पहले मन को निर्मल करो

एक महात्मा थे। वे किसी के घर पर भिक्षा माँगने गए। घर कि महिला ने महत्मा जी को भिक्षा दी और हाथ जोडकर बोली ‍: महाराज कुछ उपदेश कीजिए ।
महात्मा ने कहा कि = आज नही कल उपदेश दूंगा।
महिला ने कहा ‍= "तो कल भी यही से भिक्षा लीजिए।" दूसरे दिन जब महात्मा जी भिक्षा लेने के लिए चलने लगे तो अपने कमण्डल में कुछ गोबर भर लिया और कमण्डल को लेकर महिला के घर भिक्षा लेने हेतू पहुंचे। महिला ने उस दिन खीर बनाई थी। महिला जब कमण्डल में खीर डालने लगी तो देखा कि कमण्डल में गोबर भरा हुआ है। रुककर बोली की महाराज यह कमण्डल तो गन्दा है।
महात्मा जी ने कहा हां गन्दा तो है इसमें गोबर भरा हुआ है। महिला कहती है कि मै इसे धोकर लाती हूं।
तब महात्मा जी कहते है कि अच्छा माते इस पात्र को साफ करने के पश्चात् तब डालोगी खीर।
महिला कहती है कि इस कमण्डल को साफ करने के पश्चात् इसमें खीर डाली जाएगी।

महात्मा जी बोले कि यही मेरा उपदेश है। जब तक मन मे चिन्ता रूपी गोबर भरा हुआ है, बुरे स‌ंस्कारों का गोबर भरा है,तब तक उपदेश के अमृत का लाभ नहीं हो सकता।

अत: जीवन मे यदि सत्य उपदेश को प्राप्त करना है, ईश्वर के वास्तविक स्वरूप को पहचानना है तो पहले मन को निर्मल करना अत्यन्त आवश्यक है। जब मन निर्मल होगा तभी आनन्द की ज्योति जागती है।
कबीरा मन निर्मल भया, जैसे ग‌ंगा नीर,
पाछे‍ पाछे हरि फिरै, कहत कबिर कबीर।।

ANKUR KUMAR ARYA(ARYA SAMAJ NOIDA)

subodhkumar अति

subodhkumar
अति सुन्दर व्याख्यान है.
परंतु यह भी समझ मे आना चाहिए कि चित्त को निर्मल कैसे करें.
महर्षि ने आर्य समाज के निर्माण के समय आर्य समाज के दस नियम बनाकर एक मार्ग दर्शन प्रदान किया था. यह सारे मानव जाति से सम्बन्ध रखता है.
परंतु अपने को आर्य मान कर गर्व करने वाले हम इस दिशा मे कितना प्रयत्न कर पाते हैं? और हम अपने मित्रों को इस दिशा मे प्रगति करने मे कितनी सहायता कर पाते हैं?

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