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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

उपासना का वैदिक स्वरूप (8/8) लेखक श्री स्वामी आत्मानन्द सरस्वती जी

* ओउम् *

युज धातु का समाधि अर्थ है प्रवृत्ति के कारण चंचल मन का समाहित करना अत्यन्त कठिन कार्य है | एक के बाद दूसरी वासना आ आ कर उसकी चंचलता को बढ़ाती ही रहती है | परन्तु भगवान का गुण गान रूप प्रयत्न करते करते जब इन्द्रियें नियन्त्रण में आ जाती हैं, तो वे अन्तःकरण को विषयों की तरफ खींचने के स्थान पर उसे शान्त रहने में सहायता देने लग जाती हैं | उनमें से रजोगुण और तमोगुण घटने लग जाते हैं, सत्वगुण बढ़ने लग जाता है और अब वह समाधि में स्थिर रहना आरम्भ कर देता है |

कोई लोग कहते हैं कि आत्मा का परमात्मा के साथ योग ही योग कहलाता है | तमोगुण तथा रजोगुण की वृत्तियों का निरोध योग नहीं है | परन्तु यह उनकी भूल है | परमात्मा तो आत्मा के अन्दर बाहर सर्वत्र व्यापक है | इसलिए उसके साथ आत्मा का योग तो सदा विद्यमान है | केवल उस योग की आत्मा को प्रतीति अन्तःकरण की वासनाओं और उसके विक्षेप के कारण नहीं होती | अन्तःकरण के विक्षेप को शान्त कर देने पर ही आत्मा को भगवान् के साथ अपने सम्बन्ध का ज्ञान होता है | अतः वृत्तिनिरोध का नाम ही योग है | इसी लिए महर्षि व्यास ने योग का लक्षण करते हुए लिखा है -

"योगः समाधिः"

योग चित्त के समाधान करने का नाम है | चित्त के एकाग्र होने पर भगवान् के दर्शन आत्मा को अनायास हो ही जाते हैं और उसके ऊपर भगवान् के आनन्द की वर्षा होने लग जाती है | आगे के मन्त्र में इसी भाव को दर्शाया गया है

विद्भाहि त्वा वृषन्तमं वाजेषु हवन श्रुतम् |
वृषन्तमस्य हूमहे ऊतिं सहस्त्र सातमाम् || ऋक् 1|10|10||

अर्थ - (विद्भा) जानते हैं (त्वा) तुझे (वृषन्तमं) आनन्द की वर्षा करनेवाले को और (वाजेषु) अध्यात्म देवासुर संग्रामों में (हवन श्रुतम्) तेरा नाम सुना गया है (वृषन्तमस्य) आनन्द की वर्षा करने वाले आपकी (सहस्त्र सातमाम्) सहस्त्रों ज्ञान आनन्द आदि को देने वाली (ऊतिं) रक्षा के साधनों का (हूमहे) हम आह्वान करते हैं |

अन्तःकरण में सत्व के प्रकट होने पर आत्मा को स्वाभाविक प्रसन्नता होती है | सुना करते थे कि भगवान् आनन्द की वर्षा करते हैं परन्तु सुना ही करते थे | परन्तु उसका साक्षात् अनुभव नहीं था | परन्तु अब तो (विद्भ) जानते हैं | अर्थात् अपनी आत्मा में उस आनन्द का साक्षात् अनुभव कर रहे हैं | हमारे जिस मुख को उदासीनता कभी छोड़ा ही नहीं करती थी आज उस पर अहर्निश प्रसन्नता की ही घटा देखने में आ रही है | मानव को विवश कहना पड़ता है :- हे आनन्द की वर्षा करने वाले भगवन् ! इस प्रसन्नता में मेरे ह्रदय में प्रकट हुए आपके आनन्द का ही हाथ है | प्रभो ! अब तो मैं आपकी इसी नाम से स्तुति करूंगा | आध्यात्मिक देवासुर संग्राम में अर्थात् कुवासनाओं तथा पवित्र विचार-धाराओं के कलह में आप मेरी अपनी (ऊर्तिं) अर्थात् रक्षा के साहनों से रक्षा करते है और मेरी सद्‍भावनाओं को विजय के उल्लास से आनन्द विभोर कर देते हैं | फिर मैं क्यों न आपको (वृषन्तम्) आनन्द की वर्षा करने वाला और (सहस्त्र सातमाम्) सहस्त्रों ऐश्वर्यों को प्रदान करने वाला कहूं | भगवन् मैं आपकी स्तुति कर भी किन साधनों से सकता हूं ! यह मेरी स्तवन शक्ति भी तो आप की ही शुभ देन है | -

आतून इन्द्र कौशिक मन्दसानः सुतंपिव |
नव्यमायुः प्रसूतिर कृधी सहस्त्रसामृषिम् || ऋक् 1|10|11||

अर्थ - (कौशिक) हे सर्वविद्योपदेशक ! (इन्द्र) आनन्द आदि ऐश्वर्यस्वरूप ! (मन्दसानः) आप सब स्तुतियों के देने वाले हैं | अतः (सुतम्) प्रयत्न से प्रकट किये सार रूप स्तवन को (पिव) सुनो और (नव्यमायुः) नवीन मोक्षरूप जीवन का (प्रसुतिर) जन्म दो और पार करो (सहस्त्रसाम्) अनेक विद्याओं का दाता (ऋषिम्) वेद मन्त्रार्थ दृष्‍टा (कृधी) मुझे बना दो |

प्रभो ! मुझे अब ज्ञान हुआ है कि सारी विद्याएं और सारी स्तुतिय्रें तेरी ही देन हैं | फिर तो प्रभो ! लज्जा आती है आप का ही प्रकाश आपको ही दिखाऊं | वाणी के महान सोम का मन्थन कर जो प्रयत्न हो , सोम रस रूप स्तवन‌ निकालता हूँ तो बाद में पता लगता है कि वह सब पहले से ही आपके ज्ञान में अनेक शाखाओं में विद्यमान है | अस्तु ! जो कुछ भी हो तेरी ही दी हुई भेंट तुझे ही चढ़ाता हूँ, और मांगता हूं मोक्षरूप नवीन आयु ; अनेक विद्यायें और ऋषिपद |
भगवन् एक बात और सुन लो :-

परित्वा गिर्वणोगिरः इमा भवन्तु विश्‍वतः |
वृद्धायुमनुवृद्धयो जुष्‍टा भवन्तु जुष्‍ट‌यः || ऋक् 1|10|12||

अर्थ - (परि) सब ओर (गिर्वणः) विद्वानों और वेदों की वाणियों में सम्भक्त (गिरः) विद्वानों की स्तुति रूप वाणियेँ (विश्‍वतः) सब और से (त्वा सम्भवन्तु) तेरे लिए ही प्रस्तुत हों | वृद्धायुम्) मोक्ष रूप लम्बी आयु वाले को (वृद्धया) सब सब ज्ञान आदि सम्पत्तियें (जुष्‍टयः) और सब प्रीतियें (अनुभवन्तु) अनुभूत हों |

नाथ ! मैं स्वार्थ परायण होकर संसार से विदा होना नहीं चाहता | मैंने तेरी ही दी हुई स्तुतियों से तेरा ही स्तवन कर जो लाभ उठाया है उसी प्रकार यह सब ओर बसने वाले संसार के मानव तेरी कृपा से तेरा स्तवन कर लाभ उठावें उन्हें भी लम्बी आयु रूप मोक्ष और आप की आनन्द आदि सम्पत्तियें और सब प्रतीतियें उपलब्ध हों |

बस इस मन्त्र के साथ यह सूक्त भी समाप्त हो गया और लेख भी | इस सूक्त में उपासक की गतिविधियों का सुन्दर चित्रण किया गया है आशा है उपासक इससे लाभ उठायेंगे |

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