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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

अथ वेदविषयविचारः (8)

(गतांक से आगे) -

प्र. क्या यज्ञ करने के लिये पृथिवी खोद के वेदिरचन, प्रणीता, प्रोक्षणी और चमसादि पात्रों का स्थापन, दर्भ का रखना, यज्ञशाला का बनाना और ऋत्विजों का करना, यह सब करना ही चाहिये ?

उ. - करना तो चाहिये, परन्तु जो जो युक्‍ति सिद्ध हे, सो सो ही करने के योग्य हैं | क्योंकि जैसे वेदि बना के होम करने से वह द्रव्य शीघ्र भिन्न भिन्न परमाणुरूप होके, वायु और अग्नि के साथ आकाश में फैल जाता है, ऐसे ही वेदि में भी अग्नि तेज होने और होम का साकल्य इधर उधर बिखरने से रोकने के लिये वेदि अवश्य रखनी चाहिये | और वेदि के त्रिकोण, चतुष्कोण, गोल तथा श्येन पक्षी के तुल्य बनाने के दृष्‍टान्त से रेखागणितविद्या भी जानी जाती है कि जिससे त्रिभुज आदि रेखाओं का भी मनुष्यों को यथावत् बोध हो | तथा उसमे जो ईंटों की संख्या की है उससे गणितविद्या भी समझी जाती है | इस प्रकार से कि जब इतनी लम्बी चौड़ी और गहरी वेदी हो, तो उसमें इतनी बड़ी ईंटें इतनी लगेंगी, इत्यादि वेदि के बनाने में बहुत प्रयोजन हैं | तथा सुवर्ण, चांदी वा काष्‍ठ के पात्र इस कारण से बनाते हैं कि उनमें जो घृतादि पदार्थ रक्खे जाते हैं वे बिगड़ते नहीं | और कुश इसलिये रखते हैं कि जिससे यज्ञशाला का मार्जन हो, और चिंवटी आदि कोई जन्तु वेदि की ओर अग्नि में न गिरने पावे | ऐसे ही यज्ञशाला बनाने का यह प्रयोजन है कि जिससे अग्नि की ज्वाला में वायु अत्यन्त न लगे , और वेदि में कोई पक्षी किंवा उनकी बीठ भी न गिरे | इसी प्रकार ऋत्विजों के बिना यज्ञ का काम कभी नहीं हो सकता, इत्यादि प्रयोजन के लिये यह सब विधान यज्ञ में अवश्य करना चाहिये | इनसे भिन्न द्रव्य की शुद्धि और संस्कार आदि भी अवश्य करने चाहिए | परन्तु इस प्रकार से प्रणीतापात्र रखने से पुण्य और इस प्रकार रखने से पाप होता है, इत्यादि कल्पना मिथ्या ही है | कितु जिस प्रकार करने में यज्ञ का कार्य अच्छा बने, वही करना अवश्य है, अन्य नहीं |

प्र. यज्ञ में देवता शब्द से किसका ग्रहण होता है ?

उ. जो जो वेद में कहे हैं उन्हीं का ग्रहण होता है, इसमें यह यजुर्वेद का प्रमाण है कि - (अग्निर्देव. ) कर्मकाण्ड अर्थात् यज्ञक्रिया में मुख्य करके देवता शब्द से वेदमन्त्रों का ही ग्रहण करते है, क्योंकि जो गायत्र्यादि छन्द हैं वे ही देवता कहाते हैं | और इन वेदमन्त्रों से ही सब विद्याओं का प्रकाश भी होता है | इसमें यह कारण है कि जिन जिन मन्त्रों में अग्नि आदि शब्द हैं, उन उन मन्त्रों का और उन उन शब्दों के अर्थों का अग्नि आदि देवता नामों से ग्रहण होता है | मन्त्रों का देवता नाम इसलिये है कि उन्हीं से सब अर्थों का यथावत् प्रकाश होता है |

(कर्मस.) वेदमन्त्रों करके अग्निहोत्र से लेके अश्वमेधपर्य्यन्त सब यज्ञों की शिल्पविद्या और उनके साध‌नों की सम्पत्ति अर्थात् प्राप्ति होती, और कर्मकाण्ड को लेके मोक्षपर्य्य‌न्त सुख मिलता है इसी हेतु से उनका नाम देवता है |

(अथातो.) दैवत उनको कहते हैं कि जिनके गुणों का कथन किया जाय, अर्थात् जो जो संज्ञा जिन जिन शब्दों में जिस जिस अर्थ की होती है उन उन मन्त्रों का नाम वही देवता है | जैसे 'अग्नि दूतं' इस मन्त्र में अग्नि शब्द चिह्न है, यहाँ इसी मन्त्र को अग्नि देवता जानना चाहिये | ऐसे ही जहाँ जहाँ मन्त्रों में जिस जिस शब्द का लेख है, वहाँ वहाँ उस मन्त्र [शब्द ] को ही देवता समझना होता है | इसी प्रकार सर्वत्र समझ लेना चाहिये | सो देवता शब्द से जिस जिस गुण से जो अर्थ लिये जाते हैं, सो सो निरुक्त और ब्राह्मणादि ग्रन्थों में अच्छी प्रकार लिखा है |

इसमे कारण यह है कि ईश्वर ने जिस जिस अर्थ को जिस जिस नाम से वेदों में उपदेश किया है, उस उस नाम वाले मन्त्रों से उन्हीं अर्थों को जानना होता है | सो वे मन्त्र तीन प्रकार के हैं | उनमें से क‍ईं एक परोक्ष अर्थात् अप्रत्यक्ष अर्थ के क‍ई एक प्रत्यक्ष अर्थात् प्रसिद्ध अर्थ के, और क‍ई एक आध्यात्मिक अर्थात् जीव परमेश्‍वर और सब पदार्थों के कार्य्य कारण के प्रतिपादन करने वाले हैं | इससे क्या आया कि त्रिकालस्य जितने पदार्थ और विद्या हैं, उनके विधान करनेवाले मन्त्र ही हैं | इसी कारण से इनका नाम देवता है |

जिन जिन मन्त्रों में सामान्य अर्थात् जहां जहां किसी विशेष अर्थ का नाम प्रसिद्ध नहीं दीख पड़ता, वहां वहां यज्ञ आदि को देवता जानना होता है | (अग्निमीळे.) इस मन्त्र के भाष्य में जो तीन प्रकार का यज्ञ लिखा है, अर्थात् एक तो अग्निहोत्र से ले के अश्‍वमेध पर्य्यन्त, दुसरा प्रकृति से लेके पृथिवी पर्य्यन्त जगत् का रचनरूप तथा शिल्पविद्या, और तीसरा सत्संग आदि से जो विज्ञान और योगरूप यज्ञ है, ये ही उन मन्त्रों के देवता जानना चाहियें | तथा जिनसे यह यज्ञ सिद्ध होता है, वे यज्ञाङ्ग भी उन मन्त्रों के देवता हैं | और जो इनसे भिन्न मन्त्र हैं उनका प्राजापत्य‌ अर्थात् परमेश्वर ही देवता है | तथा जो मन्त्र मनुष्यों का प्रतिपादन करते हैं, उनके मनुष्य देवता हैं | इसमें बहुत प्रकार के विकल्प हैं कि कहीं पूर्वोक्त देवता कहाते हैं, कहीं यज्ञादि कर्म, कहीं पिता, कहीं विद्वान, कहीं अतिथि और कहीं आचार्य्य देव कहाते हैं | परन्तु इसमें इतना भेद है कि यज्ञ में मन्त्र और परमेश्वर को ही देव मानते हैं |

जो जो गायत्र्यादि छन्दों से युक्‍त वेदों के मन्त्र, उन्हीं में ईश्‍वर की आज्ञा, यज्ञ और उनके अंग अर्थात् साधन, प्रजापति जो परमेश्वर, नर जो मनुष्य, काम, विद्वान, अतिथि, माता, पिता और आचार्य्य ये आपने दिव्य गुणों से ही देवता कहाते हैं | परन्तु यज्ञ में तो वेदों के मन्त्र और ईश्वर को ही देवता माना है |

(क्रमशः)

(महर्षि दयानन्द कृत ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका से संक्षिप्त में उद्धृत)