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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

वेदो में विज्ञान व शिल्पविद्या के रहस्य (18)

समोहे बा य आशत नरस्तोकस्य सनितौ |
विप्रासो वा धियायवः ||6||
ऋग्वेद ।|8|6||

पदार्थ - (विप्रासः) जो अत्यन्त बुद्धिमान् (नरः) मनुष्य हैं, वे (समोहे) संग्राम के निमित्त शत्रुओं को जीतने के लिये (आशत्) तत्पर हैं (वा) अथवा (धियायवः) जो कि विज्ञान देने की इच्छा करनेवाले हैं, वे (तोकस्य) सन्तानों के (सनितौ) विद्या की शिक्षा में (आशत) उद्योग करते रहें ||6||

भावार्थ - ईश्‍वर सब मनुष्यों को आज्ञा देता है कि ..इस संसार में मनुष्यों को दो प्रकार का काम करना चाहिये | इनमें से जो विद्वान हैं वे अपने शरीर और सेना का बल बढ़ाते और दूसरे उत्तम विद्या की वृद्धि करके शत्रुओं के बल का सदैव तिरस्कार करते रहें | मनुष्यों को जब जब शत्रुओं के साथ युद्ध करने की इच्छा हो तब तब सावधान् होके, प्रथम उनकी सेना आदि पदार्थों से कम से कम अपना दोगुना बल करके उनके पराजय से प्रजा की रक्षा करनी चाहिये | तथा जो विद्याओं के पढ़ाने की इच्छा करने वाले हैं, वे शिक्षा देने योग्य पुत्र वा कन्याओं को यथायोग्य विद्वान करने में अच्छे प्रकार यत्न करें, जिससे शत्रुओं के पराजय और अज्ञान के विनाश से चक्रवर्ति राज्य और विद्या की वृद्धि सदैव बनी रहे ||6||

यः कुक्षिः सोमपातमः समुद्रइव पिन्वते |
उर्वीरापो न काकुदः ||7||
ऋग्वेद ।|8|7||

पदार्थ - (समुद्र इव) जैसे समुद्र को जल (आपो न काकुदः) शब्दों के उच्चारण आदि व्यवहारों को करानेवाले प्राण वाणी को (पिन्वते) सेवन करते हैं, वैसे (कुक्षिः) सब पदार्थों से रस को खींचने वाला तथा (सोमपातमः) सोम अर्थात् संसार के पदार्थों का रक्षक जो सूर्य है वह (उर्वीः) सब पृथिवी को (पिन्वते) सेवन व सेवन करता है ||7||

भावार्थ - इस मन्त्र में दो उपमालङ्कार हैं | ईश्वर ने जैसे जल की स्थिति और वृष्‍टि का हेतु समुद्र तथा वाणी के व्यवहार का हेतु प्राण बनाया है, वैसे ही सूर्य्यलोक वर्षा होने, पृथिवी के खींचने, प्रकाश और र्सविभाग करने का हेतु बनाया है इसी से सब प्राणियों के अनेक व्यवहार सिद्ध होते हैं ||7||

एवा ह्यस्य सूनृता विरप्शी गोमती मही |
पक्वा शाखा न दाशुषे ||8||
ऋग्वेद ।|8|8||

पदार्थ - (पक्वा शाखा न) जैसे आम और कटहर आदि वृक्ष, पकी डाली और फलयुक्त होने से प्राणियों को सुख देने वाले होते हैं, (अस्य हि) वैसे ही इस परमेश्वर की (गोमती) जिसको बहुत से विद्वान सेवन करनेवाले हैं, जो (सूनृता) प्रिय और सत्य वचन प्रकाश करने वाली (विरप्शी) महाविद्यायुक्त और (मही) सबको सत्कार करने योग्य चारों वेदों की वाणी है, सो (दाशुषे) पढ़ने में मन लगाने वालों को सब विद्याओं का प्रकाश करनेवाली है |

तथा (अस्य हि) जैसे इस सूर्यलोक की (गोमती) उत्तम मनुष्यों के सेवन करने योग्य (सूनृता) प्रीती के उत्पादन करनेवाले पदार्थों का प्रकाश करने वाली (विरप्‍शी) बड़ी से बड़ी (मही) बड़े-बड़े गुणयुक्त दीप्‍ति है ; वैसे वेदवाणी (दाशुषे) राज्य की प्राप्‍ति के लिये राज्यकर्मों में चित्त देने वालों को सुख देनेवाली होती है ||8||

भावार्थ - इस मन्त्र में उपमालङ्कार है | जैसे विविध प्रकार से फल-फूलों से युक्त आम और क‌टहर आदि वृक्ष नाना प्रकार के फलों के देनेवाले होके सुख देनेहारे होते हैं, वैसे ही ईश्‍वर से प्रकाश की हुई वेदवाणी बहुत प्रकार की विद्याओं को देनेहारी होकर सब मनुष्यों को परम आनन्द देनेवाली है | जो विद्वान लोग इसको पढ़ के धर्मात्मा होते हैं, वे ही वेदों का प्रकाश और पृथिवी में राज्य करने को समर्थ होते हैं ||8||

एवा हि ते विभूतय ऊतय इन्द्र मावते |
सद्यश्चित्सन्ति दाशुषे ||9||
ऋग्वेद ।|8|9||

पदार्थ - हे (इन्द्र) जगदीश्‍वर ! आपकी कृपा से जैसे (ते) आपके (विभूतयः) जो जो उत्तम ऐश्‍वर्य और (ऊतयः) रक्षा विज्ञान आदि गुण मुझ को प्राप्त (सन्ति) हैं, वैसे (मावते) मेरे तुल्य (दाशुषे चित्) सबके उपकार और धर्म में मन को देनेवाले पुरुष को (सद्य एव) शीघ्र ही प्राप्त हों ||9||

भावार्थ - इस मन्त्र में लुप्‍तोपमालङ्कार है | ईश्‍वर की आज्ञा का प्रकाश इस रीति से किया है कि - जब मनुष्य पुरुषार्थी होके सब का उपकार करनेवाले और धार्मिक होते हैं, तभी वे पूर्ण ऐश्‍वर्य और ईश्‍वर की यथायोग्य रक्षा आदि को प्राप्त होके सर्वत्र सत्कार के योग्य होते हैं ||9||

एवा ह्यस्य काम्या स्तोम उक्थं च शंस्या |
इन्द्राय सोमपीतये || 10||
ऋग्वेद ।|8|10||

पदार्थ - (अस्य) जो जो इन चार् वेदों के काम्य अत्यन्त मनोहर (शंस्ये) प्रशंसा करने योग्य कर्म वा (स्तोमः) स्तोत्र हैं, (च) तथा (उक्थम्) जिनमें परमेश्‍वर के गुणों का कीर्तन है, वे (इन्द्राय) परमेश्‍वर की प्रशंसा के लिये हैं | कैसा वह परमेश्‍वर है कि जो (सोमपीतये) अपनी व्याप्ति से सब पदार्थों के अंश अंश में रम रहा है ||10||

भावार्थ - जैसे इस संसार में अच्छे-अच्छे पदार्थों की रचना विशेष देखकर उस रचनेवाले की प्रशंसा होती है, वैसे ही संसार के प्रसिद्ध और अप्रसिद्ध अत्युत्तम पदार्थों तथा विशेष रचना को देखकर ईश्‍वर ही को धन्यवाद दिये जाते हैं | इस कारण से परमेश्‍वर की स्तुति के समान वा उससे अधिक किसी की स्तुति नहीं हो सकती ||10||

(महर्षि दयानन्द सरस्वती के ऋग्वेदभाष्य पर आधारित एवं संक्षेप में उद्दृत्)
THE SECRETS OF SCIENCE & TECHNOLOGY IN VEDAS (18)
(Based on & Reproduced from Maharshi Dayanand Saraswati's RIGVED BHASHYA)