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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

महात्मा नारायण स्वामी जी की कठोपनिषद्' पर टीका - प्रथमा वल्ली(2)

.. नचिकेता ने सब कुछ देते हुए देखकर अपने सम्बन्ध में पूछा कि मैं किसे दिया जाउँगा ? पिता के उत्तर न देने पर जब उसने दुबारा, तिबारा अपना प्रश्न दोहराया तो वाजश्रवा ने अप्रसन्न होकर कहा कि तुझे मौत के हवाले करता हूँ | उत्तर के दो अर्थ हो सकते थे | एक तो केवल अप्रसन्नता, मौत के हवाले करना, इन शब्दों का अनिष्ट और अप्रसन्नता सूचक होना तो स्पष्ट ही है | उत्तर का दूसरा भाव यह था कि मृत्यु नाम के किसी गृहस्थ विद्वान के लिए नचिकेता को देना | नचिकेता पिता की अप्रसन्नता समझते हुए भी दूसरे अर्थ का लेना ही अपने लिए श्रेयस्कर समझकर घर से चल दिया |

(अब गतांक से आगे)

बहूनामेमि प्रथमो बहूनामेमि मध्यमः |
.किं स्विद्यमस्य कर्त्तव्यं यन्मयाSद्य करिष्यति ||5||
अनुपश्य यथा पूर्वे प्रतिपश्य तथाSपरे |
सत्यमिव मर्त्यः पच्यते सत्यमिवाजायते पुनः ||6||

अर्थ - (बहूनाम्) बहुतों में तो (प्रथमः, एमि) मैं श्रेष्ठ हूं और (बहूनाम, मध्यम, एमि) और बहुतों में मध्यम हूं | (यमस्य) मृत्यु का (किं स्वित्) क्या (कर्त्तव्यम्) करने योग्य काम है, (यत्) जो वह (मया) मुझ से (अद्य) आज (करिष्यति) करावेगा ||5||

(यथा) जैसे (पूर्वे) पहले (हुआ उसे) (अनुपश्य) देख (तथा) वैसा ही (परे) आगे हुआ (प्रतिपश्य) देख कि (मर्त्यः) प्राणी (सस्यम् इव) धान ही के सदृश (पच्यते) मरता है और (सस्यम् इव) और धान ही के सदृश (पुनः) फिर (अजायते) उत्पन्न होता है ||6||

व्याख्या - मृत्यु के घर जाते हुए वह (नचिकेता) सोचने लगा कि मैं बहुतों (विद्यार्थियों) में तो श्रेष्ठ हूं और बहुतों में मध्य, नहीं मालूम यम (आचार्य्य) का कौन सा काम है जो मुझे करना पड़ेगा | फिर वह सोचने लगा, कि संसार में चाहे बीते काल पर दृष्टि डालें और चाहे आने वाले समय को देखें, यह बात तो साफ तौर से मालुम होने लगती है कि मनुष्य धान आदि ओषधियों के सदृश नष्ट हो जाता है और उसी की तरह फिर पैदा हो जाता है ||6||

नोट - (1) मनुष्य की इस मरने जीने की अवस्था का वास्तविक ज्ञान प्राप्त करने के लिए ही उसने यम से तीसरा वर मांगा था |

वैश्वानरः प्रविशत्यतिथिर्ब्राह्मणो गृहान्|
तस्यैतां.शान्तिं कुर्वन्ति हर वैवस्वतोदकम् ||7||
आशाः प्रतीक्षे सङ्गतं.
सूनृताञ्चेष्टापूर्ते पुत्रपशूं.श्‍च सर्वान्|
एतद् वृङ्क्ते पुरुषस्याल्पमेधसो,
.यस्यानश् न‌न् वसति ब्राह्मणों गृहे ||8||

अर्थ ‍- (वैवस्वत) हे विवस्वान के पुत्र यम (गृहान्) आपके घरों में (वैश्‍वान‌रः) एक तेजस्वी (ब्राह्मण) विद्वान् (अतिथिः) (प्रविशति) प्रविश्ट हुआ है (तस्य) ऐसे अतिथि की (सद्‍गृह‌स्थ) (एताम्) इस (शान्तिम्) प्रसन्नता को (कुर्वन्ति) करते हैं इसलिए (उदकम्, हर) जल को (आतिथ्य के लिए) लीजिये ||7||

(यस्य पुरुषस्य) जिस पुरुष के (गृहे) घर में (ब्राह्मणः) ब्रह्मवित अतिथि (अनश् नन्) भूखा (वसति) रहता है (तस्य) उस (अल्पमेधसः) अल्पबुद्धि की (ज्ञात वस्तु की कामना, (प्रतीक्षे) अज्ञात वस्तु की चाहना, (सङ्गतम्) सत्संग के फल, (सूनृतम्) मधुरभाषिता, (इष्ट) यज्ञादि श्रौतकर्म के फल (आपूते) तालाब आदि बनाने रूप स्मार्तकर्म के फल (पुत्रपशून्) पुत्र और पशु (एतत् सर्वान्) जाते रहते हैं ||8||

व्याख्या - नचिकेता वैवस्वत् (यम) के घर पहुँचा, परन्तु किसी कारणवश वह उस (नचिकेता) का आतिथ्य न कर सका | जब कि नचिकेता तीन दिन उसके घर बिना किसी पूछताछ के पढ़ा रहा तो किसी धर्मज्ञ ने यम को चेतावनी दी कि न‌चिकेता का आतिथ्य* करे क्योंकि जिस गृहस्थ के घर विद्वान अतिथि बिना आतिथ्य के रहता है उसके पुत्रादि सभी नष्ट हो जाते हैं | उस धर्मज्ञ ने यह बात केवल डराने के लिए अत्युक्ति से नहीं कही थी किन्तु उसमें कुछ तथ्य है | जब कोई व्यक्ति किसी का आतिथ्य नहीं करना चाहता तो उसकी इच्छा होती है कि उसे घर से रुखसत करे और इसके लिए उसे कुछ‌ रुखाई से बात करनी पड़ती है | रुखाई से बात करने के फलस्वरूप में मधुरभाषिता जाती है | मधुरभाषिता के न रहने से कोई विद्वान् न उसके पास जाता है, न उसे अपने पास आने देता है इससे सत्संग भी गया और इस सत्संग के अभाव में श्रोत और स्मार्त कर्म भी छूटे, क्योंकि बिना विद्वानों के सहयोग के ये काम अकेले करने के नहीं हैं | विद्वानों के असहयोग से पुत्रेष्‍टि आदि करके पुत्र भी पैदा नहीं कर सकता और यदि पैदा हुआ भी तो वह मूर्ख ही रहेगा जो मरने से बद्‍तर है, जैसा कि नीति में कहा गया है

अजातमृतमूर्खाणाँ वरमाद्यौ न चान्तिमः |
सकृद्‍दुःखकरावाद्यावन्तिमस्तु पदे पदे || (पञ्‍चतन्त्र)

अर्थात् पुत्र न पैदा होना, पैदा होकर मर जाना और मूर्ख रहना - इन तीनों में से पहले दोनों श्रेष्ठ हैं परन्तु अन्तिम (मूर्ख रहना) श्रेष्‍ठ नहीं है क्योंकि पहले दो से तो मनुष्य को एक ही बार दुःखी होना पड़ता है परन्तु अन्त की बात से तो उसे पग पग पर दुःख भोगना पड़ता है | अस्तु, सन्तान के मूर्ख रहने से पशु आदि धन का संग्रह भी सम्भव नहीं | इस प्रकार उपर्युक्‍त बातों के अभाव से कोई गृहस्थ न किसी वस्तु की आशा कर सकता है और न किसी की प्रतीक्षा |

तिस्त्रो रात्रीर्यदबात्सीगृहे मे-
अनश् न‌न् ब्रह्मन्नतिथिर्नमस्यः |
नमस्तेSस्तु ब्रह्मन् स्वस्ति मे अस्तु,
तस्मात् प्रति त्रीन् वारन् वृणीष्‍व ||9||

अर्थ - (ब्रह्मन्) हे विद्वान् (अतिथिः) अतिथि (नमस्यः) आप सत्कार करने योग्य हैं (ते) आपके लिए (नमः) प्रणाम (अस्तु) हो (मे) मेरा (स्वस्ति) कल्याण (अस्तु) हो (ब्रह्मन्) हे ब्रह्मवित् ! (यत्) जो (मे, गृहे) मेरे घर में, (तिस्त्रः,रात्रीः) तीन रात (अनश् न‌न्) (आप) भूखे (अवात्सीः) रहे हैं (तस्मात्) इसलिए (प्रति) प्रति रात्रि (एक के हिसाब से) (श्रीन् वारान्) तीन वरों को (वृणीप्व) स्वीकार करें ||9||

व्याख्या - उस धर्मज्ञ‌ पुरुष की चेतावनी से यम सावधान होकर नचिकेता के पास आया और अपने कल्याणार्थ, आतिथ्य न कर सकने और नचिकेता के तीन रात भूखे रहने के प्रायश्‍चित रूप में तीन वर देने का वचन दिया |

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* नोट ‍- प्राचीन काल में आतिथ्य के लिए तीन काम करने पड़ते थे - (1) अर्ध्यपाद्य अर्थात् सत्कारपूर्वक जल से पांव आदि धुलाना, (2) आसन अर्थात् बैठने को उचित वस्तु देना, (3) मधुपर्क अर्थात् अल्पाहार (नाश्ते) के लिए कुछ भोजन देना | इसी के लिए उस धर्मज्ञ ने जल लाने के लिए यम को परामर्श दिया था |

(कमशः)