Skip navigation.
कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

वेदो में विज्ञान व शिल्पविद्या के रहस्य (17)

ऐन्द्र सानसिं रयि सजित्वानं सदासहम् | वर्षिष्ठमूतये भर ||1||

ऋग्वेद ।|8|1||

पदार्थ - हे (इन्द्र) परमेश्‍वर ! आप कृपा करके हमारी (ऊतये) रक्षा पुष्टि और सब सुखों की प्राप्ति के लिये (वर्षिष्‍ठ‌म‌) जो अच्छी प्रकार वृद्धि करने वाला (सानसिम्) निरन्तर सेवन के योग्य (सदासहम्) दुष्‍ट‌शत्रु तथा हानि वा दुःखों के सहने का मुख्य हेतु (साजित्वानम्) और तुल्य शत्रुओं का जितानेवाला (रयिम्) धन है उसको (आभ‌र) अच्छी प्रकार दीजिये ||1||

भावार्थ - सब मनुष्यों को सर्वशक्तिमान् अन्तर्यामी ईश्‍वर का आश्रय लेकर अपने पूर्ण पुरुषार्थ के साथ चक्रवर्त्ति राज्य के आनन्द को बढ़ानेवाली विद्या की उन्नति सुवर्ण आदि धन और सेना आदि बल सब प्रकार से रखना चाहिये, जिससे अपने आप को और सब प्राणियों को सुख हो ||1||

नि येन मुष्टिहत्यया नि वृत्रा रुणधामहै | त्वोतासो न्यर्वता ||2||
ऋग्वेद ।|8|2||

पदार्थ - हे (जगदीश्‍वर !(त्वोतासः) आपके सकाश से रक्षा को प्राप्त हुए हम लोग (येन) जिस पूर्वोक्त धन से (मुष्‍टिहत्यया) बाहुयुद्ध और (अर्वता) अश्‍व आदि सेना की सामग्री से (निर्वृत्रा) निश्‍चित शत्रुओं को (निरुणधामहै) रोकें अर्थात् उनको निर्बल कर सकें, ऐसे उत्तम धन का दान हम लोगों के लिये कृपा से कीजिये ||2||

भावार्थ - ईश्‍वर के सेवक मनुष्यों को उचित है कि अपने शरीर और बुद्धि बल को बहुत बढ़ावें, जिससे श्रेष्ठों का पालन और दुष्टों का अपमान सदा होता रहे, और जिससे शत्रु जन उनके मुष्टि प्रहार को न सह सकें, इधर उधर छिपते भागते फिरें ||2||

इन्द्र त्वोतास आ वयं वज्रं घना ददीमहि | जयेम सं युधि स्पृधः ||3||
ऋग्वेद ।|8|3||

पदार्थ - हे (इन्द्र) अनन्तबलवान् ईश्‍वर‌ ! (त्वोतासः) आपके सकाश से रक्षा आदि और बल को प्राप्त हुए (वयम्) हम लोग धार्मिक और शूरवीर होकर अपने विजय के लिये (वज्रम्) शत्रुओं के बल का नाश करने का हेतु आग्नेया‍स्त्र और (घना) श्रेष्‍ठ‌ शस्त्रों का समूह जिनको कि भाषा में तोप बन्दूक तलवार और धनुष बाण आदि करके प्रसिद्ध कहते हैं, जो युद्ध की सिद्धि में हेतु हैं उनको (आद‌दीमहि) ग्रहण करते हैं | जिस प्रकार हम लोग आपके बल का आश्रय और सेना की पूर्ण साम‌ग्री करके (स्पृधः) ईर्षा करनेवाले शत्रुओं को (युधि) संग्राम (जयेम) जीतें ||3||

भावार्थ - मनुष्यों को उचित है कि धर्म और ईश्‍वर के आश्रय से शरीर की पुष्टि और विद्या करके आत्मा का बल तथा युद्ध की पूर्ण सामग्री परस्पर अवरोध और उत्साह आदि श्रेष्‍ठ‌ गुणों को ग्रहण करके दुष्‍ट् शत्रुओं के पराजय करने से अपने और सब प्राणियों के लिये सुख सदा बढ़ाते रहें ||3||

वयं शूरेभिरस्तृभिरिन्द्र त्वया युजा वयम् | सासह्याम पृतन्यतः ||4||
ऋग्वेद ।|8|4||

पदार्थ - हे (इन्द्र) युद्ध में उत्साह के देनेवाले परमेश्‍वर ! (त्वया) आपको अन्तर्यामी इष्‍ट‌देव मानकर आपकी कृपा से धर्मयुक्त व्यवहारों में अपने सामर्थ्य के (युजा) योग करानेवाले के योग से (वयम्) युद्ध के करने वाले हम लोग (अस्तृभिः) सब शस्त्र अस्त्र के चलाने में चतुर (शूरेभिः) उत्तमों में उत्तम शूरवीरों के साथ होकर (पृतन्यतः) सेना आदि बल से युक्त होकर लड़ने वाले शत्रुओं को (सासह्यम) वार वार सहें, अर्थात् उनको निर्बल करें इस प्रकार शत्रुओं को जीतकर न्याय के साथ चक्रवर्त्ति राज्य का पालन करें ||4||

भावार्थ - शूरता दो प्रकार की होती है एक तो शरीर की पुष्टि और दूसरी विद्या तथा धर्म से संयुक्त आत्मा की पुष्टि | इन दोनों से परमेश्‍वर की रचना के क्रमों को जानकर न्याय, धीरजपन, उत्तम स्वभाव और उद्योग आदि से उत्तम उत्तम गुणों से युक्त होकर सभाप्रबन्ध के साथ‌ राज्य का पालन और दुष्ट शत्रुओं का निरोध अर्थात् उनको सदा कायर करना चाहिये ||4||

महाँ इन्द्रः परश्च नु महित्वमस्तु वज्रिणे | द्यौर्न प्रथिना शवः ||5||
ऋग्वेद ।|8|5||

पदार्थ - (न) जैसे मूर्त्तिमान् संसार को प्रकाशयुक्त करने के लिये (द्यौः) सूर्य्यप्रकाश (प्रथिना) विस्तार से प्राप्त होता है, वैसे ही जो (महान्) सब प्रकार से अनन्तगुण, अत्युत्तम स्वभाव, अतुल सामर्थ्ययुक्त और (परः) अत्यन्त श्रेष्‍ठ (इन्द्रः) सब जगत् की रक्षा करनेवाला परमेश्‍वर है, और (वज्रिणे) न्याय की रीति से दण्ड देने वाले परमेश्‍वर (नु) जोकि अपने सहायरूपी हेतु से हम को विजय देता है, उसी की यह (महित्वम्) महिमा (च) तथा बल है ||5||

भावार्थ - इस मन्त्र में उपमालङ्कार है | धार्मिक युद्ध करनेवाले मनुष्यों को उचित है कि जो शूरवीर युद्ध में अति धीर मनुष्यों के साथ होकर दुष्‍ट‌ शत्रुओं पर अपना विजय हुआ है, उसका धन्यवाद अनन्त शक्तिमान् जगदीश्‍वर को देना चाहिये, कि जिससे निरभिमान होकर मनुष्यों के राज्य की सदैव बढ़ती होती रहे ||5||

(महर्षि दयानन्द सरस्वती के ऋग्वेदभाष्य पर आधारित एवं संक्षेप में उद्दृत्)
THE SECRETS OF SCIENCE & TECHNOLOGY IN VEDAS (17)
(Based on & Reproduced from Maharshi Dayanand Saraswati's RIGVED BHASHYA)