महर्षि पतञ्जलि ऋषि प्रणीत 'योगदर्शनम्' द्वितीय साधनपादः(4)

द्रष्‍ट्टदृश्ययोः संयोगो हेयहेतुः||17||

[द्रष्‍ट्टदृश्ययोः] द्रष्‍टा ओर दृश्य का [संयोगः] प‌रस्पर संयुक्त होना [हेयहेतुः] दुःख का कारण है |

द्रष्‍टा= जीव तथा दृश्य= प्रकृति (से बने पदार्थों) का परस्पर संयोग होना ही दुःख का कारण है |

प्रकाशक्रियास्थितिशीलं भूतेन्द्रियात्मकं भोगापवर्गार्थं दृश्यम् ||18||

[प्रकाशक्रियास्थितिशीलम्] प्रकाश, क्रिया तथा स्थिति स्वभाव वाला [भूतेन्द्रियात्मकम्] भूत और इन्द्रिय स्वरूप‌ वाला [भोगापवर्गार्थम्] भोग और अपवर्ग रूपी प्रयोजन वाला [दृश्यम्] दृश्य (जगत्) है |

यह दृश्य अर्थात् प्रकृति से बना संसार त्रिगुणात्मक है | संसार की प्रत्येक वस्तु इन तीनों गुणों से मिलकर ही बनती है | इन तीन गुणों के नाम सत्त्वगुण, रजोगुण तथा तमोगुण हैं | सत्त्वगुण का स्वभाव प्रकाश है, रजोगुण का क्रिया तथा तमोगुण का स्थिति | इस जगत् के दो रूप हैं | एक भूतात्मक, दूसरा इन्द्रियात्मक | भूतात्मक पदार्थों के अन्तर्गत पाँच स्थूलभूत तथा पाँच सूक्ष्मभूत (= तन्मात्र) आते हैं | और इन्द्रियात्मक पदार्थों के अन्तर्गत पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, एक मन, एक अहंकार तथा एक बुद्धि आती है | इस जगत् के दो प्रयोजन अर्थात् उद्देश्य हैं, एक जीवों को भोग (= रूप रस, गन्ध आदि विषयों का अनुभव) कराना तथा अपवर्ग (= मुक्ति को प्राप्त कराना ) |

विशेषाविशेषलिङ्गमात्रालिङ्गानि गुणपर्वाणि ||19||

[विशेषाविशेषलिङ्गमात्रालिङ्गानि] विशेष, अविशेष, लिङ्गमात्र और अलिङ्ग ये [गुणपर्वाणि] गुणों (सत्व, रज, तम) के पर्व (= विभाग अथवा अवस्थाएँ) हैं |

गुणों के चार विभाग हैं (1) विशेष = पाँच स्थूल भूत, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ तथा मन (2) अविशेष = पाँच तन्मात्र (= स्थूल भूतों के उपादान कारण) तथा अहंकार (3) लिङ्गमात्र = महतत्व (=बुद्धि) (4) अलिङ्ग = मूल प्रकृति अर्थात् सत्त्व, रज‌ और तम |‌

द्रष्‍टा दृशिमात्रः शुद्धोSपि प्रत्य‌यानुपश्यः ||20||

[द्रष्‍टा] देखने वाला [दृशिमात्रः] देखने की शक्तिरूप है [शुद्धोSपि] निर्मल = निर्विकार होता हुआ भी [प्रत्य‌याSनुपश्यः] वृत्तियों के अनुसार देखने वाला है |

द्रष्‍टा अर्थात् चेतनतत्व = जीव केवल देखने की शक्ति स्वरूप वाला ही है ; किसी भी प्रकार के विकार से रहित शुद्ध है | इसकी बुद्धि में जैसे चित्र उभरते हैं, अर्थात् बुद्धि जिन विषयों को जिस रूप में प्रस्तुत करती है, उनको वह उसी रूप में जानता है |

तदर्थ एव दृश्यस्यात्मा ||21||

[तदर्थ] उसके (= जीव के) लिए [एव] ही [दृश्यस्य] दृश्य = जगत् का [आत्मा] स्वरूप (अस्तित्व) है |

इस जीव को भोग और अपवर्ग प्राप्त कराने हेतु ही प्रकृति से बना संसार है |

((क्रमशः)

[सरल हिन्दी भाषा में - मूल सूत्र, शब्दार्थ तथा भावार्थ सहित
लेखक - श्री ज्ञानेश्वरार्यः - M.A. दर्शनाचार्य, दर्शन योग महाविद्यालय, आर्यवन, रोजड़, गुजरात के सौजन्य से प्रेषित]