"अँगुली का जादू"
"अँगुली का जादू"
राह अब वह नहीं जो आज तक थी
आज उल्टी राह पर मैं चल पड़ा हूँ
आज ऊपर से न नीचे बह रहा हूँ
आज नीचे से मैं ऊपर चल पड़ा हूं
था जहाँ जकड़ा हुआ कब से पड़ा था
मैं वहीं पर आज राजा बन गया हूँ
मिल गया मुझको वह पारस
चाह जिसकी कब से था मन में संजोये
स्वर्ण से घरबार अपना भर रहा हूँ
राह अब वह नहीं जो आज तक थी
आज उल्टी राह पर मैं चल पड़ा हूँ
बांध रखा था छिछोरी दासता ने
कच्चे धागों से मुझे पर ऐसे बांधे
चल न पाया मैं कभी कैसे मैं बढ़ता
आज मुक्ति को मैं लेकिन चख रहा हूँ
थी नहीं कोई रुकावट सृष्टि में आजाद था मैं
फिर भी हर इक अंग को किसने था जकड़ा
व्याधी पर व्याधी बनी थी हर कहानी
राह को क्या जान पाता
छतपटाना ही लिखा जब भाग्य में था
आज पर कैसे वह उल्टा भाग्य मेरा
बन्दी सारे बन्धनों से मुक्त होकर
राज्य का अपने बना है फिर से राजा
वाह कैसे भाग्य ने खाया है पलटा
कोई तो जादू कहीं पर चल गया है
वरना क्या ओकात थी मेरी यहां पर
एक बन्दी बन के कारागार में मैं
छटपटाने के सिवा कुछ कैसे करता
नष्ट कर देता यूँ जीवन, पर नहीं ऐसा था मुमकिन
सृष्टि के राजा की अँगुली को था थामा
छूट कर सब कुछ गिरा, गिरता रहा सारी उमर भर
पर नहीं छोड़ी थी अँगुली, न कभी उसने छुड़ाई
आज उस अँगुली का जादू चल चुका है
आज बन्दी एक राजा बन चुका है ||
