Skip navigation.
कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

इसे कौन पूछने जाता है

ओ३म् !
को ददर्श प्रथमं जायमानमस्थन्वन्तं यदनस्था विभर्ति |
भूम्या असुरसृगात्मा क्व स्वित्को विद्वांसमुप गात्प्रष्टुमेतत् ||
(ऋग्वेद् 1.164. 4)

शब्दार्थ :
यत् = जिस
अस्थन्वन्तम् = हड्डियों वाले को
अनस्था = अस्थिरहित , अप्राकृत
विभर्ति = धारण करता है
प्रथमम् = मुख्य
जायमानम = उत्पन्न होने वाले को
क: = कौन
ददर्श = देखता है
असु: = प्राण
असृक‌ = रुधिर
भूम्या: = भूमि से , प्रकृति से
आत्मा = आत्मा
क्व स्वित् = कहाँ है
एतत् = इस तत्व को
प्रष्टुम = पूछने के लिए
क: = कौन
विद्वांसम् = विद्वान के
उप + गात् = पास जाता है

जिस हड्डियों वाले को अस्थिरहित , अप्राकृत , धारण करता है , उस‌ मुख्य‌ उत्पन्न होने वाले को कौन देखता है ? ये प्राण तथा रुधिर तो भूमि से , प्रकृति से (होते हैं) आत्मा कहाँ है ? इस तत्व को पूछने के लिए कौन विद्वान के पास जाता है ?

(स्वामी वेदानन्द तीर्थ सरस्वती)

व्याख्या :

सृष्टी रचना इतनी विचित्र है कि मनुष्य की बुद्धि चक्कर खा जाती है | सृष्टी के आरम्भ से तत्ववेत्ता लोग इसके रहस्य टटोलने में लगे हैं| और नित्य नये रहस्य मनुष्य समाज के आगे ला रहे हैं | मनुष्य में अगर अत्तुल बल न भी हो तो भी मानना पड़ता है कि उसका बल बहुत प्रबल है |समुद्र के अन्तस्तल तक पहुँच कर इसने उसकी छान बीन कर डाली |आकाश में उड़ा तो तारों के समाचार ले आया | यह दुर्दान्त बली मंग‌लग्रहवासियों से बातचीत करना और सम्बन्ध स्थापित करना चाहता है |पर्वतों को इसने राई समान बना दिया है | आज महारण्य , मनुष्य बुद्धिवैभव के सामने एक ग्रामीण क्षुद्र क्षेत्र से अधिक नहीं है | ध्रुवों की ध्रुवता को इसने अस्थिर कर दिया | पय , पवन‌, पावक , पृथिवी सभी इसकी सेवा कर‌ते हैं | नदियों के प्रवाह इसने मोड़ दिये हैं | आग बरसाने वाली गर्मी में, अत्यन्त तप्त प्रदेश में यात्रा करते हुए इसे अब गरमीं नहीं सताती | वायु को इसने वश में कर लिया है |विभु और अखण्ड काल की भी इसने गणना कर डाली है | अपरिमेय से देश को मानो इसने सर्वथा नाप सा लिया है | अपने कलबल से इसने सकल लोकों को एक क्षुद्र सा लोक बना लिया है| देशकाल की विजय के कारण सम्पूर्ण भूतों पर इसने विजय पाली है , इससे यह गर्वित हो उठा है | गर्व करने की बात भी है |गर्व इसका अनुचित भी नहीं है | सर्वथा महीयसी शक्ति: |

किन्तु ,कभी तूने सोचा भी ओ बावले ! तूँ क्या है ? ओ समुद्र को मथ डालने वाले ! बता , तूं क्या है ? ओ पर्वत को पैरों तले रौंदने वाले ! तेरा रूप क्या है ? क्या कभी तूने अपने आप को देखा है ? तेरा यह शरीर - जीर्ण होने वाला शरीर - तो भूमी का बना है ; जल, वायु, आग ने इसका सहयोग दिया , यह बन गया | क्या तूने कभी इसे भी टटोलने का यत्न किया है ? यह कैसे पैदा हुआ ? पहले-पहले कैसे उत्पन्न हुआ ? क्यों उत्पन्न हुआ ? क्या यह सारी सृष्टी जड़ का खेल है ? क्या यह सब अचेतन का , ज्यानविहीन का अनुभूतिशून्य का चमत्कार है ? आत्मा - 'मैं' कहने वाला , 'मेरा' मानने वाला इसमे कहाँ है ? तूने चीर-फाड़ करके देख लिया | सच है , तुझे आत्मा शरीर में कहीं नहीं मिला !!! अहह ! तो तूं मैं मैं कैसे करता है ? क्या तूने कभी किसी से पूछने का यत्न भी किया ? जैसे शरीर की चीरफाड़ सीखने के लिए , नस-नाड़ी के ज्यान के लिए तूं गुरु के पास गया था , वैसे यह जानने के लिए कि मृत शरीर और् अ-मृतशरीर में भेद क्यों है ? कभी किसी के पास गया ? अरे ! शरीर हड्डियों के सहारे है किन्तु इन हड्डियों का सहारा क्या है ? अरे उसे जान -
अस्थन्वन्तं यदनस्था विभर्ति - चीर-फाड़ से तूं हड्डियाँ देखेगा , मांस-रुधिर देखेगा | वह तो हड्डियों से रहित है , वह तेरी चीरफाड़ से नहीं चिरता , वह तेरी इन आखों से नहीं दीखता | मृत और अ-मृत शरीर को देखकर भी तूं उसे नहीं देखता ! यह आश्चर्य है | यम ने बड़े मार्मिक शब्दों में कहा था -

श्रवणायापि बहुभिर्यो न लभ्य: श्रण्वन्तोSपि बहवो यन्नविद्यु: |
आश्चर्य्यो वक्ता कुशलोस्य लब्धाSSश्च्चर्य्यो ज्याता कुशलानुशिष्टा: || क्ठोपनिषद् 1.2.7

बहुतों को इस आत्मतत्त्व‌ के सुनने का ही अवसर नहीं मिलता , अथवा सुनने का, जानने का विचार ही नहीं आता | कई मनुष्य सुन तो पाते हैं किन्तु समझ नहीं पाते हैं क्योंकि वे प्रत्यक्षवादी हैं | प्रत्यक्ष से परे किसी पदार्थ को समझने में वे समर्थ नहीं होते | इस आत्मा का स्वरूप बतलाने वाला विरला ही होता है | सुनकर कोई विरला ही समझ पाता है | संसार में ऐसा जन तो सच‌मुच दुर्लभ है , जिसने ज्यानी गुरु से इसे जानकर स्वायत्त कर लिया हो |

समुद्र की तरंगों से न डरनेवाले ! बता , बता अपने अन्दर की तरंगों से क्यों डरता है ? इन्हें भी वश में कर ! समुद्र की तरंगों के रहस्य को तूने जान लिया किन्तु अपनी तरंगो को तूं न जान पाया | कितनी बड़ी विडम्बना है ? सारे संसार का सार जानने वाला अपने को नहीं जानता |

ऋषि लोग कह गये हैं - आत्मा के जान लेने से सभी कुछ जाना जाता है | तूं कभी किसी पदार्थ को टटोलता है , कभी किसी का निरीक्षण परीक्षण करता है, किन्तु सन्तुष्ट नहीं हो पाता | आ एक बार ऋषियों की बात भी मान , आत्मा को जानने का यत्न कर |अवष्य सफल होगा | यह सफलता तुझे नया आलोक देगी | इस आलोक के साथ तुझे मिलेगा एक आलौकिक रस , जिसमें विरसता नाम को भी नहीं है ; जिसका आस्वादन कर तूं भटकना छोड़ देगा | हाँ एक नियम उसके लिए अनिवार्य्य है , वह है श्रद्धा सहित निरन्तर दीर्घकाल तक प्रयत्न करना |

यह वेदमन्त्र कई बातों की चेतावनी दे रहा है - (1) आत्मतत्त्व को पहचानने के लिए ज्यानी गुरू के पास जाना चाहिए | (2) आत्मा अनस्था है और अस्थिवाले शरीर से भिन्न है | (3) यह अनस्थाआत्मा अस्थिरुधिरप्राणमय शरीर को धारण करता है | (4) यह शरीर भौतिक है , भूमि से = भूतों से बना है किन्तु आत्मा का उपादान कारण कोई नहीं , इसका निमित्त कारण भी कोई नहीं है |यह अकारणक है, नित्य है | नित्य और अनित्य में से नित्य ही प्रीति करने योग्य है |

आत्मा से प्रीतिरीति -
" यदि आत्मा से और विराट् आत्मा से प्यार करना है तो अपने अंगों की भाँति सबको अपनाना होगा ; अपनी क्षुधा-निवृत्ति की तरहं उनकी भी चिन्ता करनी होगी | सच्चा आत्मप्रेमी किसी से घृणा नहीं करता | वह ऊंच-नी‍च की भद्धी भेद-भावना को त्याग देता है | उतने ही पुरुषार्थ से दूसरों के दुख निवारण करता है ,कष्ट क्लेश काटता है , जितने से अपने दुखों को दूर करता है | ऐसे ज्यानीजन ही वास्तव में आत्मप्रेमी कहलाने के अधिकारी हैं |"