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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

उपासना का वैदिक स्वरूप (5) लेखक श्री स्वामी आत्मानन्द सरस्वती जी

* ओउम् *

...भगवन् के प्राणी मात्र पुत्र हैं | उन सबके कल्याण के लिए भगवान् सदा ही उपदेश देते रहते हैं | परन्तु वह उपदेश पड़ता उन्हीं कानों में है जो भगवान् के सखा हैं, उससे प्रेम करते हैं | भगवान के गुणों से अपनी आत्मा को अलंकृत करना ही उनके सखित्व में आना है | और ऐसा होने पर ही उपासक को भगवान् के उपदेश को सुनने का अधिकार प्राप्त होता है | बस प्राणियों को उसी अधिकार को प्राप्त कराने में मैं उनका सहयोगी बन सकूं | इस यज्ञ की पवित्र भावना से मुझे भावित कर दीजिए | ऐश्‍वर्य के लिए अभिलाषी जीवों के लिए उपदेश करने योग्य ऐसे स्तोत्र मैं उन्हें पढ़ा सकूं जिससे वे बढ़ सकें और उनका अधिकार उन्हें प्राप्त हो सके | इसके लिए जो भी अनेक प्रकार की विधिएं मुझे प्रयोग में लानीं पड़ें, वैसा करता हुआ उनके कार्य को सिद्ध करने में मैं समर्थ हो सकूं |

(अब गतांक से आगे) -

और उस स्तोत्र को कहीं अन्यत्र ढूंढने की मुझे आवश्यक्ता ही क्या है | वह तो आपकी पवित्र देन मेरे नेत्रों के सामने ही है जिसे मैं आगे के मन्त्र में पढ़ रहा हूँ | मन्त्र है -

तमित्सखित्व ईमहे तंराये तं सुवीर्ये |
स शक्र उतनः शकदिन्द्रो वसुदयमानः || ऋ. 1|10|6||

अर्थ - हे बन्धुगण (तम्) उस ऐश्वर्य सम्पन्न सर्व शक्तिमान् भगवान् से हम लोग (सखित्वे, राये, सुवीर्ये) मित्रता के लिए, विज्ञानादि अध्यात्म धन के लिए तथा उत्कृष्ट पराक्रम और उत्साह के लिए (ईमहे) प्रार्थना करते हैं (स शक्रः इन्द्रः) वह सर्वशक्तिमान् ऐश्‍वर्यशाली भगवान् (दयमानः) कृपालु होता हुआ भगवान् (नः) हमारे लिए (वसुः) जिसके द्वारा आनन्दित हो सकें, ऐसा धन (शकत्-उत) देने में समर्थ भी है |

सिद्ध उपासक साधक उपासकों के साथ बैठ कर भगवान् से जो प्रार्थना करता है उसका उल्लेख ऊपर किया गया है | यह वह ही स्तोत्र है जिसके द्वारा भगवान् को सखा बनाया जा सकता है | परन्तु उस प्रेम का प्राप्त करना बड़ा कठिन कार्य है | उसके लिए श्रेष्ठ पराक्रम और उत्साह चाहिए | उसकी विज्ञानादि सम्पत्ति से अपने आपको अलंकृत करना चाहिए, सब और से प्रेम को हटाकर उसके और केवल उसी के चरणों में उसे अर्पित करना चाहिए | और अपने आप को उसकी करुणा का पात्र बनाना चाहिए | बस ये ही सब कर्त्तव्य कर्म हैं जिनकी प्राप्ति के लिए इस मन्त्र द्वारा भगवान् का स्तवन किया जा रहा है |

भगवान् हमारे अन्तःकरन में और आत्मा में सर्वत्र ही व्यापक है, ऐसी अवस्था में तो भगवान् के विज्ञान आदि ऐश्वर्य भी अपनी आत्मा में हमें व्यापक मानने पड़ेंगे | और यदि यह बात ठीक है तो उन्हें अपनी आत्मा मे बसाने के लिए विशेष प्रयत्न की आवश्यक्ता क्यों है ? इस विषय का स्पष्टीकरण सूर्य और उसके कार्यक्रम का दृष्टान्त देते हुए अगले मन्त्र में किया गया है : -

सुविवृतं सुनिरजमिन्द्र‌ त्वादात मिद्यशः |
गवामपव्रजं वृधि कृणुष्व राधो अद्रिवः || ऋ. 1|10|7||

अर्थ - (इन्द्र) हे सूर्य (इत्..यशः) जल को (त्वादातम्) तूने विशुद्ध किया है (सुनि: अजम्) उसके मल और आवरण को भली भांति दूर फैंक दिया है | (सुविवृतम्) उसे भली भांति प्रकाशित किया है ! (गवाम् व्रजम्) किरणों के समुदाय का (अपवृधि) विस्तार करो (अद्रिवः) हे मेघवान् (राधः) कृषि सुवर्णादि धन को (कृणुष्व) हमारे लिए सिद्ध करो |

अर्थ - इन्द्र) हे शुभ गुण रूपी ऐश्‍वर्यवान् भगवान् ! (यशः) मेरे कीर्ति रूप ऐश्‍वर्य को (त्वादातम्) आपने अपनी महिमा से विशुद्ध किया है |(सुनि: अजम्) मेरे अन्तः करण के मल और आवरण को दूर फैंक दिया है | (सुविवृतम्) उसे अपने ज्ञान के प्रकाश से भली भांति प्रकाशित कर दिया है |(गवाम् व्रजम्) ज्ञान की किरणों के झुण्ड‌ का (अपवृधि) विस्तार करो (अद्रिवः) मेघ आदि के रचने वाले भगवन्‌ (राधः) हमारे आध्यात्मिक धन को (कृणुष्व) सिद्ध करो |

भावार्थ - जिस प्रकार सूर्य जल के मल आदि दोषों को दूर कर उसे उज्ज्व‌ल और प्रकाशित कर देता है और उसके द्वारा मनुष्य के अनेक प्रकार के ऐश्‍वर्य की वृद्धि करता है, उसी प्रकार भगवान् का गुण रूपी ऐश्‍वर्य, अन्तः करण‌ के मल और आवरण को दूर कर उसे प्रकाशित कर देता है और आत्मा के ज्ञान को अपने ज्ञान के झुण्ड से बढ़ाता है |

सूर्य की किरणें द्यु लोक से चल कर अन्तरिक्ष को पार करती हुईं भू मण्डल पर फैल जाती हैं | भू मण्डल नें स्थान स्थान पर जल के स्त्रोत बह रहे हैं | कहीं निर्मल जल के स्त्रोत हैं कहीं मलिन के | नालियों और छोटी छोटी बावड़ियों में ऐसे जल भी देखने में आते हैं जो अत्यन्त मलिन होते हैं सूर्यदेव अपनी किरण रूप हाथों से जहां निर्मल जल को उठाते हैं उस के साथ ही मलिन जल को भी उठा कर अन्तरिक्ष का भण्डार भरना आरम्भ करते हैं | यह अन्तरिक्ष का जल भण्डार ही है जो वर्षा बन कर भू मण्डल पर बरसता है और भू मण्डल की गोदी को जल से भर देता है | अब तो जिस बूंद को भी देखते हैं वह ही स्वच्छ निर्म‌ल मोती का दाना दिखाई देता है | न उसमें दुर्गन्धि है और न मैल | न वह खारा है और न कड़वा | नदी सागर और नाले सब से ही सूर्यदेव ने जल को उठाकर आकाश में संचित किया था | परन्तु अब तो वर्षा के सब बिन्दुओं का एक ही रस है और एक ही रूप | मलिनता कहीं भी देखने को मिलती ही नहीं | यह प्रश्‍न‌ हो सकता है कि यह घटना चक्र घटा कैसे ? बात स्पष्ट है कि सूर्य की किरणों ने पृथिवी पर से उठाया ही केवल शुद्ध जल कणों को है | पार्थिव भाग को उन्होंने पृथिवी के अंचल में ही छोड़ दिया है | सूर्य की किरणों इतनी सूक्ष्म और इतनी तेजस्वी बनाई ही इसलिए गई हैं, जिससे कि वे मलिन जल में हंस के समान स्वच्छ जल के भाग को चुन कर उठा लेती हैं, और मलिन भाग को भी अपने तेज से भस्म कर निर्गन्ध बना देती हैं|

यह एक दृष्टान्त है | जिस प्रकार भिन्न प्रकार के अनेक जल अनेक दोषों से मिश्रित हैं, इसी प्रकार मानव जगत् के अनेक प्रकार के अन्तःकरण भी अनेक दोषों से संक्रान्त हैं | इनका निर्मल स्वरूप है : -

"ज्योतिषां ज्योतिः" 'प्रकाशों का प्रकाश'

ज्ञान इन्द्रियों और बुद्धियों को प्रकाश इसी ज्योति से प्राप्त हुए हैं | अन्तः करण में सत्वगुण के प्रादुर्भाव से उसमें इस ज्योति का उदय होता है | इसके विपरीत इस में रजोगुण और तमोगुण के प्रादुर्भाव से अनेक प्रकार के मलों का संग्रह होने लग जाता है | प्रकाश नामक विद्या का तिरोभाव होते ही इसमें अविवेक का जन्म हो जाता है | अविवेक के प्रकट होते ही रजोगुण अपना प्रभाव दिखाना आरम्भ कर देता है और अन्तः करण को विक्षिप्त कर देता है | अवसर पाने पर तमोगुण भी अपना प्रभाव किये बिना नहीं रहता, और अज्ञान अथवा विपरीत ज्ञान की सृष्टि करने लग जाता है | अब यह अज्ञान, विपरीत ज्ञान और ज्ञान भी समय समय पर अन्तःकरण का रूपान्तर परिवर्तित करते हुए उस में अनेक प्रकार के संस्कारों को जन्म देना आरम्भ कर देता है | भिन्न प्रकार के ज्ञानों का नाम ही वृत्ति है | संस्कारों की उत्पत्ति इन्हीं वृत्तियों ने की है | फिर तो संस्कार भी वृत्तियों को जन्म देना आरम्भ कर देते हैं | और फिर वृत्तियों से संस्कार और संस्कारों से वृत्तियें यह चक्र निरन्तर चलना आरम्भ हो जाता है | जिस प्रकार जल में अनेक प्रकार के मल थे इसी प्रकार अन्तःकरण में भी संस्कार विक्षेप और अविद्या आदि अनेक प्रकार के मल हैं | और जिस प्रकार जल के मल को सूर्य की किरणों के झुण्ड ने भस्म किया था उसी प्रकार इस अन्तःकरण के मल का संहार भगवान् के ज्ञान की किरणों के समुदाय से होगा |

(क्रमशः)