सतत् विकास कि ओर (5) - आर्य संन्यासी महात्मा गोपाल स्वामी सरस्वती जी

गतांक से आगे -

कर्म कुशलता -

व्यवहार कुशलता के साथ ही विकास का अनिवार्य अंग है - कर्म कुशलता | कुशलता के मानो दो पैर हैं | एक व्यवहार, दूसरा कर्म | चलने के लिये, आगे बढ़ने के लिये जैसे दोनों पैरों की सक्रियता जरूरी है, उसी प्रकार सतत् विकास की ओर बढ़ने में व्यवहार कुशलता और कर्मकुशलता दोनों जरूरी हैं | कुशलता का अर्थ है ,'नियत कर्य का दक्षता के साथ नियत अथवा उससे कम समय में गुणवत्ता-पूर्ण निष्पादन‌' | इस प्रकार कर्मकुशलता कर्त्तव्य-मार्ग की एक साधना है, जिसका परिणाम है उत्तरोत्तर विकास एवं प्रगति | भारतीय मनीषा में तो कार्यकुशलता को योग का पर्याय माना गया है - "योगः कर्मसु कौशलम्" (गीता 2.50) कर्मों में कुशलता ही योग है, और योग चर्चा का विषय नहीं, साधना का, क्रिया का विषय है | अतः कर्मकुशल होने के लिये यह आवश्यक है, कि -

- कर्त्ता को करणीय कार्य की, उसकी विधा व तकनीक की पूरी समझ हो |

- कर्त्ता कार्य को कर्त्तव्य भावना से पूर्ण मनोयोग से करे |

- कर्त्ता का लक्ष्य कार्य के गुणवत्तापूर्ण निष्पादन में हो, कार्य को मात्र ढकेलने या बेगार टालने में नहीं |

- कर्त्ता इस बात के लिये अन्तः प्रेरित हो कि उसे कार्य को दक्षता के साथ नियत अथवा उससे कम समय में गुणवत्तापूर्ण ढ़ंग से निष्पादित करके अपनी सुयोग्यता, सक्षमता और उत्कृष्टता को सिद्ध करना ही है |

- कर्त्ता की मनोवृत्ति, कर्मफल में आसक्ति की न होकर, सफलता की उपलब्धी की होनी चाहिये |

ध्यान रहे कि कर्त्ता जब कर्मफल पर अपना अधिकार समझने लगता है, अर्थात् कर्मफल में उसकी आसक्ति हो जाती है, तब क्षोभ उत्पन्न होने लगता है | क्षोभ क्षेम को नष्ट कर देता है, और वही कर्त्ता भविष्य में कार्यकुशल नहीं रह पाता | इसीलिये गीता में कहा है - 'कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदा चन |' (गीता 2.47) | किन्तु कार्य-साफल्य तथा उपलब्धी की भावना कर्मकुशल कर्त्ता को सतत् प्रेरित् एवं उत्साहित रखती है | निरन्तर कर्मकुशल बने रहने के लिये कार्यक्षेत्र में सफलतायें तथा उपलब्धियाँ ही सहायक होती हैं, और कोई मार्ग नहीं | वेद में तो यहाँ तक कहा गया गया है, कि तू ऐसा कर्मकुशल बन कि सब तेरी कार्यकुशलता पर मुग्ध हो जावें |

विश्वकर्मन् हविषा वावृधानः स्वयं यजस्व पृथिवीमुत द्याम् |
मुह्यन्त्वन्येSअभितः जनासSइहास्माकं मघवा सूरिरस्तु ||
ऋग़् 10|81|6; यजु. 17|22; साम. 1589

हे (विश्वकर्मन्) सर्व कर्मकुशल ! (मधवा) पूजित धन का स्वामी परमात्मा (अस्माकम्) हमारा (सूरिः) प्रेरक है | उसी की प्रेरणा से तू (हविषा) जीवन-हवि से (वावृधान) बढ़ता हुआ (पृथिवीम् उत द्याम) पृथिवी और द्यौ से (स्वयं यजस्व) स्वयं इस प्रकार युक्त हो, कि (अन्ये जनासः) अन्य जन (अभितः) सर्वतः तुझ पर (मह्यन्तु) मुग्ध हो जावें |

(क्रमशः

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