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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

अथ वेदविषयविचारः (4)

..गतांक से आगे -

..भाषार्थ ‍ - इसमें शतपथ ब्राह्मण का भी प्रमाण है कि - (अग्ने.) जो होम करने के द्रव्य अग्नि में डाले जाते हैं, उनसे धुंआ और भाफ उत्पन्न होते हैं, क्योंकि अग्नि का यही स्वभाव है कि पदार्थों में प्रवेश करके उनको भिन्न भिन्न कर देता है , फिर वे हलके होके वायु के साथ ऊपर आकाश में चढ़ जाते हैं, उनमें जितना जल का अंश है वह भाफ कहाता है, और जो शुष्क है वह पृथ्वी का भाग है, इन दोनों के योग का नाम धूम है | जब वे परमाणु मेघमण्डल में वायु के आधार से रहते हैं फिर वे परस्पर मिल के बादल होके उनसे वृष्‍टि, वृष्‍टि से ओषधि, ओषधियों से अन्न, अन्न से धातु, धातुओं से शरीर और शरीर से कर्म बनता है |

..भाषार्थ - इस विषय में तैत्तिरीय उपनिष‌द् का भी प्रमाण है कि - (तस्माद्वा.) परमात्मा के अनन्त सामर्थ्य से आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथिवी आदि तत्व उत्पन्न हुए है, और उनसे ही पूर्वोक्त क्रम के अनुसार शरीर आदि उत्पत्ति, जीवन और प्रलय को प्राप्त होते हैं | यहां ब्रह्म का नाम अन्न और अन्न का नाम ब्रह्म भी है, क्योंकि जिसका जो कार्य है वह उसी में मिलता है | वैसे ही ईश्‍वर के सामर्थ्य से जगत् की तीनो अवस्थाएं होती हैं, और सब जीवों के जीवन का मुख्य साधन है, इससे अन्न को ब्रह्म कहते हैं | जब होम से वायु, जल और ओषधि आदि शुद्ध होते हैं, तब सब जगत् को सुख और अशुद्ध होने से सबको दुख होता है | इससे इनकी शुद्धि अवश्य करनी चाहिये |

..भाषार्थ - सो उनकी शुद्धि करने में दो प्रकार का प्रयत्न है - एक तो ईश्‍वर का किया हुआ, और दूसरा जीव का |जैसे ईश्वर नें सत्यभाषणादि धर्मव्यवहार करने की आज्ञा दी है, मिथ्याभाषणादि की नहीं, जो इस आज्ञा से उलटा काम करता है, वह अत्यन्त पापी होता है, और ईश्वर की न्याय व्यवस्था से उसको क्लेश भी होता है, वैसे ही ईश्वर ने मनुष्यों को यज्ञ करने की आज्ञा दी है, इसको जो नहीं करता, वह भी पापी होके दुख का भागी होता है |

..भाषार्थ - क्योंकि सबके उपकार करने वाले यज्ञ को नहीं करने से मनुष्यों को दोष लगता है | जहां जितने मनुष्य आदि के समुदाय अधिक होते हैं, वहां उतना ही दुर्गन्ध भी अधिक होता है | वह ईश्वर की सृष्‍टि से नही, किन्तु मनुष्य आदि प्राणियों के निमित्त से ही उत्पन्न होता है | क्योंकि हस्ति आदि समुदायों को मनुष्य अपने ही सुख के लिये इक्ट्ठा करते हैं, इससे उन पशुओं से भी जो अधिक दुर्गन्ध उत्पन्न होता है सो मनुष्यों के ही सुख की इच्छा से होता है | इससे क्या आया कि जल वायु और वृष्‍टिजल को बिगाड़ने वाला सब दुर्गन्ध मनुष्यों के ही निमित्त से उत्पन्न होता है तो उसका निवारण करना भी उनको ही योग्य है |

..भाषार्थ - क्योंकि जितने प्राणी देहधारी जगत् में है उनमें से मनुष्य ही उत्तम है, इससे वे ही उपकार और अनुपकार को जानने को योग्य है | मनन नाम विचार का है, जिसके होने से ही मनुष्य नाम होता है, अन्यथा नहीं | क्योंकि ईश्वर नें मनुष्य के शरीर में परमाणु आदि के संयोगविशेष इस प्रकार रचे हैं कि जिनसे उनको ज्ञान की उन्नति होती है | इसी कारण से धर्म का अनुष्‍ठान और अधर्म का त्याग करने को भी वे ही योग्य होते हैं, अन्य नहीं | इससे सबके उपकार के लिये यज्ञ का अनुष्‍ठान भी उन्हीं को करना उचित है |

(क्रमशः)

(महर्षि दयानन्द कृत ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका से संक्षिप्त में उद्धृत)