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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

महात्मा नारायण स्वामी जी की कठोपनिषद्' पर टीका - प्रथमा वल्ली(1)

उशन् ह व वाजश्रवसः सर्ववेदसं ददौ|
तस्य ह नचिकेता नाम पुत्र आस‌ ||1||
तं. ह कुमारं. सन्तं दक्षिणासु |
नीयमानासु श्रद्धाSSविवेश सोSमन्यत ||2||
पीतोदका जग्धतृणा दुग्ध्दोहा निरिन्द्रियाः |
अनन्दा नाम ते लोकास्तान् स गच्छति ता ददत् ||3||

अर्थ - (ह, वै) कहते हैं (वाजश्रवसः) वाजश्रवा के पुत्र ने (उशन्) फल की कामना से (सर्ववेदसम्) सब कुछ‌ (ददौ) दान किया (तस्य) उसका (ह)प्रसिद्ध‌ (नचिकेता नाम पुत्रः,आस) नचिकेता नाम वाला पुत्र था ||1||

(कुमारम्, सन्तम्, ह) कुमार होने पर भी (तं) उसको (दक्षिणासु) दान किये हुए पदार्थों के (नीयमानासु) विभाग करते समय (श्रद्धा) आस्तिक बुद्धि (आविवेश) उत्पन्न हुई (सः,अमन्यत) वह सोचने लगा ||2||

(पीतोदकाः) जो (गायें) जल पी चुकी हैं, (जग्धतृणाः) तृणभक्षण कर चुकी हैं, (दुग्ध्दोहाः) जिनका दूध दुहा जा चुका है, (निरिन्द्रियाः) बच्चा पैदा करने में असमर्थ हो चुकी हैं, (ताः) उन्हें (ददत्) जो दान करता है (सः) वह (अनन्दाः नाम ते लोकाः) आनन्द रहित जो लोक हैं (तान्) उनको (गच्छति) जाता है ||3||

व्याख्या - यह उपनिषद् एक आख्यायिका के रूप में है - वाजश्रवस का पुत्र नचिकेता था | उसने यम नामक एक विद्वान व्यक्ति से शिक्षा प्राप्त की , जिस (शिक्षा) का नाम कठोपनिषद् है | कोई कोई व्यक्ति वाजश्रवा का अर्थ प्राण* करके नचिकेता जीवात्मा** को ठहराते हैं और इस प्रकार जीवात्मा को प्राण का पुत्र बतलाकर कहते हैं कि उसने यम***(मृत्यु से शिक्षा उपलब्ध की थी परन्तु यह अलंकार बहुत उपयुक्त नहीं है | इसलिये हमने उपनिषद् को एक सरल आख्यायिका समझते हुए ही उसकी टीका की है | जब वाजश्रवा ने सर्वमेध यज्ञ किया अर्थात् जो कुछ उसके पास था सब दान करने लगा, तब स्पष्‍ट‌ है कि सब चीजें अच्छी नहीं हो सकती थीं इसलिए उनमें कुछ चीजें निकम्मी भी थीं जैसे बिना दूध देने या न दे सकने वाली गायें | जब वाजश्रवा ने इन (निकम्मी गायों) का भी दान कर दिया तब उसका पुत्र नचिकेता आस्तिक बुद्धि से प्रेरित होकर सोचने लगा कि जो दानी ऐसी (निकम्मी) वस्तुओं का दान करते हैं वे आनन्दरहित लोकों को प्राप्त होते हैं | भाव इसका यह है कि ऐसा दान दान नहीं किन्तु कुदान है जिससे उसका कुछ उपकार नहीं हो सकता अपितु उस पर वह भार रूप होता है |

स‌‌ होवाच पितरं तत् कस्मै माँ दास्यसीति |
द्वितीयं तृतीयं तँहोवाच मृत्यवे त्वा ददामीति ||4||

अर्थ - (सः‌ ह) वह नचिकेता (पितरम्) पिता से (उवाच) बोला (तत्) हे तात ! (माम्) मुझको (कस्मै) किसे (दास्यसि) देंगे ? (द्वितीयम्) दुबारा (तृतीयम्) तिबारा कहने पर पिता ने क्रुद्ध होकर (तम्) उससे (उवाच) कहा कि (मृत्यवे) मृत्यु के लिए (त्वा) तुझे (ददामि इति) देता हूँ ||4||

व्याख्या - नचिकेता ने सब कुछ देते हुए देखकर अपने सम्बन्ध में पूछा कि मैं किसे दिया जाउँगा ? पिता के उत्तर न देने पर जब उसने दुबारा, तिबारा अपना प्रश्न‌ दोहराया तो वाजश्रवा ने अप्रसन्न होकर कहा कि तुझे मौत के हवाले करता हूँ | उत्तर के दो अर्थ हो सकते थे | एक तो केवल अप्रसन्नता, मौत के हवाले करना, इन शब्दों का अनिष्‍ट और अप्रसन्नता सूचक होना तो स्पष्ट ही है | उत्तर का दूसरा भाव यह था कि मृत्यु नाम के किसी गृहस्थ विद्वान के लिए नचिकेता को देना | नचिकेता पिता की अप्रसन्नता समझते हुए भी दूसरे अर्थ का लेना ही अपने लिए श्रेयस्कर समझकर घर से चल दिया |

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* निघण्टु अ. 2 ख.7, 10 में वाज अन्न और श्रवः धन का नाम बतलाया गया है | स्पष्‍ट है कि अन्नवान् और धनवान् जो गृहस्थ हों उनका नाम् वाजश्रवा उचित रीति से हो सकता है | जो लोग इसका अर्थ प्राण करते हैं वे कहते हैं कि अन्न (अन्नमयकोष) ही जिसका धन है वह प्राण है इसलिए वाजश्रवा प्राणवाचक हुआ |

** "न चिकेतते विचेष्‍टत इति नचिकेताः |" अर्थात जो स्वभाव ही से पुण्य-पाप (सुख-दुःख) के प्रपंच से पृथक हो वह नचिकेता है | नचिकेता जीव होने से प्राण का पुत्र है, यह कल्पना असंगत है | जीव नित्य और प्राण अनित्य होने से पुत्र पिता से पहले हो जाता है |

*** यम के कई नाम उपनिषद् में लिए गये हैं | उसे मृत्यु, अन्तक, वैवस्वत आदि कहा गया है |

(क्रमशः)