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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

महात्मा नारायण स्वामी जी की 'केन सूक्त' पर टीका - परिशिष्ट (7/7)

तस्मिन हिरण्ये कोशे त्र्यरे त्रिप्रतिष्ठिते |
तस्मिन यद् यक्षमात्मन्वत् तद्वं ब्रह्मविदो विदुः ||32||

अर्थ - (त्रि अरे) तीन अरों से युक्त (त्रि प्रतिष्ठिते) तीन केन्द्रों में स्थिर (तस्मिन हिरण्ये कोशे) ऐसे उस तेजस्वी कोष में (यत् आत्मन्वत् यक्षं) जो आत्मवान यक्ष है | (तद् वै ब्रह्मविदः विदुः) उसको निश्चय ब्रह्मज्ञानी जानते हैं |

व्याख्या

तीन अरे प्रकृति के तीन गुण सत्व, रजस और तमस ही हैं | तीन केन्द्र ज्ञान, कर्म और उपासना हैं | इन्हीं तीन अरों वाले चक्र से मन चलता और ज्ञान, कर्म और उपासना नामक केन्द्र में ठह‌रता है | ऐसे ह्रदय रूप तेजयुक्त कोष में यक्ष (ईश्वर) रहता है जिसे ब्रह्मवित् जानते हैं | इसी यक्ष की चर्चा केनोपनिषद् की आख्यायिका में है |

प्रभाजमानां हरिणीं यक्षसा संपरीवृताम् |
पुरं हिरण्ययीं ब्रह्माविवेशापराजिताम् ||33||

अर्थ - (प्रभाजमानां) प्रकाश युक्‍त (हरिणीं) दु:ख हरने वाली (यक्षसा संपरीवृतां) यक्ष से परिपूर्ण (अपराजितां) कभी पराजित न होने वाली (हिरण्ययीं पुरं) तेजपूर्ण नगरी में (ब्रह्म आविवेश) ब्रह्म सब और से प्रविष्‍ट है |

व्याख्या

मन्त्र में नगरी के पांच विशेषण दिये गये हैं जिनका भाव यह है कि जो प्राणी इस ब्रह्म की पुरी में ब्रह्म के दर्शनार्थ प्रवेश करना चाहता है उसमें उस नगरी के अनुकूल ही गुण होने चाहियें | वे पांच विशेषण ये हैं : - (1) तेज, (2) दुःखों को दूर करने की योग्यता, (3) यश, (40 शक्‍ति सम्पन्नता, (5) ओजस्विता |

छान्दोग्योपनिषद् में एक प्रकरण आया है जिसमें इस ब्रह्म की पुरी (ह्रदय मन्दिर) के पांच द्वारपाल वर्णन किये गये हैं (छान्दोग्योपनिषद् 3|13|1-8) ये द्वारपाल पांच प्राण हैं परन्तु जो उन द्वारों से गुजरना चाहता है उसके भीतर पाँच गुण होने चाहियें तभी वह पाँचों द्वारों में प्रविष्‍ट होकर मन्दिर के भीतर पहुँच सकता है | वे पाँच गुण मन्त्र में वर्णित पाँच विशेषणों के साथ निम्नलिखित हैं : -

संख्या/ उपनिषद् में वर्णित गुण/ वेद मन्त्र में वर्णित विशेषता
(1)/ तेज / तेज
(2)/ श्री / दुःखों के दूर करने की योग्यता
(3)/ यश/ यश
(4)/ ब्रह्मवर्चस‌ / शक्ति-सम्पन्नता
(5)/ ओज / ओजस्विता

दोनों पर दृष्‍टिपात करने से स्पष्‍ट हो जाता है कि दोनों स्थानों में एक ही प्रकार के गुणों की आवश्यक्ता बतलाई गैइ है | संख्या 2 में उपनिषद् का श्री गुण ही वेद मन्त्र में आये दुःख
निवृति की योग्यता का कारण होने से परस्पर समान ही समझे जाने के योग्य है | कितनी अपूर्व शिक्षा कितने अपूर्व ढंग से दी ग‍ई है | मनुष्य के भीतर इन गुणों के होने से उसकी पहुँच अयोध्यापुरी में विराजमान अथवा केनोपनिषद् में वर्णित यक्ष तक हो जाती है |

केन सूक्‍त पर एक दृष्‍टि - अथर्ववेद के इस सूक्‍त पर निगाह डालने से प्रकट हो जाता है कि सूक्‍त के प्रारम्भ के मन्त्रों में शरीर के बाह्य और आन्तरिक अवयवों, मानसिक भावों, रुधिर, प्राण, चरित्र, अमरत्व, सत्व, अनृत, मन, वाणी, कर्म, मेधा, श्रधा, बाह्य जगत्, वेद (ज्ञान), वेदज्ञ, देव, ईश्‍वर का व्यापकत्व, मस्तिष्क और ह्रदय का मेल, ब्रह्म, मस्तिष्‍क सम्बन्धी अद्‍भुत रचना वेद और ब्रह्म सम्बन्धी ज्ञान प्राप्ति का फल, ब्रह्म की पुरी अयोध्या में यक्ष का प्रवेश और यह कि प्राणी किस प्रकार उस नगरी में यक्ष तक पहुँच सकता है, इत्यादि विषयों का वर्णन हैं | यह वर्णन कहीं कहीं तो उत्तर सहित प्रश्नों के रूप में है | उदाहरण के लिए देखो मन्त्र 22, 23, तथा 24, 25 और कहीं कहीं क्या बल्कि अधिकतर प्रश्‍न के रूप में है | जो शिक्षा प्रश्नों के रूप में है वह भी असंदिग्ध रूप से मननीय है | एक बात इस अवसर पर ध्यान में रख लेनी चाहिए और वह यह है कि "केन" शब्द के अर्थ जहां 'किससे' और 'किसने' के आते हैं वहाँ "केन" शब्द 'ईश्‍वरेण' का अर्थ भी देता है | "क" के अर्थ कोषों में ब्रह्म, यम, सूर्य, आत्मा, शरीर, मन, काल, तेज सम्पत्ति, अग्नि, कामदेव, जल और हर्ष आदि के भी हैं इसलिए यदि "क" के अर्थ ईश्‍वर के लें तो सूक्‍त में जहां भी "क" शब्द प्रश्नार्थ में है सभी जगह ईश्‍वरार्थ में होकर‌ म‌न्त्र प्रश्न रूप में नहीं किन्तु साधारण वर्णन रूप में होकर इस केन सूक्‍त का नाम ब्रह्म सूक्‍त हो जायेगा | वेद में आये "कस्मै देवाय हविषा विधेम" के अर्थ जहां यह होते हैं कि "किस देव के लिए हवि अर्पित की जावे" वहां यह भी होते हैं कि "ईश्‍वर के लिए हवि अर्पित की जाय या यज्ञ किया जाय" सूक्‍तान्तर्गत शिक्षायें बड़े महत्व की हैं | सूक्‍त के अन्तिम मन्त्रों तथा इसी प्रकार के अन्य मन्त्रों में वर्णित शिक्षाओं के आधार पर ही वास्तव में उपनिषदों का भवन तैयार हुआ है | परिणाम की दृष्‍टि से इस केन सूक्त और केनोपनिषद् दोनों को एक ही कहा जा सकता है | दोनों महत्वपूर्ण शिक्षाओं से पूर्ण और दोनों ही मनन करने योग्य हैं |

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