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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

वेद सर्वजनहितकारी

ओउम् | या ते अग्ने पर्वतस्येव धरासश्‍च‌न्ती पीपयद्देव चित्रा |
तामस्मभ्यं प्रमतिं जातवेदो वसो रास्व सुमतिं विश्‍व‌जन्याम् ||
ऋग्वेद 3|57|6

शब्दार्थ -

अग्ने.........................सबको ज्ञानप्रकाश से प्रकाशित करनेवाले ! सबको आगे ले जानेवाले
देव...........................प्रकाशस्वरूप प्रभो !
या.............................जो
ते.............................तेरी
पर्वतस्य+इव.................पर्वत की धारा के समान
असश्‍च‌न्ति...................संसक्त न होती हुई
चित्रा..........................विचित्र , अद्‍भुत
धारा..........................वेदमयी ज्ञानधारा
पीपयद्......................निरन्तर ज्ञान दान कर रही है, हे
वसो..........................सबको वसानेवाले,
जातवेदः.......................सबमें रहनेवाले, प्रत्येक पदार्थ के ज्ञाता ! सर्वज्ञ भगवन् !
असम‌भ्यम्...................हमें
ताम्..........................वह
प्रमतिम्......................उत्तम बोध देनेवाली
विश्‍व‌जन्याम्................सर्वजनहितकारिणी
सुमतिम्......................वेदरूप कल्याण-मति
रास्व.........................दो, दान करो |

व्याख्या -

वेद वह ज्ञानधारा है, जो सृष्टि के आरम्भ में मानव-समाज के हित के लिए भगवान् ने बहाई | पहाड़ पर पड़ी जलधारा पहाड़ पर न अटक कर चारों और बह निकलती है | ऐसे ही दिव्य ज्ञानधारा भी सभी देशों, सभी मनुष्यों की और बहती है, कहीं अटकती नहीं | सभी इसके अधिकारी हैं | इसीलिए इसको विश्‍व‌जन्या = सब जनों की हितकारिणी कहा | कुछ लोग इस धारा को कहीं रोकना चाहते हैं, इसमें सड़ाँद पैदा करना चाहते हैं | रुका जल हानि ही करता है | ज्ञान भी रुकने पर रोकनेवाले का नाश कर देता है | आज का भारत इसका निदर्शन है | वेद सबके लिए हैं, इसका वेद में बार-बार उल्लेख हुआ है | प्रमादि मनुष्य को चिताने के लिए बार-बार कहा गया है | भगवान् कहते हैं पंचजना मम होत्रं जुषध्व‌म् सभी जन मेरी पुकार को सुनें | यजुर्वेद 26|2 में कहा है ‍-

यथेमां वाचं कल्याणीमावदानि जनेभ्यः |
.ब्रह्मराजन्याभ्यां शूद्राय चार्य्याय च स्वाय चारणाय च ||

जैसे मैं यह कल्याणकारी वेदवाणी मनुष्यमात्र के लिए कह्ता हूँ | ब्राह्मण, क्षत्रिय, शूद्र, वैश्य, अपने-पराये सभी के लिए करता हूँ | प्रभु का बनाया सूर्य्य सबके लिए, चन्द्र सबके लिए, जल सबके लिए, पृथिवी सबके लिए | किन्तु इन पदार्थों का उपयोग बतानेवाला प्रभु का दिया ज्ञान सबके लिए नहीं ? अब्रह्मण्यम् ! शान्तं पापम् ? यदि सबके लिए नहीं तो भगवान् ने उन्हें कान और ज्ञान-आधान के साधन क्यों दिये ? वेद विश्‍व‌जन्य हैं, कल्याणी वाक् सभी का हित करेगी, सभी का कल्याण करेगी | वेदवाणी प्रमति है , उत्तम ज्ञान की खान है, सुमति है, दुर्मति नहीं अर्थात् वेद में मानव-समाज के उत्कर्ष के साधन वर्णित हैं | ऐसी कोई भी शिक्षा वेद में नहीं, जिससे मनुष्य का पतन सम्भव हो | ऐसे उत्तम सुमतिदाता ज्ञान का त्याग क्यों मनुष्य ने किया ? .वेद हैं चित्र = अद्‍भुत् | इसमें ब्रह्मज्ञान है, इसमें जीव की चर्चा है, प्रकृति का बखान है | आग का विधान है, जल का भी वर्णन है | पृथिवी का गान है, तो द्यौ का भी बखान है | मनुष्योपयोगी कोई भी पदार्थ ऐसा नहीं, जिसका वेद में व्याख्यान न हो | ऐसे सर्वविद्यानिधान के त्याग से आज मानव-समाज पीड़ित है | नहीं-नहीं, मानव मानव नहीं रहा | इसे पुनः मानव बनाने के लिए वेद को अपनाना होगा |

स्वामी वेदानन्द तीर्थ सरस्वती
(स्वाध्याय-सन्दोह से साभार)