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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

अथ वेदविषयविचारः (5)

(ग‌तांक से आगे) -
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भाषार्थ - प्र. - सुगन्ध युक्‍त‌ जो कस्तूरी आदि पदार्थ हैं, उनको अन्य द्रव्यों से मिला के अग्नि में डालने से उनका नाश हो जाता है , फिर यज्ञ से किसी प्रकार का उपकार नहीं हो सकता, किन्तु ऐसे उत्तम उत्तम पदार्थ मनुष्यों को भोजनादि के लिये देने से होम से भी अधिक उपकार हो सकता है, फिर यज्ञ करना किस लिये चाहिये ?

उ. - किसी पदार्थ का विनाश नहीं होता है | परन्तु यह तो कहिये कि आप विनाश किसको कहते हैं ?
उ. - जो स्थूल होके प्रथम देखने में आकर फिर न देख पड़े, उसको हम विनाश कहते हैं |
प्र. आप कितने प्रकार का दर्शन मानते हैं ?
उ. - आठ प्रकार का |
प्र. - कौन कौन से ?
उ. - प्रत्यक्ष 1, अनुमान 2, उपमान 3, शब्द 4, ऐतिह्य 5, अर्थापति 6, सम्भव 7, और अभाव 8, इस भेद से हम आठ प्रकार का दर्शन मानते हैं |

(इन्द्रियार्थ.) इनमें से प्रत्यक्ष उसको कहते हैं कि जो चक्षु आदि इन्द्रिय और रूप आदि विषयों के सम्बन्ध में सत्य ज्ञान उत्पन्न हो | जैसे दूर से देखने में सन्देह हुआ कि वह मनुष्य है वा कुछ और, फिर उसके समीप होने से निश्‍चय होता है कि यह मनुष्य ही है अन्य नहीं , इत्यादि प्रत्यक्ष के उदाहरण हैं || 1||

(अथ तत्पू.) और जो किसी पदार्थ के चिह्न‌ देखने से उसी पदार्थ का यथावत् ज्ञान हो वह अनुमान कहाता है | जैसे किसी के पुत्र को देखने से ज्ञान होता है कि इसके माता पिता आदि हैं, वा अवश्‍य थे, इत्यादि इसके उद्धाहरण हैं ||2||

(प्रसिद्ध.) तीसरा उपमान कि जिससे किसी का तुल्य धर्म देख के समान धर्म वाले का ज्ञान हो | जैसे किसी ने किसी से कहा कि जिस प्रकार का यह देवदत्त है, उसी प्रकार का वह यज्ञदत्त भी है, उसके पास जाके इस काम को कर ला | इस प्रकार के तुल्य धर्म से जो ज्ञान होता है, उसको उपमान कहते हैं ||3||

(आप्‍तोप.) चौथा शब्द प्रमाण है कि जो प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष अर्थ का निश्‍चय कराने वाला है | जैसे ज्ञान से मोक्ष होता है, यह आप्‍तों के उपदेश शब्द प्रमाण का उदाहरण है ||4||
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भाषार्थ - (ऐतिह्यम्) सत्यवादी विद्वानों के कहे वा लिखे उपदेश का नाम इतिहास है | जैसा "देव और असुर युद्ध करने के लिये तत्पर हुए थे' जो यह इतिहास ऐतरेय, शतपथ ब्राह्मणादि सत्यग्रन्थों में लिखा है, उसी का ग्रहण होता है अन्य का नहीं | यह पांचवां प्रमाण है ||5||

और छठा (अर्थापत्तिः) जो एक बात किसी ने कही हो उससे विरुद्ध दूसरी बात समझी जावे | जैसे किसी ने कहा कि बादलों के होने से वृष्टि होती है, दूसरे ने इतने ही कहने से जान लिया कि बादलों के बिना वृष्टि कभी नहीं हो सकती | इस प्रकार के प्रमाणों से जो ज्ञान होता है, उसको अर्थापति कहते हैं ||6||

सातवां (संभवः) जैसे किसी ने किसी से कहा कि माता पिता से सन्तानों की उत्पत्ति होती है, तो दूसरा मान ले कि इस बात का तो सम्भव है | परन्तु जो कोई ऐसा कहे कि रावण के भाई कुम्भकरण की मूंछ चार कोश तक आकाश में ऊपर खड़ी रहती थी और उसकी नाक (16) सोलह कोश पर्यन्त लम्बी चौड़ी थी, उसकी यह बात मिथ्या समझी जायगी क्योंकि ऐसी बात का संभव कभी नहीं हो सकता ||7||

और आठवां (अभावः) जैसे किसी ने किसी से क‌हा कि तुम घड़ा ले आओ और जब उसने वहां नहीं पाया तब वह जहां पर घड़ा था वहां से ले आया ||8||

इन आठ प्रकार के प्रमाणों को मैं मानता हूँ | यहां इन आठों का अर्थ संक्षेप से किया है* |

उ. यह बात सत्य है कि इनके बिना माने सम्पूर्ण व्यवहार और परमार्थ किसी का सिद्ध नहीं हो सकता | इससे इन आठों को हम लोग भी मानते हैं

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भाषार्थ - नाश को समझने के लिये यह दृष्टान्त है कि कोई मनुष्य मट्टी के ढेले को पीस के वायु में बल से फैंक दे, फिर जैसे वह छोटे छोटे कण आंख से नहीं दीखते | क्योंकि (णश) धातु का अदर्शन ही अर्थ है | जब अणु अलग अलग हो जाते हैं तब वे देखने में नहीं आते, इसी का नाम नाश है | और जब परमाणूं के संयोग से द्रव्य स्थूल अर्थात् बड़ा होता है, तब वह देखने में आता है | और परमाणु इसको कहते हैं कि जिसका विभाग फिर कभी न हो सके | परन्तु यह बात केवल एकदेशी है, क्यो‍कि उसका भी ज्ञान से विभाग हो सकता है | जिसकी परिधी और व्यास बन सकता है | उसका भी टुकड़ा हो सकता है | यहाँ तक कि जब पर्य्य‌न्त वह एकरस न हो जाय तब पर्य्यन्त ज्ञान से बराबर कटता ही चला जायगा |

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भाषार्थ - वैसे ही जो सुगन्ध आदि द्रव्य अग्नि में डाला जाता है, उसके अणु अलग अलग होके आकाश में रहते ही हैं, क्योंकि किसी द्रव्य का वस्तुता से अभाव नहीं होता | इस से वह द्रव्य दुर्गन्धादि दोषों का निवारण‌ करने वाला अवश्‍य होता है | फिर उससे वायु और वृष्टिजल की शुद्धि के होने से जगत् का बड़ा उपकार और सुख अवश्‍य होता है | इस कारण से यज्ञ को करना ही चाहिये |

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* कहीं कहीं शब्द में ऐतिह्य और अनुमान में अर्थापत्ति संभव और अभाव को मानने से (4) चार प्रमाण रहते हैं |

(क्रमशः)

(महर्षि दयानन्द कृत ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका से संक्षिप्त में उद्धृत)