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महर्षि पतञ्जलि ऋषि प्रणीत 'योगदर्शनम्' द्वितीय साधनपादः(1)सरल हिन्दी भाषा में - मूल सूत्र, शब्दार्थ तथा भावार्थ सहित तपः स्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः ||1| [तपः-स्वाध्याय-ईश्वरप्रणिधानानि] तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान, (ये तीन) [क्रियायोगः] क्रियाएँ योग (का साधन) हैं | 1. तप = सर्दी-गर्मी, भूख-प्यास, हानि-लाभ, मान-अपमान,सुख-दुख आदि द्वन्दों को सहना ; समाधिभावनार्थः क्लेशतनूकरणार्थश्च ||2|| [समाधिभावनार्थः] समाधि की सिद्धी करवाने के लिए [क्लेशतनूकरणार्थः] क्लेशों को कमजोर करने के लिए [च] और पूर्व सूत्र में बताई गई तीन क्रियाएँ समाधि को उत्पन्न करने के लिए तथा अविद्या आदि क्लेशों को कमजोर करने के लिए हैं | अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः पञ्चक्लेशाः ||3|| अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश ये पाँच क्लेश हैं, इन्हीं को विपर्यय अथवा मिथ्याज्ञान कहते हैं | इन्हीं के कारण जीव को दुःख प्राप्त होता है, इसलिए इनका नाम क्लेश है | अविद्या क्षेत्रमुत्तरेषां प्रसुप्ततनुविच्छिन्नोदाराणाम् ||4|| [अविद्या] मिथ्या ज्ञान [क्षेत्रम्] उत्पत्ति स्थान है (=कारण है) [उत्तरेषाम्] बाद वालों का [प्रसुप्ततनुविच्छिन्नोदाराणाम्] प्रसुप्त, तनु, विच्छिन्न और उदारों का | अविद्या बाद में कहे गये (=अस्मिता, राग, द्वेष तथा अभिनिवेश) क्लेशों की जननी है | ये क्लेश चार अवस्थाओं वाले होते हैं - 1. प्रसुप्त = सोये हुए, 2. तनु = दुर्बल=क्षीण हुए हुए, 3. विच्छिन्न =एक काल में एक दूसरे से दबे हुए और 4. उदार =वर्त्तमान में जो प्रवृत हैं अर्थात् पूरे वेग से भोगों को भुगवाने में कार्यरत रहते हैं | इन क्लेशों की पाँचवी दग्धबीजभाव् अवस्था भी होती है | वह केवल उसी योगी में होती है , जो तत्वज्ञान को विशेषरूप से प्राप्त कर चुका हो और मुक्ति में जाने वाला हो | अनित्याशुचिदुःखानात्मसु नित्यशुचिसुखात्मख्यातिरविद्या ||5|| [अनित्य-अशुचि-दुःख-अनात्मसु] अनित्य, अपवित्र, दुख और अनात्मा में (क्रमशः) [नित्य-शुचि-सुख-आत्मख्यातिः] नित्य, पवित्र, सुख और आत्मा का ज्ञान होना [अविद्या] मिथ्याज्ञान है | (1) अनित्य शरीर व संसार को नित्य समझना और नित्य ईश्वर तथा आत्मा को अनित्य समझना, (2) अपवित्र=मलमूत्रादि से परिपूर्ण शरीर में पवित्र बुद्धि और सत्य, विद्या, धर्म, सत्संग आदि में अपवित्र बुद्धि करना ; (3) काम, क्रोध, लोभ, आदि दुःखरूप व्यवहारों में (=विषयभोगों में) पूर्ण तथा स्थाई सुख मिलने की आशा करना एवं शम, दम, सन्तोश आदि सुखरूप व्यवहारों में दुःख बुद्धि करना, (4) शरीर, मन आदि जड़ वस्तुओं को चेतन समझना तथा जो पुत्र-स्त्री आदि हमारी आत्मा से भिन्न हैं, उन्हें अपनी आत्मा का अंश समझना | उनकी हानि को देखकर अपनी आत्मा की हानि तथा उनकी वृद्धि देखकर अपनी आत्मा की वृद्धि समझना एवं ईश्वर तथा जीव जो चेतन हैं, उनको जड़ समझना ; यह चार प्रकार की अविद्या है | (क्रमशः)
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