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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

दाता का महत्त्व

ओउम् | स व्राधतो नहुषो दंसुजूतः शर्धस्त्स्रो नरां गूर्तश्रवाः |
विसृष्‍ट‌रातिर्याति बाळहसृत्वा विश्‍वासु पृत्सु सदमिच्छूरः ||
ऋग्वेद 1|122|10

शब्दार्थ -

सः...........................वह
व्राधतः.......................उपासक
नहुषः........................मनुष्यों के
दंसुजूतः......................तेज से प्रदीप्त हुआ
शर्धस्तरः.....................अतिशय बलवाऩ्
नराम्........................मनुष्यों में
गूर्तश्रवाः.....................प्रसिद्ध यशवाला
विसृष्टरातिः..................खुला दान देनेवाला
शूरः..........................शूर
बाळहसृत्वा..................प्रबल वेगवान् होकर
विश्वासु.......................सभी
पृत्सु.........................युद्धों में
सदम् + इत्.................सदा ही
यति..........................जाता है |

व्याख्या -

वैदिक धर्म्म‌ में दान का बहुत माहात्म्य है | दान न देनेवाले कंजूस को वेद में अराति कहते हैं | लौकिक संस्कृत में अराति का अर्थ शत्रु है | सचमुच जो दान नहीं देता, वह समाज का शत्रु है | दान यज्ञ का अङ्ग है, धर्म्म का एक स्कन्ध है | जो धर्म्म का=सामाजिक नियम का उल्लंघन करता है, वह सचमुच सामाजिक समता में आघात पहुँचाने के कारण समाज का शत्रु है |

दान के कई सोपान हैं | पीछे एक मन्त्र की व्याख्या में लिख चुके हैं कि धन-दान, तन-दान, वाणी-दान करने से यज्ञ की सफलता होती है | दान का अर्थ जैसे कि बता चुके हैं - अपनी अधिकृत वस्तु पर से अपना अधिकार हटाकर दूसरे का अधिकार स्वीकार करना दान है | मनुष्य सब कुछ दे सकता है, शरीर तक दूसरों के लिए उत्सर्ग कर सकता है, किन्तु अहंकार-ममकार त्यागना बहुत कठिन है | अहंकार-ममकार त्यागकर जब भक्त अपने आपको भगवान् के अर्पण करता है, तब भगवान् उस अपने उपासक को अपने तेज से तेजस्वी कर देता है | शास्त्र में उस तेज का नाम ब्रह्मवर्चस | है | वेद कहता है दानी मनुष्य -व्राधतो नहुषो दंसुजूतः उपासक मनुष्य के तेज से तेजस्वी होता है अर्थात् निष्काम-भाव से दान करनेवाला, आत्मसमर्पण करनेवाले उपासक के समान तेजस्वी होता है | अतएव वह शधस्तरः बलवंत्तर =अत्यन्त बलवान होता है और नरां गूर्तश्रवाः =मनुष्यों में उसकी कीर्ति की चर्चा होती है | ऐसे दानी के लिए वेद में आदेश है कि वह उतापरीषु कृणुते सखायम् (ऋ.10|117|3) विपत्तियों के समय के लिये मित्र बना लेता है | दाता को मित्रों की कमी नहीं रहती | अतएव वह विसृष्टरातिर्याति बाळहसृत्वा विश्वासु पृत्सु सदमिच्छूरः यह दानी शूर महावेगवान् होकर सभी युद्धों में सदा जाता है | अकेला वही नहीं, उसके साथी, मित्र, सहायक पर्याप्त हैं, अतः वह पूर्ण वेग से संग्रामों में घुस जाता है | जिसने अपना दान दे दिया, उसे तो सबसे महान सखा मिल गया है, उसे तो भय रहा ही नहीं | इस महत्त्व को समझकर दान करो |

स्वामी वेदानन्द तीर्थ सरस्वती
(स्वाध्याय-सन्दोह से साभार))