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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

अथ वेदविषयविचारः (6)

(गतांक से आगे) -

प्र. - जो यज्ञ से वायु और वृष्टिजल की शुद्धि करना मात्र ही प्रयोजन है, तो इसकी सिद्धी अतर और पुष्पादि के घरों में रखने से भी हो सकती है , फिर इतना बड़ा परिश्रम यज्ञ में क्यों करना ?
उ. - यह कार्य्य अन्य किसी प्रकार से सिद्ध नहीं हो सकता | क्योंकि अतर और पुष्पादि का सुगन्ध तो उसी दुर्गन्ध वायु में मिल के रहता है , उसको छेदन करके बाहर नहीं निकाल सकता, और न वह ऊपर चढ़ सकता है, क्योंकि उसमें हल्कापन नहीं होता | उसके उसी अवकाश में रहने से बाहर का शुद्ध वायु उस ठिकाने में जा भी नहीं सकता, क्योंकि खाली जगह के बिना दूसरे का प्रवेश नहीं हो सकता | फिर सुगन्ध और दुर्गन्धयुक्त वायु के वहीं रहने से रोगनाशादि फल भी नहीं होते |

यदा तू खलु...
भाषार्थ - और जब अग्नि उस वायु को वहां से हल्का करके निकाल देता है, तब वहां शुद्ध वायु भी प्रवेश कर सकता है | इसी कारण यह फल यज्ञ से ही हो सकता है, अन्य प्रकार से नहीं | क्योंकि जो होम के परमाणुयुक्त शुद्ध वायु है, सो पूर्वस्थित दुर्गन्धवायु को निकाल के, उस देशस्थ वायु को शुद्ध करके, रोगों को नाश करनेवाला होता, और मनुष्यादि सृष्टि को उत्तम सुख को प्राप्त करता है |

यो होमेन...
भाषार्थ - जो वायु सुगन्धादि द्रव्य के परमाणुओं से युक्त होम द्वारा आकाश में चढ़ के वृष्टिजल को शुद्ध कर देता और उससे वृष्टि भी अधिक होती है, क्योंकि होम करके नीचे गर्मी अधिक होने से जल भी ऊपर अधिक चढ़ता है | शुद्ध जल और वायु के द्वारा अन्नादि औषधि भी अत्यन्त शुद्ध होती है | ऐसे प्रतिदिन सुगन्ध के अधिक होने से जगत् में नित्यप्रति अधिक अधिक सुख बढ़ता है | यह फल अग्नि में होम करने के बिना दूसरे प्रकार से होना असम्भव है | इससे होम का करना अवश्य है |

अन्यच्च दूरस्थले...
भाषार्थ - और भी सुगन्ध के नाश नहीं होने में कारण हैं कि किसी पुरुष ने दूर देश में सुगन्ध चीजों का अग्नि में होम किया हो, उस सुगन्ध से युक्त जो वायु है, सो होम के स्थान से दूर देश में स्थित हुए मनुष्य के नाक इन्द्रिय के साथ संयुक्त होने से उसको यह ज्ञान होता है कि यहां सुगन्ध वायु है | इससे जाना जाता है कि द्रव्य के अलग अलग होने में भी द्रव्य का गुण् द्रव्य के साथ ही बना रहता है, और वह वायु के साथ सुगन्ध और दुर्गन्धयुक्त सूक्ष्म होके जाता आता है | परन्तु जब वह द्रव्य दूर चला जाता है, तब उसके नाक इन्द्रिय से संयोग भी छूट जाता है, फिर बालबुद्धि मनुष्यों को भ्रम होता है कि वह सुगन्धित द्रव्य नहीं रहा | परन्तु यह उसको अवश्य जानना चाहिये कि वह सुगन्ध द्रव्य आकाश में वायु के साथ बना ही रहता है | इनसे अन्य भी होम करने के बहुत से उत्तम फल हैं, उनको बुद्धिमान लोग विचार से जान लेंगे |

(क्रमशः)

(महर्षि दयानन्द कृत ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका से संक्षिप्त में उद्धृत)