........................शोभाओं को
वसानः........................धारण करता हुआ
चरति.........................संसार को चलाता है | उस
वृष्णः.........................सुखवर्षक
असुरस्य......................प्राणाधार भगवान का
तत्...........................वह
महत्.........................महान
नाम.........................यश है कि वह
विश्‍वरूपः.....................सर्वस्रष्‍टा
अमृतानि.....................अमृतों का, जीवों का, प्रकृति का
तस्थौ........................अधिष्‍ठाता है |

व्याख्या -

भगवान स्थित है, गतिरहित है, किसी एक स्थान पर स्थित नहीं, वरन् सर्वत्र उपस्थित है | सूर्य्य-चन्द्र आदि देवों की कान्ति और आभा देखने योग्य है | ये सारे आभावान पदार्थ भगवान् की शोभा बढ़ा रहे हैं, मानो उसकी महिमा गा रहे हैं | कहीं किसी को भ्रम न हो जाए कि यह सूर्य्य-चन्द्र आदि से प्रकाशित होता है, इस भ्रम का निवारण करने के लिए कहा कि वह स्वरोचिः स्वप्रकाश है | किसी दूसरे से प्रकाशित नहीं होता | स्वप्रकाश होने के कारण तथा इन सबका मूलप्रकाश होने के कारण सारी शोभाओं को वह धारे हुए है, अर्थात् संसार में जहाँ कहीं शोभा, कान्ति, तेज, उत्कर्ष‌ है - वह वास्तव में यहां और वेद में अन्यत्र अनेक स्थलों पर उसे 'वृषा' = सुखपूर्वक कहा है | जीवनोपयोगी सारी सामग्री का स्वामी वह है, अतः असुर=असु+र=प्राणदाता=जीवनदाता भी वही है |

सर्वा दिश ऊर्ध्वमधश्‍च तिर्य्यक् प्रकाशयन् भ्राजते यद्वनङ्वान् |
एवं स देवो भगवान् वरेण्यो योनिस्वभावानधितिष्‍ठत्येकः ||4||
यच्च स्वभावं पचति विश्‍व‌‌योनिः पाच्याँश्‍च सर्वान् परिणामयेद्यः |
सर्वमेतद्विश्‍वमधितिष्‍ठत्येको गुणांश्‍च सर्वान् विनियोजयेद्यः ||5|| - श्‍वेताश्‍वतरोपनिषद्

जिस प्रकार सूर्य्य ऊपर नीचे, तिरछी सभी दिशाओं को प्रकाशित करता हुआ चमकता है इसी भांति वह सर्वश्रेष्‍ठ भगवान् परमेश्‍वर अकेला ही कारण तथा स्वभावों का अधिष्‍ठाता है | जो विश्‍वयोनि=विश्‍वरूप स्वभाव का परिपाक करता है, और पकने योग्य सभी पदार्थ-धर्मों का यथायोग्य विनियोग करता है, वह अकेला ही इन सब का अधिष्‍ठाता है |

ऋषि ने वेदमन्त्र का आशय समझाने के लिए सूर्य्य का दृष्‍टान्त दिया है | सूर्य्य, पृथिवी आदि गृहों, चन्द्र आदि उपग्रहों को प्रकाशित करता हुआ स्वयं चमकता रहता है | इसी प्रकार परमदेव परमेश्‍वर श्रियो वसानश्‍चरित स्वरोचिः ..सब शोभाओं को धारण करता हुआ स्वप्रकाश है |

सूर्य्य एक स्थान पर र‌हता हुआ सभी सूर्य्यादि स्वमण्डलान्तर्गत ग्रहों, उपग्रहों, नक्षात्रादि प्रकाशाप्रकाश-पुंजों को अपने आकर्षण-विकर्षण-सामर्थ्य से नियन्त्रण में रखता है, अतः उसका प्रभाव अतीव विस्तृत होता हुआ भी संकुचित है, ससीम है | इस ब्रह्माण्ड में ऋग्वेद 9|114|3 के शब्दों में - सप्‍त‌ दिशो नाना सूर्य्याः - इन सात दिशाओं में अनेक‌ सूर्य्य हैं | प्रत्येक सूर्य्य का प्रभाव परिमित ही रहेगा, किन्तु अनन्त सूर्य्यों को प्रकाशित करनेवाले भगवान् की महिमा का क्या कहना ! सूर्य्य का प्रभाव अनित्य पदार्थों पर है , किन्तु भगवान् विश्‍वरूपो अमृतानि तस्थौ विश्‍वरूप सभी अमृतों=अविनाशी जीवों तथा प्रकृति का अधिष्‍ठाता है अर्थात् उनका यथायोगय विनियोग करने में समर्थ हैं |

क‍ईं मिमांसकों का मत है कि प्रत्येक वेदवाक्य में विधि या निषेध अवश्‍य होना चाहिए | इस सिद्धान्त को लेकर वे प्रत्येक वेदमन्त्र के साथ योग्यतानुसार 'ऐसा करो' या 'ऐसा न करो' लगा देते हैं | कदाचित् इसी भाव से श्‍वेताश्‍वतर महर्षि ने इसका भाव बताते हुए दूसरे स्थान पर कहा है -

यो योनिं योनिमधितिष्‍ठत्येको यस्मिन्निदं सं च वि चैति सर्वम् |
तमीशानं वरदं देवमीड्यं निचाय्येमां शान्तिमत्यन्तमेति || - 4|11

जो प्रत्येक कारण तथा स्थान पर अकेला ही अधिकार रखता है, जिसमें यह सब संयुक्त-वियुक्त होता रहता है, मनुष्य उस उत्तम दाता पूज्य ईश्‍वर देव को धारण करके इस शान्ति को पूरी तरह पाता है अर्थात् [उस] को धारण करना चाहिए |

स्वामी वेदानन्द तीर्थ सरस्वती
(स्वाध्याय-सन्दोह से साभार)