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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

हमारे भवन व यज्ञ शाला कैसी हों ? मेरी परिकल्पना

हमारे भवन व यज्ञ शाला कैसी हों ? मेरी परिकल्पना
विश्वप्रिय आर्य

आर्य समाज की विशेषता कहें या कमजोरी, हम १३० वषँ के गौरवाशाली इतिहास में आज तक कोइँ अपनी पहचान बता सकें - ऐसा भवन नहीं बना पाये और न हीं कोइँ पर्यटन स्थल । यहाँ यह सब लिख कर पाठकों में निराशा का भाव भरने का उद्ेश्य नहीं हैं पर यह एक सत्य हैं । अन्य संस्थाओं को देखने भर से ही एक पहचान बनती है - जैसे राष्टीय स्वयं सेवक संघ अपनी खाकी निकर से जाना जाता है, तो कोइँ सम्प्रदाय विशेष अपने तिलक या उसके उपासना गृह के आकार से, गुरूद्धारा, जैनमंदिर आदि। दिल्ली का लोटस टेम्पल शिल्पकला का अदभुत नमूना माना जाता है । हम इन बाहरी प्रतीकों की उपेक्षा यह कह कर जरूर कर सकते हैं कि, हमें आंतरिक गुणों का विकास करना चाहिए न कि बाहर की सजावट, प्रदर्शन‌ पर, किन्तु अल्पझ् जीव बाहर की और स्वयं ही आकर्षित‌ हो जाता है ।

आर्य समाज मंदिर के भवन में यदि गुम्बद, शिखर बनाये जाए तो पौराणिकता की पुट आ जाती है जिससे एक वर्ग को चिढ है । यदि सीधा सादा सा चौकोर आकार देकर दीवार बना दी जाए तो आकर्ष‌क-भव्य नहीं लगता और ऐसे में दूसरों के विशाल भवनों को देखकर हम मन ही मन ग्रंथी बनाने लगते है और अपना असंतोष आपस में व्यक्त कर दुखी व निराश होते हैं।

यदि हम पौराणिकों के मंदिरों को देखें तो सारा कुछ् आसपास के माहौल, ईश्वर की बनाई रचनाओं और अपने सम्प्रदायगत इतिहास का ही आख्यान प्रस्तर प्रतिमा में उकेरा गया होता है । जैसे एक मंदिर में मुनि या ऋषि की ध्यानस्थ प्रतिमा लगा दी, शस्ञ आदि बना दिये या वन्य प्राणियों को दर्शा दिया । कोई आड़ी टेड़ी ज्यामितिय रचनाओं को बनाकर भवन नहीं बनाया जाता । अंगकोरवाट का पूरा भवन किसी नक्षञ विशेष को ध्यान में रखकर बनाया गया है । प्रश्न‌ यह है कि क्यों नहीं हम अपनी वैदिक अवधारणाओं को ध्यान में रखकर कोई भवन, यझशाला आदि बना नहीं सकते ? जरूर बना सकते है पर हमने कभी इस पर ध्यान नहीं दिया और यदि मन में कभी विचार बना तो तुरंत कुछ् सूझता नहीं और जिस व्यक्ति को सूझता है तो उसके पास आथ्रिक बल सामर्थ्य‌ नही होता । मैंने कुछ् चिंतन किया और कल्पनाएं की है जिस आधार पर धनी मानी व्यक्ति या समूह, भवन बना सकता है ।

मुझे याद हैं जब आर्य समाज गांधीधाम का एक करोड़ के खर्च से भवन बन रहा था तब उसकी बाह्य‌ सजावट के लिए बहुत सा चिंतन किया गया कि उस सजावट में हम क्या वैदिक पुट दें जो कि सजावट के साथ संदेंश भी देता हो । बहुत ध्यान करने पर भी कुछ् प्रतीक ध्यान में न आए और भवन बन गया । पर अब कुछ् चिञ मेरे समक्ष उपस्थित है जो कि आपके सामने व्यक्त‌ कर रहा हूँ इस आशा के साथ कि कोई तो इससे लाभ लेगा और मूर्तिमान करेगा ।

ञैतवादः- ञैतवाद आर्य समाज की पहचान है । वेद के मंञ को प्रदार्शित्त करता हुआ ञैतवाद का यह दृष्य् हम साकार कर सकते हैं । एक फल से लदे वृक्ष में दो तोते बिठाए जाए और मंञ के भाव को सुस्प‌ष्ट किया जाय ।

ब्रह्म‌चारी व सन्यासीः- ब्रह्म‌चारी व सन्यासी भी आर्य समाज की पहचान है । एक विशाल मूर्ति आदर्श‌ सन्यासी की बनाई जाये जो भव्य हो पर अपने चेहरे पर जीवन का अनुभव लेता हुआ शांत निर्लिप्त भाव दे रहा हो । साथ ही एक आदार्श् ब्रह्म‌चारी की विाशाल मूर्ति बनाई जावे जिसकी आंखों में स्वप्न, उमंग हो और हाथों में दृढ़‌ता, शक्ति औज‌ झलकतता हो । इन प्रतिमाओं को जरूर पर्यटक देखेंगे और उसका मूल्याकंन करेंगे ।

इसी तरह यझ कुण्ड, जनेउ, यझ के समस्त पाञ, पुस्तक, लेखक, वढता, गुरूकुल के ब्रह्म‌चारियों को पढाता हुआ आचार्य जैसे दृश्य आदि के चिञ बनाकर भव्यता में वृदि की जा सकती है ।

हमारे इतिहास के गौरवाशाली प्रसंगः १. काशी का शास्ञार्थ प्रसंग अभिव्यक्त‌ करता प्रस्तर चिञ, इतिहास को दर्शाता हुआ एक सार्थक् प्रस्तुतिकरण होगा । २ . विरजानंद को दयानंद अपनी शिक्षा के समापन पर लौंग देते हुए और विरजानंद का अमर आदेश लेते हुए कि ''मुझे लौंग नहीं वेदोद्धार का वचन दो बहुत ही भावुक व जीवंत प्रसंग होगा । ३ स्वामी श्रद्धानंद के गोली खाने के प्रसंग ४ लेखराम का झुरा खाते हुए चिञ ५ स्वामी विद्यानंद सरस्वती की पुस्तक ''सत्यार्थ‌ भास्कर में दिये लेखराम के चिञ जिसमें तोप से अवैदिक मान्यताओं को उड़ाते हुए दिखाया है ६ स्वामी दयानंद की मृत्यु का दृश्य जिसमें गुरूदत्त‌ अवाक देखते हुए नास्तिक से आस्तिक बने आदि आदि अनेक दृश्य ।

यझ् शालाः-

सबसे पहले यझशाला कहाँ बने ? वेद का मंञ है उपरे गिरीणाम संगमे च नदीनाम धिया विप्रो अजायत । विद्वानों का वास नदी के किनारे व पर्वतों के बीच होता है । यझशाला का निर्माण किसी शांत स्वच्छ् हवादार पर्वतीय स्थान पर बनना चाहिए । पर्वत नदी व समुद्र के आसपास भी निर्माण हो सकता है । आबूपर्वत, शिमला, मुम्बई व पूना शहर आदि उपयुक्त‌ होंगे ।

यझशाला का आकार कैसा हो ? अयं यझे भुवनस्य नाभिः। यझ् इस भुवन की नाभि है, केन्द्र है । अतः यझशाला का निर्माण्र पृथिवी के आकार का होना चाहिए । साढ़े २३ अंश झुकी इस पृथिवी के आधार पर हमारी यझशाला भी साढ़े २३ अंश झुकी हो । पूरा

यझ् कुण्ड् केन्द्र में बनाया जाय । अन्दर की तरफ स्टेडियम में जैसे बैठ‌ने की व्यवस्था होती है उस तरह यजमान, पुरोहित, ब्रह्मचारी आदि को छोड़ कर बाकी सबके बैठ‌ने की व्यवस्था की जावे । इसी पृथिवी आकार की यझशाला में बहु उपयोगी कमरे, सभागार आदि बनाये जा सकते है ।

यझशाला के आसपास सरोवर बनाना चाहिए और उसकी आगे की परिधि में पीपल, आम, नीलगिरी, देवनार, चन्दन, बड़ आदि के वृक्ष जिससे यझ् के लिए समिधा मिल सके ऐसे वृक्ष उगाने चाहिए । औषधि युक्त‌ वनस्पतियाँ जिनका उपयोग हम सामग्री में कर सकें उनको भी उगाना चाहिए ताकि सुन्दरता, शीतलता व सुगन्ध आदि हमेशा बनी रहे । जैसा तुलसी, गिलोय, गुग्गुल आदि ।

इतनी बड़ी व सुन्दर यझशाला के निर्माण करने पर जरूर बहुत सारे लोग श्रद्धालू आवेंगे तो यझ् भी अखण्डित‌ रहना चाहिए । पर यह अखण्ड् यझ् कैसा हो ? ढया राख के नीचे अग्नि दबा दें और शाम सबेरे फिर राख हटाकर यझ् कर आहुति देकर, कुछ् गुटकें समिधा के डाल देना फिर राख में दबा देना ही अखण्ड् यझ् कहलायेगा राख में यझ् करना तो अनुचित होगा । पूरे दिन के लिए पुरोहित की नियुक्ति करना और उसके माध्यम से यझ् करवाना, मंञ बुलवाना, समिधा सामग्री घी आदि का ध्यान रखना पुरोहित के लिए उबाउ काम हो जावेगा । यंञ प्रणाली से घी व सामग्री को एक निश्चित‌ माञा में डाला जा सकता है । ध्वनि अंकित मंञों का उच्चारण लगातार होता रहे और जैसे ही स्वाहा का नाद हो तुरन्त ध्वनि सम्वेदक से धी और समिधा यझ् कुण्ड् में स्वयं ही पड़ जावेंगी और समिधा १५ से २० मंञों के अन्तराल से स्वयं ही कुण्ड् में पड़ेगी ।

आर्य वीर दल की वेशभूषाः- आज तक हम आर्य वीर दल का एक गणवेश न बना सके । सेवा के कितने ही कार्य हमारे वीरों ने किए पर हमारी उपस्थिति व अस्तित्व की पहचान न बनी क्यों कि हमारा कोई गणवेश नहीं । कृपया कोई आर्य समाजी फैशन ड्जजाइनर इस पर ध्यान दे व सुझाव दे ।

नमस्ते

नमस्ते विश्व प्रिय जी
आपका सुझाव अति आकर्षक है ,परन्तु साथ ही साथ,क्या कहीं इसमें दूसरों के पीछे पीछे चलने की, गन्ध सी नहीं आती है | हम वह ही क्यों करें जो दूसरे करते हैं ? क्या यह सब दूसरे धर्मावलम्बियों ने नही किया हुआ ? हम लकीर के फकीर क्यों बनें |वैदिक मूल्यों को समझकर जब हमारे वैग्यानिक ,वास्तुकार , डाक्टर , विद्वान व धन्नाड्य ‌आगे बढ़ेंगे तो अवष्य ही हमारी कल्पनाओं व कार्यों में वह सब प्रदर्षित होगा जिसका आपने उल्लेख किया है | हम अपने कार्यों को वैग्यानिक अर्थात प्रकृतिक ढंग से क्यों न बढाएं | सहज पके सो मीठा होए | आपकी मधुर परिकल्पनाएं हमारे विद्वान आर्य वीरों को प्रेरित करें, ऐसी शुभकामनाओं सहित |
आनन्द‌

न‌मस्ते

न‌मस्ते जी
प्रथम बार पढ़ने में दिक्कत‌ के कारण समझ नही आया था | अब ध्यान से पढ़ा तो आनन्द आ गया | अति सुन्दर ,मार्ग दर्शक लेख के लिए बधाई |
आनन्द‌