मंन्त्रार्थ
अक्षैर्मा दीव्यः कृषिमित् कृषस्व,वित्ते रमस्व बहु मन्यमानः।
तत्र गावः कितव तत्र जाया,तन्मे विचष्टे सवितायमर्यः।।
हे जुआरी! पासों से मत खेल, खेती ही कर और उससे जो आय होती है, उसी को बहुत मानता
हुआ धन में रमणा कर अर्थात उसी में आनन्द कर। वहीं गौएँ है समृद्धि है और वही सुखदायक पत्नी है।
उत्पत्तिकर्त्ता और न्यायकारी परमात्मा ने हमें यही आदेश दिया है।
Rohit Arya (Arsh Gurukul Noida)
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subodhkumar मित्र
subodhkumar
मित्रवर ,
प्रथम तो आदरणीय रमेश जी के प्रश्न का उत्तर देने का दु:साहस करूंगा.ऊपर दिया वेद मंत्र ऋज्वेद के दसवें मंडल के 34 वें सुक्त का 13वां मंत्र है.
सारा सूक्त पांसो के खेल ( जुए) को ले कर कहा गया है.. यदि महाभारत काल में वेदों के अध्ययन का प्रचलन होता तो यह स्पष्ट है कि योधिष्ठिर जिसे धर्म राज की उपाधि से विभूषित किया जाता है, द्यूत क्रीडा से दूर रहता. इस सूक्त के मंत्रो में परिवार विषेश रूप से जुआरी की स्त्री पर जो कष्ट आते हैं, और हार जाने पर जुआरी किन किन अपराधो मे पड जाता है का विशद वर्णन है.एक बार अवसर मिलने पर मैंने प्रभात आश्रम के पूज्य स्वामि विवेकानंद जी से यह जिज्ञासा प्रकट की थी कि यदि वेदों मे इस तरह की बातों का उल्लेख है तो क्या यह समझा जा सकता है कि वैदिक काल में भी समाज में ऐसी वृत्तियो का प्रचलन था..उन्होने उत्तर मे यह कहा था कि वेदिक ऋषि अपनी दिव्य दृष्टि से समाज के भविष्य को भी देख कर उपदेश द्वारा सचेत कर रहे हैं. अस्तु.
इस सूक्त का मूल उपदेश कि श्रम से कमाया धन ही उत्तम होता है. इसी लिए कृषि सर्वोत्तम जीवन यापन शैली के अंतर्गत आता है.
शेयर बाज़ार का खेल भी एक बिना शारीरिक श्रम के धन कमाने का एक आधुनिक साधन बन गया है. इस मे यदि उद्योगो से जुड कर काम किया जाता है तो जुए की तरह लाभ हानि नही होते.
और शेयर का काम जुआ नही रह्ता परंतु अधिकांश लोग जो सट्टे की तरह शेयर का काम करते हैं जुआ ही खेलते हैं
इस मंत्र जो अर्थ आरम्भ मे दिया गया है सटीक लगता है., सातव्केकर जी ने मंत्र के अंतिम भाग में यह भी जोडा है कि जीवन की उपब्धियां, गोधन, परिवार स्त्री सुख इत्यादि भी बिना जुए के आनन्द पूर्वक जीवन प्रदान करते हैं.
subodhkumar प्रिय
subodhkumar
प्रिय रोहित जी के द्वारा जुए के वेद मंत्र के संदर्भ मे पूरा ऋग्वेद का सूक्त पढने का अवसर मिल गया.
प्रसंग वश इस सूक्त का चौथा मंत्र इस प्रकार है.
"अन्ये जायां परि मृशंत्यस्य यस्या गृधद्वेदने वाज्यक्ष:!
पिता माता भ्रातर एनमाहुर्न जानीमो नयता बद्धमेतम !! ऋग्वेद 10/34/4
इस मन्त्र का पूज्य सातवलेकर जी ने निम्न भाष्य किया है.
"जिस जुआरी के धन पर बलवान जुए की लोभ लोभ्दृष्टि हो जाए तो उस की स्त्री को भी दूसरे लोग बालोंसे हाथ से पकडते हैं. उस के माता पिता और भाई भी कहते हैं कि हम इसे नही जानते , इसे बांध कर ले जाओ."
क्या आर्य जन महाभारत में द्रोपदी के साथ दुर्व्यवहार की भविष्यवाणी इस वेद मंत्र में देखते हैं ?
इस मन्त्र
इस मन्त्र को परमात्मा का आदेश मानते हुए अपने जीवन में उतारने का पर्यत्न करें।
धन्यवाद्
Rohit Arya (Arsh Gurukul Noida)