Studying/ understanding ved -Procedure to study Ved Shashtra
I am retired person and like to learn Ved shastra.Is it possible to start now studying/ understanding and learning Ved shastra.Further can i take benefit and adopt the learning in present life and try to lead true ARYA life.
Thanks for expert advise to
Thanks for expert advise to start ARYA way of life.I have taken action as follows
-Started doing asan/physical exercises for about 30 minutes
-I have read Satyarth Prakash earlier but will start reading again(Got copy purchased in year 1976)
-Reading regularly explanation on various shlokas from Ved/Upanishad as given by you in this forum
-I like to start meditation - concentrate /spend about 15 minutes in the beginning
I have not studied Sanskrit but can pick up /understand shlokas.I can recite shalokas of sandhya
Dear Ramesh ji Namaste va
Dear Ramesh ji
Namaste va Dhanyawad
I hope as you have done we can all share the experieces with all & work togather towards the self development & the development of all as per directions of Vedas & our Vedic Rishi's, to our utmost & as far as possible.
With Regards
Anand
subodhkumar बंधुव
subodhkumar
बंधुवर,
सादर अभिवंदन,
मानव जीवन में वेदों का स्वाध्याय आरम्भ करने से अधिक सुंदर और कोई संकल्प नहीं हो सकता. आवश्यकता इस बात की खलती है कि वेदों के स्वाध्याय करते हुए आदमी अपने को अकेला पाता है.यह मेरा व्यक्तिगत अनुभव है. स्वाध्याय से मेरी निजी यह अपेक्षा है कि महर्षि दयानंद की दिखाई वेद भाष्य पद्धति का अनुसरण कर के और दूसरे वेद भाष्यों का अध्ययन, चिंतन कर के , दैनिक सामाजिक जीवन के विभिन्न पहलुओं पर आधुनिक समाजिक और भौतिक विज्ञान के अनुरूप वेदों के उपदेश को समझना और वेद अनुरागी आर्य मित्रों मे चर्चा कर के अपने विचारों के प्रचार से एक सामान्य सहमति बनाना अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है.
मेरा विषय इंजीनियरिंग रहा है. परंतु एक सौ वर्ष से चली आ रही अपने आर्य परिवार के वतावरण ने मुझे बाल्यकाल से ही वेद प्रेमी बना दिया था .पिछले लगभग आठ दस वर्षो से गोसेवा , सामाजिक जीवन से जुडे अनेक विषयों पर वेदों का स्वाध्याय चलता रह्ता है.
ऋग्वेद और अथर्व वेद का साथ साथ रख कर स्वाध्याय बडा सुखकर और चित्त को प्रसन्न रख कर आत्मोन्नति का एक बडा साधन बनता है . साथ ही आधुनिक सामाजिक विषयों पर वैदिक दृष्टिकोण भी प्राप्ता होता है.
अभी तक जिन विषयों पर वेदों का स्वाध्याय होता रहा हे, वे इस प्रकार ध्यान मे आते हैं
1.वेदों मे गौ ( गौमाता, गोदुग्ध, गोपालन, मानव स्वास्थ्य विज्ञान, कृषि, सामाजिक समृद्धि, सामाजिक
समरसता पर्यावरण , पञ्चगव्य के संदर्भ में )
2. वैदिक चिंतन के आधार पर, शिक्षा , शासन , दारिद्र्यनाशन, का मार्ग दर्शन
अपनी वैज्ञानिक दृष्टि से जिस प्रकार मैंने वेदो का चिंतन किया है आरम्भ मे उस आधार पर
गर्ल चाइल्ड (Girl Child) पर एक लेख प्रस्तुत कर रहा हूँ .
आर्य मित्रो से प्रार्थना है इस प्रकार वेदों केव अध्ययन/स्वाध्याय पर अप्न्नी टिप्पणिया कर के इस विष्य को अधिक परिमार्जित करने मे भाग ले कर एक वेद अध्ययन मञ्च का निर्माण करें.1
आदरणीय
आदरणीय सुबोध जी
नमस्ते
यहाँ पर आपका मार्गदर्शक सम्बोधन पढ़कर हर्ष हो रहा है | गौ माता, पर्यावरण आदि पर आपके लेख पढ़ने को मिलते रहे हैं परन्तु हिन्दी फाण्ट में उतर आदि न दे पाने के कारण भी सँवाद बढ़ नही पाता है. यहाँ शायद वह कठिनाई नहीं होगी ? यहाँ आशा है सभी आपके लेखों का पूरा पूरा लाभ उठा पाएँगे तथा वेद अध्ययन मञ्च के निर्माण की और भी हम लोग अग्रसर हो सकेंगे | मुझे तो बहुत प्रसन्नता हो रही है कि आपके अनुभव से हम यहाँ पर भी लाभान्वित हो सकेंगे, अतः इसके लिए मैं पहले से ही अपनी कृतज्ञता प्रकट करता हूँ |
धन्यवाद |
subodhkumar
subodhkumar यज्ञ का महत्व (दैनिक जीवन में वेदों से)1
1. मनसे चेतसे धिय आकूतय उत चित्तये !
मत्यै श्रुताय चक्षसे विधेम हविषा वयम् !! अथर्व 6/41/1
(मनसे) सुख दु:ख आदि को प्रत्यक्ष कराने वाले मन के लिए (चेतसे) ज्ञान साधन चेतना के लिए (धिये) ध्यान साधन बुद्धिके लिए (आकूतये) संकल्प के लिए (मत्यै) स्मृति साधन मति के लिए, (श्रुताय) वेद ज्ञान के लिए ( चक्षसे) दृष्टि शक्ति के लिए (वयम) हम लोग (हविषा विधेम) अग्नि मे हवि द्वारा यज्ञ करते हैं.
भावार्थ: यज्ञाग्नि के द्वारा उपासना से मनुष्य को सुमति, वेद ज्ञान,चैतन्य, शुभ संकल्प, जैसी उपलब्धियां होती हैं जिन की सहायता से जीवन सफल हो कर सदैव सुखमय बना रहता है.
2. अपानाय व्यानाय प्राणाय भूरिधायसे !
सरस्वत्या उरुव्यचे विधेम हविषा वयम् !! अथर्व 6/41/2
(अपानाय व्यानाय) शरीरस्थ प्राण वायु के लिए (भूरिधायसे) अनेक प्रकार से धारण करने वाले (प्राणाय) प्राणों के लिए (उरुव्यचे) विस्तृत गुणवान सत्कार युक्त (सरस्वत्यै) उत्तम ज्ञान की वृद्धि के लिए (वयम हविषा विधेम) हम अग्नि मे हवि द्वारा द्वारा होम करते हैं.
भावार्थ: प्राणापानादि शरीरस्थ प्राण वायु के विभिन्न व्यापार मानव शरीर को सुस्थिर रखते हैं. इन्हें कार्य क्षेम रखने के लिए युक्ताहार विहार के साथ प्राणायामादि के साथ यज्ञादि संध्योपासना प्राणों को ओजस्वी बनाने के सफल साधन बनते हैं.
3. मा नो हासिषु र्ऋषियो दैव्या ये तनूपा ये ना तन्वSस्तनूजा: !
अमर्त्या मर्त्या अभि न: सचध्वमायुर्धत्त प्रतरं जीवसे न: !!
अथर्व 6/41/3
(ये) जो (दैव्या ऋषिय:) यह दिव्य सप्तऋषि(तनूपा) शरीर की रक्षा करने वाले हैं (ये न: तन्व: तनूजा) ये जो शरीर में इंद्रिय रूप में स्थापित हैं वे (न: मा हासिषु) हमें मत छोडें .(अमर्त्या:) अविनाशी देवगण
(मर्त्यान् न) हम मरणर्मा लोगों को (अभिसचध्वं) अनुगृहीत करो, (न: प्रतरं आयु:) हमारी दीर्घायु को (जीवसेधत्त) जीवन के लिय समर्थ करें
( इसी संदर्भ में दैनिक संध्या के मंत्र तच्चक्षुर्देवहितं पुरस्ताच्छुमुच्चरत्.... में शुक्रमुच्चरत् में ऊर्ध्वरेता का ब्रह्मचर्य का उपदेश अत्यंत महत्व रखता है .आधुनिक विज्ञान के अनुसार मानव मस्तिष्क की रचना उन्ही रसायनिक तत्वों की होती है जिन से रेतस बना होता है - Grey matter that constitutes human brain and seminal fluid have the same chemical composition.- यह हमारे ऋषियों के अनुसंधान पर आधारित ब्रह्मचर्य का वैज्ञानिक आधार है. यह एक दुख का विषय है कि पूर्वाग्रह से ग्रसित पाश्चात्य विद्या से प्रभावित भारतीय शिक्षित समाज भी ब्रह्मचर्य को एक दकयानूसी विचार मानते हैं. परन्तु यह एक निर्विवाद सत्य है कि एक स्वस्थ मस्तिष्क से ही सब ज्ञानन्द्रियां,मानव शरीर को अदीनास्याम बना सकती हैं. )
शरीरस्थ सप्तृषि: सात प्राण, दो कान (गौतम और भरद्वाज ज्ञान को भली भांति धारण करने से भरद्वाज) दो चक्षु (विश्वामित्र और जमदग्नि जिस से ज्योति चमकती है) दो नासिका (वसिष्ठ और कश्यप प्राण के संचार का मार्ग), और मुख (अत्रि:)
आदरणीय
आदरणीय सुबोध जी
एक प्रार्थना है कि ऐसे विद्वता पूर्ण लेख यदि आप मुख्य पृष्ठ पर डालें तो इसका लाभ अधिक सरलता से सभी ले सकेंगे |
आनन्द
subodhkumar माननी
subodhkumar
माननीय आनंन्द जी,
मेरे लेख को विद्वत्ता पूर्ण कह कर आप ने जो प्रशंसा की है, उस के लिए आभार. इस प्रकार का चिंतन एक व्यक्तिगत पांडित्य विहीन प्रयास मात्र है.विद्वत आर्य जन ऐसे विषयों मे रुचि ले कर इस सामग्री को एक परिमार्जित रूप दें, ऐसी मेरी इच्छा है.. सम्भवत: तब यह लेख आर्य समाज मे प्रचार के लिए मुख्य पृष्ट पर लाए जाएं, ऐसा मेरा विचार था.यदि ऐसे ही इस प्रकार के लेख मुख्य पृष्ट पर लाए जाने योग्य ठहरते हैं तब वह भी किया जा सकता है.
सुबोध कुमार
माननीय
माननीय सुबोध कुमार जी ,
आप का यह प्रयास स्तुत्य, प्रेरणास्पद और अनुकरणीय है|
धन्यवाद|
चिन्ता मणि वर्मा |
यज्ञ के
यज्ञ के महत्व को दर्शाने वाले यह वेद मन्त्र बारंबार पाठ की अपेक्षा रखते हैं | आदरणीय वर्मा जी के भावों में, मैं भी अपनी पूर्ण सहमति पाता हूँ |
आनन्द
subodhkumar हम
subodhkumar
हम में से कितने बन्धु इस ओर ध्यान भी दे पाते हैं, या प्रयास ही कर पाते हैं कि महर्षि ने नियम दिया है कि "वेद का पढना पढाना और सुनना सुनाना आर्यों का परम धर्म है."?
यह भी एक दुखद सत्य है कि हमारी शिक्षा प्रणाली मे हिन्दी संस्क़ृत को कोई महत्व भी नही दिया जा रहा. परंतु कहते हैं जहां चाह वहां राह.
मुझे कभी भी व्यवस्थित रूप से स्कूल में हिन्दी तक पढने का अवसर नही मिला, संस्कृत तो बहुत दूर की बात है. यह केवल माता पिता के घर के वातावरण का प्रभाव था कि वेदों में अटूट श्रद्धा और जिग्यासा बचपन से ही उत्पन्न हो गई थी.
आरम्भ मे सार्वदेशिक सभा से सम्पूर्ण वेद भाष्य का सैट लिया, परंतु अपने एक वैग्यानिक दृष्टि कोण के कारण वेद में "सब सत्य विद्याओं " के खोज की लगन लगी रही. सातवलेकर जी का सम्पूर्ण वेद भाष्य लिया, फिर ग्रिफिथ, विलसन, व्हिटनी के वेद भाष्य भी लिए, फिर मोनियेर विलियम का संस्कृत अंग्रेज़ी कोष लिया, बीच मे यास्क भी ले लिया, अथर्व वेद के कई बडे अच्छे और भाष्य भी हाथ मे आए.और कितने ही छोट मोटे इस विषय के पुस्तक इकट्ठे हो गए. धातु कोश और सन्धि विच्छेद की जान कारी बढानी पडती है. वैदिक विद्वान मित्रों से सम्पर्क के साधन बने.वेदों के अध्ययन में रुचि बढती रही.
अपने इस वेदाध्ययन के अनुभव के आधार पर इतना ही कह सकता हूं कि हर एक शिक्षित व्यक्ति वेदों के अध्ययन मे प्रगति पा सकता है. यह मेरा बडा सौभाग्य है कि पांच वर्ष पूर्व नाग प्रकाशन द्वारा मुझे स्व0 पं चन्द्रशेखर उपाध्याय एवं उन के पौत्र श्री अनिल कुमार उपाध्याय IAS द्वार रचित वैदिक कोश के बारे मे पता चला. वेदाध्ययन मे इस वैदिक कोश से मुझे अद्वितीय सहायता मिलती रही है, ऋग्वेद और अथर्व वेद के पढने मे सूक्त के देवता और ऋषि को ध्यान मे रख कर पूरे सूक्त मे एक विषय प्रतिपादित दीखता है.इसी दृष्टि से वेद पढ कर विद्वानों से चर्चा करने से कुछ संतोष जनक प्रगति दीखती है. अपने अनुभव के अधार पर कह सकता हूं कि वेद पढने का प्रयास हर व्यक्ति कर सकता है, और आर्य मित्रों को तो अवश्य करना चहिये. व्यक्तिगत आत्मोन्नति के अलावा, आज के हर आधुनिकतम सामाजिक पहलू और समाज की विक्रितियों, कुरीतियों के समाधान पर वेदों से उपदेश प्राप्त होता है.
The question raised by sh
The question raised by sh Ramesh ji is I think a question which should arise in every ones mind at some time in his/her life. It may be , when he or she retires or gets tired out of these worldly affairs. After all this world gives us all but peace. Hence True Knowledge that may guide the soul towards attainment of peace is the ultimate requirement of soul. Without light we can't see the path, then how without the spiritual knowledge we can get spirituality ? Like the true source of light , the Sun shines, so shine VEDAS as the true source of knowledge. Let's pick them , read them, follow them and then spread whatever we have learnt to others requiring the same knowledge and the PEACE.
I think it's never too late to start any good thing in life. When we start, we can take it as a dawn. The study of Ved shastras has been amply explained in 3rd Sammulaus of Satyarth Prakash. We can also go to to some Sadhak Ashram for a week or so and get started in this regard or go to some AryaSamaj Where some good preacher is available. Or if nothing is possible, start reading Satyarth Prakash, go on reading it slowly & steadily till you start understanding it. It is full of knowledge. Go & read some vedic explanations of Upnishdas.. Also read Patanjali’s Yog Darshan. Read them more than once, so that we can assimilate them. Then follow Yogi RamDevji and do some Asan, Pranayam to keep the body healthy & to recover back from any diseases, that may have crept in our bodies. Finally learn to sit for atleast an hour in the morning & evening in Sandhya. Follow Rishi Dayanad, do pranayam in between and try to raise their numbers steadily. This will immensely benefit the development of Atm-shakti. We can in this way get started, and as we move ahead, the light ahead will continue to show us our path.
So my request to Dear Ramesh ji is to start Arya way of life, without any fear, without any hesitation, it will surely help in achieving Happiness in this life as well as in the life to come.
With heartiest Best Wishes,as you are also retired like some of us, I would most welcome you in this journey ahead.