Skip navigation.
कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

उपासना का वैदिक स्वरूप (6) लेखक श्री स्वामी आत्मानन्द सरस्वती जी

* ओउम् *

...ज्ञान इन्द्रियों और बुद्धियों को प्रकाश इसी ज्योति से प्राप्त हुए हैं | अन्तः करण में सत्वगुण के प्रादुर्भाव से उसमें इस ज्योति का उदय होता है | इसके विपरीत इस में रजोगुण और तमोगुण के प्रादुर्भाव से अनेक प्रकार के मलों का संग्रह होने लग जाता है | प्रकाश नामक विद्या का तिरोभाव होते ही इसमें अविवेक का जन्म हो जाता है | अविवेक के प्रकट होते ही रजोगुण अपना प्रभाव दिखाना आरम्भ कर देता है और अन्तः करण को विक्षिप्त कर देता है | अवसर पाने पर तमोगुण भी अपना प्रभाव किये बिना नहीं रहता, और अज्ञान अथवा विपरीत ज्ञान की सृष्टि करने लग जाता है | अब यह अज्ञान, विपरीत ज्ञान और ज्ञान भी समय समय पर अन्तःकरण का रूपान्तर परिवर्तित करते हुए उस में अनेक प्रकार के संस्कारों को जन्म देना आरम्भ कर देता है | भिन्न प्रकार के ज्ञानों का नाम ही वृत्ति है | संस्कारों की उत्पत्ति इन्हीं वृत्तियों ने की है | फिर तो संस्कार भी वृत्तियों को जन्म देना आरम्भ कर देते हैं | और फिर वृत्तियों से संस्कार और संस्कारों से वृत्तियें यह चक्र निरन्तर चलना आरम्भ हो जाता है | जिस प्रकार जल में अनेक प्रकार के मल थे इसी प्रकार अन्तःकरण में भी संस्कार विक्षेप और अविद्या आदि अनेक प्रकार के मल हैं | और जिस प्रकार जल के मल को सूर्य की किरणों के झुण्ड ने भस्म किया था उसी प्रकार इस अन्तःकरण के मल का संहार भगवान् के ज्ञान की किरणों के समुदाय से होगा |

(अब गतांक से आगे) -

यद्यपि हम पहले लिख् आये हैं कि भगवान की सत्ता सर्वत्र विद्यमान है और इसी लिए उसके ज्ञान की किरणों से भी कोई स्थान रिक्त नहीं, परन्तु अंतःकरण ऊपर दिखलाये गये मलों से भरपूर है, विक्षेप से चंचल है और उसपर आवरणों का परदा पड़ा हुआ है | अतः उसमें विद्यमान होती हुई भी भगवान् के ज्ञान की किरणें आत्मा की विज्ञान सम्पत्ति को बढ़ाने में समर्थ नहीं होतीं | इसीलिये इस वेदमन्त्र के द्वारा भक्त भगवान से प्रार्थना करता है : -

"सुनिरजं सुविकृतं कृणुष्व"

भगवान् ! मेरे अन्तः करण के मल आदि को दूर फेंक दो और सत्वगुण के प्रदुर्भाव से इसके आवरण का गढ़ तोड़ कर इसका विकास कर दो |

भक्त बन्धन के ऐसे जाल से जकड़ा हुआ है कि उसकी गांठें उसके हाथों से खुलने वाली नहीं हैं | वह एक को खोलने लगता है तो संस्कार की दो और ग्रन्थियां आकर उसे जकड़ लेती हैं | एकान्त स्थान में बैठ कर अन्तःकरण को एकाग्र करने का यत्न करने लगता है, तो एक के बाद दूसरी और फिर तीसरी इस प्रकार अनेक वृत्तियांआ आकर विक्षेप डालना प्रारम्भ कर देती हैं | उसके अपने सब प्रयत्न जब विफल हो जाते हैं तो विवश होकर जगदीश की शरण लेता है | कहता है कि भगवन् ! मैंने बहुत यत्न किया, अब तो दोषों को दूर फेंक इस अन्तःकरण को आप ही निर्मल कीजिए | परन्तु इतनी प्रार्थना कर देने मात्र से भी तो भक्त का काम बनने वाला नहीं है | भगवान इतना अनन्त है कि सहायता के लिए उसके पास तक पहुंचना भी दुष्कर है | हमारी तो सत्ता ही क्या है : -

नहि त्वा रोदसी उभे ऋधायमाणमिन्वतः |
जेषः स्वर्वतीरपाः संगा अस्मभ्यं धूनुहि || ऋक् 1|10|8||

अर्थ - हे भगवन् ! (ऋधायमाणम्) परिचर्या के योग्य आपको (रोदसी) द्युलोक और भूलोक में भी (न इन्वतः) व्याप्त नहीं कर सकते (स्वर्वतीः अपः) आनन्द प्राप्त कराने वाले कर्मों पर (जेषः)विजय पाने के लिए (अस्मभ्यम्) हमारे लिए (गाः) इन्द्रियों को (सन्धूनुहि) भली प्रकार कार्यों में संयुक्त कराइये |

भगवान् व्यापक है और अनन्त है | इतने विशाल भूलोक और द्युलोक भी उसका पार नहीं पा सकते | फिर हमारे जैसे साधारण एक देशी जीवों की तो गणना ही क्या है ?

यह ठीक है कि हम भगवान् का पार नहीं पा सकते और इसलिए उस सारे का आलिङ्गन भी नहीं कर सकते ! भगवान् तो क्या हम तो सारे सौर मण्डल का भी पार नहीं पा सकते | प्रर‌न्तु इसका यह अर्थ नहीं कि सूर्य की जो किरणें हम तक पहुंचती हैं उनसे भी हम कोई लाभ नहीं उठा सकते | यदि हम अन्धेरी कोठरी मैं बन्द होकर बैठ जावें तो निश्चय ही वे किरणें हमें उतना लाभ नहीं पहुंचा सकेंगी | परन्तु जब हम द्वार खोल कर अपने पास उन्हें आने देते हैं तो अवश्य ही वे अपने संसर्ग मात्र से हमें लाभ पहुँचायेगीं |

इसी प्रकार यद्यपि अनन्त होने के कारण हम भगवान् का पार् नहीं पा सकते परन्तु हमारे अपने ही अन्दर विद्यमान भगवान् के गुण कर्म स्वभाव से लाभ उठाना हमारे लिए सर्वथा सम्भव है |

भगवान् "ऋधायमाण हैं, हमारी पूजा के पात्र हैं | उनकी पूजा है उनके एक एक गुण, कर्म और स्वभाव को अपने अन्दर धारण करना | यह ही उसके ज्ञान की किरणों के समूह से अपने आत्मा को प्रभावित करना है | 'स्वर्वतीः अपः' स्वर्ग को प्राप्त कराने वाले कर्म इन्हीं को कहते हैं | जो इस जन्म के तथा पूर्व जन्म के कर्म, मन आदि इन्द्रियों को अभ्यरत‌ हैं उन्हीं की पुनरावृत्ति निरन्तर चलती रहती है | उनका परिणाम दुःख होता है सुख नहीं | भक्त इन कर्मों की दशा बदलना चाहता है वह उन्हें दुःखगामी नहीं सुखगामी बनाना चाहता है | दुःखगामी कर्मों पर विजय पाना चाहता है | और उसके स्थान पर सुखगामी कर्मों का अभिषेक करना चाहता है और इसलिये कह रहा है -

:अस्मभ्यं गाः सन्धूनुहि" हमारे लिए इन्द्रियों को कम्पाईये = तपाईये |

कर्मों का स्त्रोत इन्द्रियां ही हैं | मन अन्तर कर्मों के जनक हैं | इन्हें जैसे कर्म करने का अभ्यास है वे सब ही सुखगामी नहीं हैं अधिकांश में दुःखगामी हैं | इनके इस विपरीत प्रवाह को बदलने के लिए इन्द्रियों के विरोध की अर्थात् उनको तपाने की आवश्यक्ता पड़ेगी | ज्यों ही वेग से चलते हुए वाण को हम रोकना चाहते हैं, रोकने के लिए उसके सामने किसी ढाल जैसी कठोर वस्तु को खड़ा कर देते हैं तो उसका धक्का लगते ही वाण में ताप और कम्पन दोनों को एक साथ ही देखते हैं | यह ही दशा वेग से दौड़ने वाले इन्द्रियों की है ज्योंहि भक्त इनके सामने आत्मा में अथवा अन्तःकरण में भगवान् के गुणों की ढाल खडी कर देता है तो विपरीत शक्ति के सामने आते ही ये सहसा तप कर कांपने लग जाती हैं और विवश इन्हें विरुद्ध होना पड़ता है |

इस विषय का वर्णन योग दर्शन में भी है | महर्षि पतञ्जलि ने अपने योगशास्त्र में इन्द्रियों को तपाने के सधन बताये हैं | 'यम और नियम' | इन साधनों का दिग्दर्शन ऋषि के ही शब्दों में हम आगे कराते हैं |

"अहिंसा सच्यास्तेय ब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाः"

अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह ये पाँच यम हैं |

"शौचसन्तोषतपः स्वाध्यायेश्‍व‌रप्रणीधानानि नियमाः"

शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय और ईश्‍वर प्रणिधान ये पाँच नियम हैं | मन, वाणी और कर्म से किसी को कष्‍ट न देने का नाम अहिंसा है | इस लक्षण के अनुसार अहिंसा का कार्य क्षेत्र मन के द्वारा सब ज्ञान इन्द्रियें और कर्म के द्वारा सब कर्म इन्द्रियें हैं | सत्य का वाणी, अस्तेय का मन, हाथ और पैर, ब्रह्मचर्य का जननेन्द्रिय और अपरिग्रह का सब ही ज्ञानेन्द्रियें और कर्मेन्द्रियें कार्य क्षेत्र हैं | क्योंकि अपरिग्रह आवश्‍यक्ता से अधिक संग्रह न करने का नाम है | अतः इसे सिद्ध करने के लिए सभी इन्द्रियों के विषयों का अधिक प्रयोग छोड़ देना पड़ेगा |

(क्रमशः)