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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

वेदो में विज्ञान व शिल्पविद्या के रहस्य (19)

इन्द्रेहि मत्स्यन्धसो विश्वेभिः सोमपर्वभिः |
महाँ अभिष्टिरोजसा ||1||
ऋग्वेद 1|9|1||

पदार्थ - जिस प्रकार से (अभिष्‍टि:) प्रकाशमान (महान) पृथिवी आदि से बहुत बड़ा (इन्द्र) यह सूर्य्यलोक है, वह (ओजसा) बल वा (विश्‍वेभिः) सब (सोमपर्वभिः) पदार्थों के अंगों के साथ (अन्धसः) पृथिवी आदि अन्नादि पदार्थों के प्रकाश से (एहि) प्राप्त होता और (मत्सि) प्राणियों को आनान्द देता है, वैसे ही हे (इन्द्र) सर्वव्यापक ईश्वर ! आप (महान्) उत्तमों में उत्तम (अभिष्टिः) सर्वज्ञ और सब ज्ञान के देनेवाले (ओजसा) बल वा (विश्वेभिः सोमपर्वभिः) सब पदार्थों के अंशों के साथ वर्त्तमान होकर (एहि) प्राप्त होते और (अन्धसः) भूमि आदि अन्नादि उत्तम पदार्थों को देकर हमको (मत्सि) सुख देते हो ||1||

भावार्थ - इस मन्त्र में श्‍लेष और लुप्तोपमालङ्कार है | जैसे ईश्वर इस संसार के परमाणु में व्याप्त होकर सबकी रक्षा निरन्तर करता है, वैसे ही सूर्य भी सब लोकों से बड़ा होने से अपने सम्मुख हुए पदार्थों को आकर्षण वा प्रकाश करके अच्छे प्रकार स्थापन करता है ||1||

एमेनं सृजता सुते मन्दिमिन्द्राय मन्दिने |
चक्रि विश्वानि चक्रये ||2||
ऋग्वेद 1|9|2||

पदार्थ - हे विद्वानो ! (सुते) उत्पन्न हुए इस संसार में (विश्वानि) सब सुखों के उत्पन्न होने के अर्थ (मन्दिने) ऐश्वर्यप्राप्ति की इच्छा करने तथा (मन्दिम्) आनन्द बढ़ानेवाले (चक्रये) पुरुषार्थ करने के स्वभाव और (इन्द्राय) परम ऐश्वर्य होने वाले मनुष्य के लिये (चक्रिम्) शिल्पविद्या से सिद्ध किये हुए साधनों में (एनम्) इन (ईम्) जल और अग्नि को (आसुजत्) अति प्रकाशित करो ||2||

भावार्थ - विद्वानो को उचित है कि इस संसार में पृथिवी से लेके ईश्‍व‌रपर्य्यन्त पदार्थों के विशेषज्ञान उत्तम शिल्पविद्या से सब मनुष्यों को उत्तम क्रिया सिखाकर सब सुखों का प्रकाश करना चाहिये ||2||

मत्स्वा सुशिप्र मन्दिभिः स्तोमेभिर्विश्वचर्षणे |
सचैषु सवनेष्वा ||3||
ऋग्वेद 1|9|3||

पदार्थ - हे (विश्‍वचर्षणे) सब संसार के देखने तथा (सुशिप्र) श्रेष्‍ठ‌ज्ञानयुक्त परमेश्वर ! आप (मन्दिभिः) जो विज्ञान व आनन्द के करने व करानेवाले (स्तोमेभिः) वेदोक्त स्तुतिरूप गुणप्रकाश करनेहारे स्तोत्र हैं उनसे स्तुति को प्राप्त होकर (एषु) इन प्रत्यक्ष (सवनेषु) ऐश्‍व‌र्य देनेवाले पदार्थों में हम लोगों को (सचा) युक्त करके (मत्स्य) अच्छे प्रकार आनन्दित कीजिये ||3||

भावार्थ - जिसने संसार के प्रकाश करने वाले सूर्य्य को उत्पन्न किया है, उसकी स्तुति करने में जो श्रेष्‍ठ‌ पुरुष एकाग्रचित्त हैं, अथवा सबको देखनेवाले परमेश्वर को जानकर सब प्रकार से धार्मिक और पुरुषार्थी होकर सब ऐश्‍व‌र्य को उत्पन्न और उसकी रक्षा करने में मिलकर रहते हैं, वे ही सब सुखों को प्राप्त होने के योग्य व औरों को भी उत्तम सुखों को देनेवाले हो सकते हैं ||3||

असृग्रमिन्द्र ते गिरः प्रति त्वामुदहासत |
अजोषा वृषभं पतिम् ||4||
ऋग्वेद 1|9|4||

पदार्थ - हे परमेश्वर ! जो (ते) आपकी (गिरः) वेदवाणी है, वे (वृषभम्) सब से उत्तम सबकी इच्छा पूर्ण करनेवाले (पतिम्) सबके पालन करनेहारे (त्वाम्) वेदों के वक्ता आप को (उदहासत्) उत्तमता के साथ जनाती है, और जिन वेदवाणियों का आप (अजोषाः) सेवन करते हो, उन्हीं से मैं भी (प्रति) उक्त गुणयुक्त आपको (असृग्रम्) अनेक प्रकार से वर्णन करता हूँ ||4||

भावार्थ - जिस ईश्वर ने प्रकाश किये हुए वेदों से जैसे अपने अपने स्वभाव गुण और कर्म प्रकट किये हैं, वैसे ही वे सब लोगों को जानने योग्य हैं, क्योंकि ईश्वर के सत्य स्वभाव के साथ अनन्तगुण और कर्म हैं, उनको हम अल्पज्ञ लोग अपने सामर्थ्य से जानने को समर्थ नहीं हो सकते | तथा जैसे हम लोग अपने अपने स्वभाव गुण और कर्मों को जानते हैं, वैसे औरों को उनका यथावत् जानना कठिन होता है, इसी प्रकार सब विद्वान मनुष्यों को वेदवाणी के बिना ईश्वर आदि पदार्थों को यथावत् जानना कठिन है | इसलिये प्रयत्न से वेदों को जान के उन के द्वारा सब पदार्थों से उपकार लेना, तथा उसी ईश्‍व‌‌‌र को अपना इष्‍टदेव और पालन करनेहारा मानना चाहिये ||4||

सं चोदय चित्रमर्वाग्राध इन्द्र वरेण्यम् |
असदित्ते विभु प्रभु ||5||
ऋग्वेद 1|9|5||

पदार्थ - हे (इन्द्र) करुणामय सब सुखों के देनेवाले परमेश्‍वर‌ ! (ते) आपकी सृष्टि में जो जो (वरेण्यम्) अति श्रेष्ठ (विभु) उत्तम उत्तम पदार्थों से पूर्ण (प्रभु) बड़े बड़े प्रभावों का हेतु (चित्रम्) जिससे श्रेष्‍ठ विद्या चक्रवर्ति राज्य से सिद्ध होने वाले, मणि सुवर्ण और हाथी आदि अच्छे अच्छे अद्‍भुत पदार्थ होते हैं, ऐसा (राधः) धन (असत्) हो, सो सो कृपा करके हम लोगों के लिये (संचोदय) प्रेरणा करके प्राप्त कीजिये ||5||

भावार्थ - मनुष्यों को ईश्‍वर‌ के अनुग्रह और अपने पुरुषार्थ से आत्मा और शरीर के सुख के लिये विद्या और ऐश्वर्य की प्राप्ति वा उनकी रक्षा और उन्नति तथा सत्य मार्ग व उत्तम दानादि धर्म अच्छी प्रकार सदैव सेवन करना चाहिये, जिससे दारिद्र्य और आलस्य से उत्पन्न होने वाले दुःखों का नाश होकर अच्छे अच्छे भोग करने योग्य पदार्थों की वृद्धि होती रहे ||5||

(महर्षि दयानन्द सरस्वती के ऋग्वेदभाष्य पर आधारित एवं संक्षेप में उद्दृत्)
THE SECRETS OF SCIENCE & TECHNOLOGY IN VEDAS (19)
(Based on & Reproduced from Maharshi Dayanand Saraswati's RIGVED BHASHYA)