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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

अथ वेदविषयविचारः (7)

(गतांक से आगे) -

प्र. - होम करने का जो प्रयोजन है सो तो केवल होम से ही सिद्ध होता है फिर वहां वेदमन्त्रों के पढ़ने का क्या काम है ?

उ. - उनके पढ़ने का प्रयोजन कुछ और ही है | प्र. - वह क्या है ? उ. - जैसे हाथ से होम करते, आंख से देखते और त्वचा से स्पर्श करते हैं, वैसे ही वाणी से वेदमन्त्रों को भी पढ़ते हैं | क्योंकि उनके पढ़ने से वेदों की रक्षा, ईश्‍वर की स्तुति, प्रार्थना और उपासना होती है | तथा होम से जो जो फल होते हैं उनका स्मरण भी होता है | वेदमन्त्रों के वारंवार पाठ करने से वे कण्ठस्थ भी रहते हैं, और ईश्‍वर का होना भी विदित होता है कि कोई नास्तिक न हो जाय, क्योंकि ईश्‍वर की प्रार्थनापूर्वक ही सब कर्मों का आरम्भ करना होता है | सो वेदमन्त्रों के उच्चारण से यज्ञ में तो उसकी प्रार्थना सर्वत्र होती है | इसलिये सब उत्तम कर्म वेदमन्त्रों से ही करना उचित है |

प्र. - यज्ञ में वेदमन्त्रों को छोड़ दूसरे का पाठ करें तो क्या दोष है ?

उ. - अन्य के पाठ में यह प्रयोजन सिद्ध नहीं हो सकता | ईश्‍वर के वचन से जो सत्य प्रयोज‌न सिद्ध होता है, सो अन्य के वच‌न से कभी नहीं हो सकता | क्योंकि जैसे ईश्‍वर का वचन सर्वथा भ्रान्तिरहित सत्य होता है वैसा अन्य का नहीं | और जो कोई वेदों के अनुकूल अर्थात् आत्मा की शुद्धि, आप्त पुरुषों के ग्रन्थों का बोध और उनकी शिक्षा से वेदों को यथावत् जान के कहता है, उसका भी वचन सत्य ही होता है | और जो केवल अपनी बुद्धि से कहता है वह ठीक ठीक नहीं हो सकता | इससे यह निश्चय है कि जहां जहां सत्य दीखता और सुनने में आता है, वहां वहां वेदों से ही फैला है, और जो जो मिथ्या है सो सो वेद से नहीं, किन्तु वह जीवों ही की कल्पना से प्रसिद्ध हुआ है | क्योंकि जो ईश्वरोक्त ग्रन्थ से सत्य प्रयोजन सिद्ध होता है , सो दूसरे से कभी नहीं हो सकता | इस विषय में मनु का प्रमाण है कि -

(त्वमे.) मनुजी से ऋषि लोग कहते हैं कि स्वयंभू जो सनातन वेद हैं, जिनमें असत्य कुछ भी नहीं, और जिनमें सब सत्यविद्याओं का विधान है, उसके अर्थ को जानने वाले केवल आप ही हैं ||1||

(चातु.) अर्थात् चार वर्ण, चार आश्रम, भूत, भविष्यत् और वर्त्तमान आदि की सब विद्या वेदों से ही प्रसिद्ध होती है ||2|| क्योंकि -

(विभर्ति.) यह जो सनातन वेदशास्त्र है, सो सब विद्याओं के दान से सम्पूर्ण प्राणियों का धारण और सब सुखों को प्राप्त करता है, इस कारण से हम लोग उसको सर्वथा उत्तम मानते हैं और इसी प्रकार मानना भी चाहिये | क्योंकि सब जीवों के लिये सब सुखों का साधन यही है ||3||

(क्रमशः)

(महर्षि दयानन्द कृत ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका से संक्षिप्त में उद्धृत)