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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

उपासना का वैदिक स्वरूप (7) लेखक श्री स्वामी आत्मानन्द सरस्वती जी

* ओउम् *

.. "अहिंसा सत्यास्तेय ब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाः"

अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह ये पाँच यम हैं |

"शौचसन्तोषतपः स्वाध्यायेश्‍व‌रप्रणीधानानि नियमाः"

शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान ये पाँच नियम हैं | मन, वाणी और कर्म से किसी को कष्ट न देने का नाम अहिंसा है | इस लक्षण के अनुसार अहिंसा का कार्य क्षेत्र मन के द्वारा सब ज्ञान इन्द्रियें और कर्म के द्वारा सब कर्म इन्द्रियें हैं | सत्य का वाणी, अस्तेय का मन, हाथ और पैर, ब्रह्मचर्य का जननेन्द्रिय और अपरिग्रह का सब ही ज्ञानेन्द्रियें और कर्मेन्द्रियें कार्य क्षेत्र हैं | क्योंकि अपरिग्रह आवश्यक्ता से अधिक संग्रह न करने का नाम है | अतः इसे सिद्ध करने के लिए सभी इन्द्रियों के विषयों का अधिक प्रयोग छोड़ देना पड़ेगा |

(अब गतांक से आगे) ‍

शौच नामक नियम का भी सभी इन्द्रियें कार्य क्षेत्र हैं | क्यो,कि शौच का तात्पर्य है अन्दर और बाहर की सब प्रकार की शुद्धि और आत्मा मन और दोनों प्रकार की इन्द्रियें और शरीर अन्दर और बाहर के तत्व हैं | सन्तोष में यथा प्राप्त थोड़े से थोड़े विषयों का भी प्रसन्नता से प्रयोग किया जाता है | अतः इसका भी कार्य क्षेत्र मन और सभी इन्द्रियें हैं | प्रत्येक प्रकार के कष्‍ट का सहन करते हुए ध्येय के लिए आगे बढ़ना 'तप' है | यह भी मन आदि इन्द्रियों और शरीर को भी अपने नियन्त्रण में लेता है | मन और बुद्धि स्वाध्याय का और शरीर इन्द्रिय आदि अपना सर्वस्व ही समर्पण रूप ईश्‍वर प्रणिधान का कार्य क्षेत्र है | इस प्रकार इन यम नियमों के द्वारा अध्यात्मिक तत्वों के तप जाने पर अर्थात विशुद्ध सुमार्ग गामी हो जाने पर, इन में सत्वगुण प्रकट हो जाता है और तमोगुण तथा रजोगुण शान्त हो जाते हैं | और इनके द्वारा बहने वाला वृत्तियों का प्रवाह भी निरोध की और अग्रसर हो जाता है | अपनी सामग्री का इस प्रकार संशोधन कर लेने पर भगवान् भक्त पर प्रसन्न होते हैं, ओर भक्त भी प्राप्त हुए अधिकार के अनुसार, भगवान् को अपनी विनय सुनाने और उससे समाधि की भिक्षा मांगने का उपक्रम करता है : ‍-

आश्रुत्कर्णश्राधीहवं नूचिद्दधिष्‍व मे गिरः |
इन्द्र स्तोममिमं कृष्वा युजश्‍चिदन्तरम् || ऋक् 1|10|6||

अर्थ - (आश्रुत्कर्ण) सब ओर श्रवण शक्ति रूप कर्ण वाले ! (इन्द्र) ऐश्‍वर्य सम्पन्न भगवन् ! (न) हमारी (हवम्) ग्रहण करने योग्य सत्य वचन रूप (गिरः) वाणियों को (श्रुधि) सुनिये, तथा (मम) मेरे (स्तोमम्) स्तोत्र को (द‌धिष्‍व) धारण और पुष्ट कीजिये, (युजः) समाहित किये जाने वाले (अन्तरम्) अन्तःकरण को (कृष्वाचित्) सुन्दर निर्मित कीजिये |

भगवान् की श्रवण शक्ति सारे आकाश मण्डल में व्यापक है | भक्त जब भी कुछ बोलना आरम्भ करता है यदि उसे उसी समय यह अनुभव होने लगे कि मेरे वक्तव्य को सुनने वाली भगवान् की श्रवण-शक्ति मेरे चारों और समीप ही विराजमान है, तो वह ऐसा वक्तव्य देने में अवश्य संकोच करेगा जो किसी को हानि पहुँचाने वाला हो | भगवान के गुणों का गान और प्राणीमात्र के कल्याण की भावना का प्रक‌ट करना ही उस समय उसके प्रवचन का लक्ष्य बन जायेगा | यहां यह आवश्यक है कि उपासक को भगवान् की सत्ता का और उसकी अपने चारों ओर फैली हुई श्रवण शक्ति का केवल वाचिक ज्ञान ही न हो, प्रत्युत उसकी आत्मा उसका साक्षात् अनुभव कर रही हो | इस साक्षात् अनुभव का दृष्टांत, उपासक संसार यात्रा में पग पग पर देखेंगे | माता पिता आचार्य राजा आदि जिनका हम आदर करते हों अथवा जिनसे हमें किसी प्रकार का भय हो, उनके सामने हम ऐसे वचन कभी न बोल सकेंगे जो उनको अप्रिय हों | बोलने के समय जिस प्रकार हम इन की सत्ता का साक्षात् अनुभव कर रहे हैं यदि ईश्‍वर सत्ता का और उसकी श्रवण-शक्ति का भी हमें इसी प्रकार साक्षात् अनुभव होने लगे तो हम ऐसा कोई वचन भी न बोल सकेंगे जो किसी के लिए भी हानिकारक हो | मनुष्य के दण्ड से कदाचित् बच भी सकें परन्तु भगवान् के दण्ड से बचना असम्भव है |

हम संसार में ऐश्‍वर्य की प्राप्ति के लिए दौड़ लगाते हैं, परन्तु जैसा मनोहर ऐश्‍वर्य भगवान् के ज्ञान और आनन्द का है ऐसा प्रकृति के गर्भ में कहीं भी देखने को नहीं मिलता । यों तो यह प्राकृतिक ऐश्वर्य भी प्रभु की ही देन है, परन्तु इसमें वह स्थाई सत्ता कहां जो उसमें है | भगवान् का यह ऐश्‍वर्य अपनी आत्मा में भगवान् का विकास होने पर ही प्राप्त होता है | और अब उसी पावन प्रभु का अपनी आत्मा में आह्वान करता हुआ उपासक अपने सत्य वचन रूप स्तोत्रों के गान से भगवान् को रिझाने का प्रयत्न करता है | इसके ये प्रभु गुणगान रूप स्तोत्र इसकी आत्मा को भगवान् के गुणों से अलंकृत करना आरम्भ कर देते हैं | इन्द्रियें नियंत्रण में आ जाती हैं | अन्तःकरण वासनाओं को छोड़ना आरम्भ कर देता है और इस में सत्वगुण के प्रदुर्भाव से आत्मा इसके समाधान के लिए भगवान् से प्रार्थना करना आरम्भ कर देता है और कहता है : -

'युजः अन्तरम् कृष्‍वाचित्', समाधि के लिए अन्तःकरण का निर्माण कीजिए |

(क्रमशः)