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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

वेदो में विज्ञान व शिल्पविद्या के रहस्य (20)

अस्मान्सु तत्र चोदयेन्द्र राये रभस्वतः | तुविद्युम्न यशस्वतः ||6||
ऋग्वेद 1|9|6||

पदार्थ - हे (तुविद्युम्न) अत्यन्त विद्यादिधनयुक्‍त‌ (इन्द्र) अन्तर्यामी ईश्वर ! (रभस्वतः) जो आलस्य को छोड़ के कार्य्यों के आरम्भ करने (यशस्वतः) सत्कीर्तिसहित (अस्मान्) हम लोग पुरुषार्थी विद्या धर्म और सर्वोपकार से नित्य प्रयत्न करनेवाले मनुष्यों को (तत्र) श्रेष्‍ठ‌ पुरुषार्थ में (राये) उत्तम उत्तम धन की प्राप्ति के लिये (सुचोदय) अच्छी प्रकार युक्‍त‌ कीजिये ||6||

भावार्थ - सब मनुष्यों को उचित है कि इस सृष्टि में परमेश्वर की आज्ञा के अनुकूल वर्त्त‌मान तथा पुरुषार्थी और यशस्वी होकर विद्या तथा राज्यलक्ष्मी की प्राप्ति के लिये सदैव उपाय करें | इसी से उक्त गुणवाले पुरुषों ही को लक्ष्मी से सब प्रकार का सुख मिलता है, क्योंकि ईश्वर ने पुरुषार्थी सज्जनों ही के लिये सब सुख रचे हैं ||6||

सं गोमदिन्द्र वाजवदस्मे पृथु श्रवो बृहत् | विश्‍वायुर्धेह्यक्षितिम् ||7||
ऋग्वेद 1|9|7||

पदार्थ - हे (इन्द्र) अनन्त विद्यायुक्त सबको धारण करनेहारे ईश्‍व‌र ! आप (अस्मे) हमारे लिये (गोमत्) जो धन श्रेष्ठ वाणी और अच्छे अच्छे उत्तम पुरुषों को प्राप्त कराने (वाजवत्) नाना प्रकार के अन्न आदि पदार्थों को प्राप्त कराने वा (विश्‍वायुः) पूर्ण सौ वर्ष वा अधिक आयु को बढ़ाने (पृथु) अति विस्तृत (बृहत्) अनेक शुभ गुणों से प्रसिद्ध अत्यन्त बड़ा (अक्षितम्) प्रतिदिन बढ़नेवाला (श्रवः) जिसमे अनेक प्रकार की विद्या वा सुवर्ण आदि धन सुनने में आता है, उस धन को (संधेहि) अच्छे प्रकार नित्य के लिये दीजिये ||7||

भावार्थ - मनुष्यों को चाहिये कि ब्रह्मचर्य्य का धारण, विषयों की लम्पटता का त्याग, भोजन आदि व्यवहारों के श्रेष्ठ नियमों से विद्या और चक्रवर्त्ति राज्य की लक्ष्मी को सिद्ध करके संपूर्ण आयु भोगने के लिये पूर्वोक्त धन के जोड़ने की इच्छा अपने पुरुषार्थ द्वारा करें कि जिससे इस संसार का वा परमार्थ का दृढ़ और विशाल अर्थात् अति श्रेष्ठ सुख सदैव बना रहे, परन्तु यह उक्त सुख केवल ईश्वर की प्रार्थना से ही नहीं मिल सकता, किन्तु उसकी प्राप्ति के लिये पूर्ण पुरुषार्थ भी करना अवश्य उचित है ||7||

अस्मे धेहि श्रवो बृहद् द्युम्नं सहस्त्रसातमम् | इन्द्र ता रथिनीरिषः ||8||
ऋग्वेद 1|9|8||

पदार्थ - हे (इन्द्र) अत्यन्त बलयुक्त ईश्‍व‌र ! आप (अस्मे) हमारे लिये (सहस्त्रसातमम्) असंख्यात सुखों का मूल (बृहत्) नित्य वृद्धि को प्राप्त होने योग्य (द्युम्नम्) प्रकाशमय ज्ञान तथा (श्रवः) पूर्वोक्‍त‌ धन और(रथिनीरिषः) अनेक रथ आदि साधनसहित सेनाओं को (धेहि) अच्छे प्रकार दीजिये ||8||

भावार्थ - हे जगदीश्‍वर ! आप कृपा करके जो अत्यन्त पुरुषार्थ के साथ जिस धन करके बहुत से सुखों को सिद्ध करनेवाली सेना प्राप्त होती है, उसको हम लोगों में नित्य स्थापन कीजिये ||8||

वसोरिन्द्रं वसुपति गीर्भिर्गृणन्त ऋग्मियम् | होम गन्तारमूतये ||9||
ऋग्वेद 1|9|9||

पदार्थ - (गीर्भिः) वेदवाणी से (गृणन्तः) स्तुति करते हुये हम लोग (असुपतिम्) अग्नि, पृथिवी, अन्तरिक्ष, आदित्यलोक, द्यौ अर्थात् प्रकाशमान लोक, चन्द्रलोक और नक्षत्र अर्थात् जितने तारे दीखते हैं , इन सब‌का नाम वसु है, क्योंकि ये ही निवास के स्थान हैं, इनका पति स्वामी और रक्षक (ऋग्मियम्) वेदमन्त्रों के प्रकाश करनेहारे (गन्तारम्) सब का अन्तर्यामी अर्थात् अपनी व्याप्ति से सब जगह प्राप्त होने तथा (इन्द्रम्) सब के धारण करने वाले परमेश्‍वर को (वसोः) संसार में सुख के साथ वास कराने का हेतु जो विद्या आदि धन है उसकी (ऊतये) प्राप्ति और रक्षा के लिये (होम) प्रार्थना करते है ||9||

भावार्थ - सब मनुष्यों को उचित है कि - जो ईश्‍वरपन का निमित्त, संसार का स्वामी, सर्वत्र व्यापक इन्द्र परमेश्‍वर है, उसकी प्रार्थना और ईश्‍वर के न्याय आदि गुणों की प्रशंसा, पुरुषार्थ के साथ सब प्रकार से अति श्रेष्‍ठ विद्या राज्यलक्ष्मी आदि पदार्थों को प्राप्त होकर उनकी उन्नती और रक्षा सदा करें ||9||

सुतेसुते न्योकसे बृहद् बृहत् एदरिः | इन्द्राय शूषमर्चति ||10||
ऋग्वेद 1|9|10||

पदार्थ - जो (अरिः) सब श्रेष्‍ठ गुण और उत्तम सुखों को प्राप्त होनेवाला विद्वान मनुष्य (सुतेसुते) उत्पन्न हुए पदार्थों में (बृहते) संपूर्ण श्रेष्‍ठ गुणों में महान् सब में व्याप्त (न्योकसे) निश्चित जिसके निवासस्थान हैं, (इत्) उसी (इन्द्राय) परमेश्‍वर के लिये अपने (बृहत्) सब प्रकार से बढ़े हुए (शूषम्) बल और सुख को (आ) अच्छी प्रकार (अर्चति) समर्पण करता है, वही बलवान् होता है ||10||

भावार्थ - जब शत्रु भी मनुष्य सबमें व्यापक मङ्गलमय उपमारहित परमेश्‍वर के प्रति नम्र होता है, तो जो ईश्‍वर की आज्ञा और उसकी उपासना में वर्त्तमान मनुष्य हैं, वे ईश्‍वर के लिये क्यों न नम्र हों ? जो ऐसे हैं वे ही बड़े बड़े गुणों से महात्मा होकर सबसे सत्कार किये जाने के योग्य होते, और वे ही विद्या और चक्रवर्त्ति राज्य के आनन्द को प्राप्त होते हैं | जो कि उनसे विपरीत हैं वे उस आनन्द को कभी नहीं प्राप्त हो सकते ||10||

(महर्षि दयानन्द सरस्वती के ऋग्वेदभाष्य पर आधारित एवं संक्षेप में उद्दृत्)
THE SECRETS OF SCIENCE & TECHNOLOGY IN VEDAS (19)
(Based on & Reproduced from Maharshi Dayanand Saraswati's RIGVED BHASHYA)