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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

महर्षि दयानन्द कृत आर्याभिविनयः से (44)

***ओउम्***

स्तुति विषय

सो विश्‍वस्य जगतः प्राणतस्पतिर्यो ब्रह्मणें प्रथमो गा अविन्दत् |
इन्द्रो यो दस्यूँरधराँ अवातिरन् मरुवन्तं सख्याय हवामहे | ||44||
ऋ. 1|7|12|5||

व्याख्यान -

हे मनुष्यो । जो सब जगत् (स्थावर) जड़ अप्राणी का और "प्राणतः" चेतना वाले जगत् का "पतिः" अधिष्‍ठाता और पालक है, तथा जो सब जगत् के प्रथम सदा से है | और "ब्रह्मणे, गाः, अविन्दत्" जिसने यही नियम किया है कि ब्रह्म अर्थात् विद्वान के ही लिए पृथिवी का लाभ और उसका राज्य है | और जो "इन्द्रः" परमऐश्‍वर्यवान् परमात्मा डाकुओं को "अधरान्" नीचे गिराता है, तथा उनको मार ही डालता है, "मरुत्वन्तं, सख्याय, हवामहे" आओ मित्रो भाई लोगो ! अपने सब सम्प्रीति से मिलके मरुत्वान् अर्थात् परमानन्द बल वाले इन्द्र परमात्मा को सखा होने लिए अत्यन्त प्रार्थना से गद्‍गद होके बुलावें | वह शीघ्र ही कृपा करके अपने से सखित्व (परम मित्रता) करेगा | इसमें कुछ सन्देह नहीं ||44||

From MAHARSHI DAYANAND SARASWATI's 'ARYABHIVINAY'

अर्थ् तो

अर्थ् तो थिक् लिखा है मे प्र्तेक् अर्थ् को जान्ने के लिये क्या करु\

जैसा ऋषि

जैसा ऋषि की पुस्तक में है वैसा ही लिखा है | इसमें "" के भीतर मूल मन्त्र का शब्द‌ है, जिसके आगे उसका अर्थ है |