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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

अथर्ववेद के ज्ञान से पौरोहित्य

ओउम् | अग्निर्जातो अथर्वणा विदद्विश्‍वानि काव्या |
भुवद्‍दूतो विवस्वतो वि वो मदे प्रियो यमस्य काम्यो विवक्षसे ||
ऋग्वेद 10|21|5

शब्दार्थ -

अथर्वणा.............अथर्ववेद से,अथर्ववेद के ज्ञान में
जातः.................प्रसिद्ध होकर
अग्निः...............ज्ञानी = पुरोहित
विश्‍वानि.............सम्पूर्ण
काव्य................परम कवि के वचन, वेद, तथा कवि के कर्त्तव्यों को
विदत्................जाने, प्राप्त करे और विचारे | वह
विवस्वतः............विवस्वान् का, काल का
दूतः..................दूत
भुवत्.................होता है और
वः....................तुम्हारे
मदे...................मद = आनन्द के लिए तथा
विवक्षसे..............विशेष कथन के लिए तथा विशेष भार उठाने के लिए
यमस्य...............संयम का
वि....................विशेष
प्रियः.................प्यारा = प्रेमी होती है |

व्याख्या -

वेद में कई स्थानों पर अग्नि को पुरोहित कहा गया है | वेद का आरम्भ ही अग्नि को पुरोहित मानकर हुआ है - (1) अग्निमीळेपुरोहितम् (ऋ.1|1|1) पुरोहित अग्नि की स्तुति करता हूँ | (2) असि ग्रामेष्‍वविता पुरोहितोसि यज्ञेसु मानुषः (ऋ.1|44|10) ग्रामों में तू रक्षक है और और यज्ञों में मनुष्य का हितकारी पुरोहित है | इसी प्रकार के बीसियों अन्य वैदिक प्रमाण हैं, जिनमें अग्नि को पुरोहित बताया गया है | पुरोहित बनने के लिए अथर्ववेद का ज्ञान अत्यन्त आवश्यक है, क्योंकि पुरोहित द्वारा कराये जाने वाले सम्पूर्ण संस्कारों के मन्त्र अथर्ववेद में हैं | अथर्ववेद में शरीर और आत्मा को संस्कृत करने के साधन विशद रूप से समझाये गये हैं |

अथर्ववेद अन्तिम वेद है , उसको समझने के लिए पहले तीन वेदों का जानना भी आवश्यक है अर्थात् अथर्ववेद समाप्त करते‍-करते सम्पूर्ण वेदों का ज्ञान हो जाता है | इसीलिए कहा है - विदद्विश्‍वानि काव्या = परम कवि के सम्पूर्ण वचनों को जान लेता है, अथवा पुरोहित के सकल कर्त्तव्यों को जान लेता है | पुरोहित काल की सूचना देता है अर्थात् किस समय क्या करना चाहिए, इसका उपदेश करना पुरोहित का काम है | दूसरे शब्दों में मनुष्य को अपनी दिनचर्य्या पुरोहित के निर्देश के अनुसार बनानी चाहिए | बहुधन्धी मनुष्य बहुधा अपने कर्त्तव्यों को भूल जाता है | पुरोहित उसे सावधान करता रहता है | पुराने आर्य्यों में एक नियम था कि वे अपने परिवार का एक पुरोहित अवश्य नियत करते थे | पुरोहित अपने यजमान के सब दुःखों का निवारण करता था | राजा दिलीप ने पुरोहित-प्रवर वसिष्‍ठ से कहा था - उपपन्नं ननु शिवं सप्‍त‌स्वंगेषु यस्य में | देवीनां मानुषीणां च प्रतिहर्त्ता त्वमापदाम् (रघुवंश, 1|60)सचमुच मेरे राज्य के सातो अंगों में कल्याण है , क्योंकि मेरी दैवी और मानुषी आपत्तियों को दूर करने वाले आप हो |

यह कोरी कविकल्पना नहीं है | वैदिक पुरोहित ऐसे ही हुआ करते थे | अथर्ववेद का 3|19 समस्त सूक्‍त पुरोहित का ‍घोष है | पुरोहित कहता है - प्रेता जयता नर उग्रा वः सन्तु बाहवः (अ. 3|19|7) हे मनुष्यो ! आगे बढ़ो, विजय करो | तुम्हारे भुजा उग्र हों | एषां राष्‍ट्रं सुवीरं वर्धयामि (अ. 3|19|5) = इनके राष्‍ट्र को उत्तम वीरों से भरपूर करके बढ़ाता हूँ | जिष्ण्वेषां चित्तम् अ. 3|19|5) = इनका चित्त जयशील हो | संशितं क्षत्रमजरमस्तु जिष्णुर्येषामस्मि पुरोहितः (3|19|1) = जिनका मैं पुरोहित हूँ, उनका सुतीक्ष्ण क्षात्र तेज अजर रहे, घटे नहीं | अथर्ववेद से यदि पुरोहित बनता है तो पुरोहित की महिमा भी वहीं गा‍ई है | पुरोहित बनने के लिए संयमी होना चाहिए, यह मन्त्र के अन्त में कहा गया है ||

स्वामी वेदानन्द तीर्थ सरस्वती
(स्वाध्याय-सन्दोह से साभार)