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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

मथन करने से आत्मज्ञान प्राप्ति

ओ३म् !
त्वामग्ने अङ्गिरसो गुहा हितमन्वविन्दञ्छिश्रियाणं वनेवने |
स जायसे मथ्यमान: सहो महत् त्वामाहु: सहसस्पुत्रमङ्गिर: ||
(ऋग्वेद 5.11.6)

शब्दार्थ:

हे अग्ने ! = अग्ने
अङ्गिरस: = आत्मरस के रसिक
वनेवने = वन वन में
शिश्रियाणम् = निरन्तर रहने वाले
त्वाम् = तुझको
गुहाहितम = हृदय‌गुफा में छिपा
अनु + अविन्दन् = पाते हैं
स: = वह तू
मध्यमान: = मथन करने से
जायसे = प्रगट होता है
महत् = महान
सह: = सहन सामर्थ्य है
अङ्गिरा: = आत्मरस प्रदाता
त्वाम् = तुझको
सहस: + पुत्रम् = बल का शोधक और रक्षम
आहु: = कहते हैं
हे अग्ने ! आत्मरस के रसिक वन वन में निरन्तर रहने वाले तुझको हृदय‌गुफा में छिपा पाते हैं | वह, तूं मथन करने से प्रगट होता है | तूं महान सहन सामर्थ्य है | हे आत्मरसप्रदात: ! तुझको बल का शोधक और रक्षम कहते हैं |

(स्वामी वेदानन्द तीर्थ सरस्वती)

व्याख्या :

भगवान की खोज हो रही है | वेद में एक दुसरे स्थान पर कहा है - जैसे पशु‍-चोर के खोजी खुर देखते हैं , ऐसे ही उस चित्तचोर की खोज होती है | हम डर‌ते हैं चोरी न हो जाए | लेकिन जिनकी चोरी हो गई , जिनके चित्त को यह चित्तचोर ले गया , उनकी व्याकुलता का क्या ठिकाना ? जिसकी कोई वस्तु कभी चोरी हो गई हो , उससे पूछो | जिस तन लागे सोई जाने | वह क्या जाने पीर पराई , जिसके पैर न फटी बिवाई | भाई जन्मजन्मान्तरों से , या यों कहो लगभग अनादिकाल से , ब्रह्मधाम से लौटने के बाद से हमारी एक ही निधि थी, वह था हमारा चित ! अमृत धन के लालच में आकर हम उस चित्त धन को गवां बैठै | किसी ने बता दिया कोई उसे चुरा ले गया है | थाने में रपट लिखाई नहीं जा सकती | द्युलोक के राजपुरुषों से वास्ता पड़ा | उन्होने पता बताया कि वह सब जगह है | हम वन वन में उसे ढूँढने लगे | जंगल-पहाड़ , नदी-नाले, अरण्य , ताल , समुद्र सब खोज लिए | किसी ने बताया, श्रीमन् : चितचोर गुफा में छुपे बैठे हैं | हम प्रस‌न्न हो गये कि चोर पकड़ा गया | चोर के पकड़े जाने से आनन्द का होना स्वाभाविक है |चोरी हुए सामान की प्राप्ति की सम्भावना हो गई है | गुफा में घोर अन्धकार है , दिखाई नहीं देता | कैसे देखें , कैसे पकड़ें |
वेद ने कहा _ स जायसे मथ्यमान: |
अरणियों का मथन करो |दियासलाई को रगड़ो , फिर वह प्रग‌ट होगा | अरणी रगड़ी , दियासलाई जलाई | अरे यह आग पैदा हो गई | यह क्या | सब अन्धेरा दूर | प्रकाश ही प्रकाश ! आग बुझने न पाये , कोई वायु का झोंका न लग जाए | वायु है तो अग्नि का सखा , किन्तु आग को बुझा भी दिया करता है |ऋषि ने कहा भी है
अग्निर्यत्राभिमथ्य‌ते वायुर्यत्राधिरुध्यते | (श्वेताश्वतरोपनिषद् 2.6)
अग्नि का जहाँ मथन किया जाता है , वायु को जहाँ रोका जाता है | देखा नही ! दियासलाई जलाते हुए ओट करते हैं , कहीं वायु के झोंके से बुझ न जाए | विषयवासना की हवा आत्म‌ज्यानाग्नि को बुझा देती है | सावधान रहो ! गूढ़ अन्धकार में थोड़ा सा भी प्रकाष बहुत सहायक होता है , अत: कहा -
सहो महत् त्वामाहु: _
तुझे महाबल कहते हैं |
वृत्र को , अन्धकार को नाश करने वाला यदि महाबल नहीं तो, और क्या है ? हमारा चित्त भी महाबल था , परन्तु उसमें महामल भी था | इस अग्नि में पड़कर वह शुद्ध हो गया है , उसके मल जल गये हैं | इसी से उसको -
आहु: सहसस्पुत्रम् = बल का शोधक और रक्ष‌क कहते हैं | गये थे उसे पकड़ने और अपना माल वापिस लेने , किन्तु वह ऐसा निकला , उसने हमें कुछ पिला दिया है | उस अंगिरा: ने , रसीले रस के दाता ने हमे अङिरस बना दिया है | हमें भुला दिया है | अच्छा है भूले रहें | अंङ्गिरस बने रहें |

(स्वाध्याय सन्दोह से साभार‌)