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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

महात्मा नारायण स्वामी जी की कठोपनिषद्' पर टीका - प्रथमा वल्ली(3)

.. उस धर्मज्ञ‌ पुरुष की चेतावनी से यम सावधान होकर नचिकेता के पास आया और अपने कल्याणार्थ, आतिथ्य न कर सकने और नचिकेता के तीन रात भूखे रहने के प्रायश्‍चित रूप में तीन वर देने का वचन दिया |

(अब गतांक से आगे)

शान्त सङ्क‌ल्पा सुमना यथा स्याद्वीतमन्युगौंतमो माभि मृत्यो |
त्दत्प्रसुष्‍टं मामपिवदेत् प्रतीत एतत् त्रयाणाँप्रथमं वरं वृणे ||10||
यथा पुरस्ताद्भविता प्रतीत औद्दालकिरारुणिर्मत्प्रसृष्‍टः |
सुखं.रात्रीः शयिता वीतमन्युस्स्त्वाँ ददृशिवान्मृत्युमुखात्प्रमुक्‍त‌म् ||11||

अर्थ - (मृत्यो) हे मृत्यु ! (गौतमः) मेरा पिता गौतम (मा, अभि) मेरे प्रति शान्तसङ्कल्पः) अच्छे विचार वाला, (सुमनाः) प्रसन्नमन (वीतमन्युः) क्रोधरहित (यथा) जैसे पहले था, (स्यात्) होवे (त्वत् प्रसुष्‍टम्) आपके भेजे हुए (मा अभि) मुझे देखकर (प्रतीतः सन्) मुझ पर विश्‍वास करता हुआ (वदेत्) बातचीत करे (एतत्) यह (त्रयाणाम्) तीन में से (प्रथमम्) पहला (वरम्) वर (वृण) मांगता हूं ||10||

(औद्दालकिः) उद्दालकवशी (आरुणिः) अरुण का पुत्र तेरा पिता (गौतम) (यथा) जैसा (पुरस्तात्) पहले था (मत्प्रसुष्‍टः) मेरे भेजे हुए तुझ पर (प्रतीतः) विश्‍वास करने वाला (भविता) होगा (वीतमन्युः) क्रोधरहित होकर (रात्रीः) रात्रियों में (सुखम्) सुख से (शयिता) सोवेगा (त्वाम्) तुझको (मृत्युमुखात्) मौत के मुँह से (प्रमुक्‍तम्) छुटा हुआ (ददृशिवान्) देखेगा ||11||

व्याख्या - नचिकेता से उसका पिता अप्रसन्न हो ही चुका था | चाहे पिता का क्रोध अनुचित ही था, तब भी उस काल की पितृभक्ति प्रशंसनीय थी कि नचिकेता ने सबसे पहला वर अपने पिता की प्रसन्नता उपलब्ध करने के सम्बन्ध में ही मांगा* | वर्त्तमान उच्छृङ्खलता के काल में, दुःख है, पुत्र और पुत्रियों को इस प्रकार की मातृ और पितृ भक्ति की शिक्षा नहीं दी जाती जिसके लिए उर्दू के कवि ने उचित ही कहा है -

हम ऐसी कुल किताबें, काबिले जब्ती समझते हैं |
जिन्हें पढ़ करके लड़के बाप को खब्ती समझते हैं ||
(अकबर इलाहाबादी)

अस्तु ! यम ने यह वर कैसे दे दिया कि उसका पिता उससे प्रसन्न हो जायेगा | इसका उत्तर यह है कि यम को अपनी शिक्षा पद्धति पर विश्‍वास था | वह जानता था कि जब वे नचिकेता को मातृ पितृभक्त और ब्रह्मज्ञानी बना देगा तब ऐसे पुत्र से कोई पिता कैसे अप्रसन्न रह सकता है | सच तो यह है कि जब वाज‌श्रवा ने सुना होगा कि उसके पुत्र ने, सबसे पहला यत्त्न उसको प्रसन्न करने के लिए ही किया, उसका क्रोध तो इतनी ही बात से पुत्र की पितृभक्ति देखकर शान्त हो गया होगा |

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*. पुत्र से इस प्रकार की भावना की आशा करके पुत्र शब्द उसके लिए बनाया गया था | पुत्र शब्द की व्युत्पति संस्कृत में कई प्रकार से की जाती है, परन्तु भाव सबका एकसा है :-

(क) पुरु जायते, निपर्णाद्वा पुत् नरकं तस्मात्वायत इति वा | अर्थात् बहुत बचाता है दुःखों से (जो वह पुत्र है) अथवा (निरुक्‍त 2|11) पुत्र नाम नरक का है उससे जो बचाता है वह पुत्र है |

(ख) पुनाति त्रायते च स पुत्रः |
अर्थात् जो पवित्र करता है और रक्षा करता है वह पुत्र है |

(ग) मनुस्मृति 9|135 में लिखा है :-

पुन्नाम्नो नरकाद् यस्यात् त्रायते पितरं सुतः |
तस्मात् पुत्र इति प्रोक्‍तः स्वयमेव स्वयम्भुवा ||

अर्थात् नरक से जो पिता को बचाता है इसलिए स्वयं ब्रह्मा ने उसका नाम पुत्र रखा है |

(कमशः)