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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

महात्मा नारायण स्वामी जी की कठोपनिषद्' पर टीका - प्रथमा वल्ली(4)

...अस्तु ! यम ने यह वर कैसे दे दिया कि उसका पिता उससे प्रसन्न हो जायेगा | इसका उत्तर यह है कि यम को अपनी शिक्षा पद्धति पर विश्वास था | वह जानता था कि जब वे नचिकेता को मातृ पितृभक्त और ब्रह्मज्ञानी बना देगा तब ऐसे पुत्र से कोई पिता कैसे अप्रसन्न रह सकता है | सच तो यह है कि जब वाजश्रवा ने सुना होगा कि उसके पुत्र ने, सबसे पहला यत्त्न उसको प्रसन्न करने के लिए ही किया, उसका क्रोध तो इतनी ही बात से पुत्र की पितृभक्ति देखकर शान्त हो गया होगा |

(अब गतांक से आगे)

स्वर्गे लोके न भयं किञ्चनास्ति, न तत्र त्वं न जरया बिभेति |
उभे तीर्त्वाSशनाया पिपासे, शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ||12||

स त्वमग्निं. स्वर्ग्य‌मध्येषि मृत्यो, प्रब्रूहि तं श्रद्दधानाय मह्यम् |
स्वर्गलोका अमृतत्वं भजन्त, एतद् द्वितीयेन वृणे वरेण ||13||

प्रते ब्रवीमि तदु मे निबोध, स्वर्ग्यमग्निं नचिकेतः प्रजानन् |
अनन्तलोकाप्तिमथो प्रतिष्ठां, विद्धि त्वमेतन्निहितं गुहायाम ||14||

लोकादिमग्निं तमुवाच तस्मै, या इष्टका यावतोर्वा यथा वा |
स चापि तत्प्रत्यवदद्यथोक्तमथास्य मृत्युःपुनरेवाह तुष्टः ||15||

तमब्रवीत्प्रीयमाणो महात्मा, वरं तवेहाद्य ददामि भूयः |
तवैव नामना भविताSयमग्निः, सृङ्कां चेमामनेकरूपां गृहाण ||16||

त्रिणाचिकेतस्त्रिभिरेत्य सन्धिं, त्रिकर्मकृत्तरति जन्ममृत्यु |
ब्रह्मजज्ञं देवमीडयं विदित्वा, निचाय्येमां.शान्तिमत्यन्तमेति ||17||

त्रिणाचिकेतस्त्रयमेतद्विदित्वा, य एवं विद्वांश्चिनुते नाचिकेतम् |
स मृत्युपाशान् पुरतः प्रणोद्य, शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ||18||

अर्थ -

(स्वर्गेलोके) स्वर्ग लोक में (किञ्चन) कुछ भी (भयम्) भय ( न अस्ति) नहीं है (न, तत्र) न वहाँ (त्वम्) तू (मृत्यु) है और (न) कोई (जरया) बुढ़ापे से (विभेति) डरता है (अशनाया) भूख (पिपासे) और प्यास (उभे) दोनों को (तीर्त्वा) तैर कर (शोकातिगः) शोक से रहित (मनुष्य) (स्वर्गलोके) स्वर्ग लोक में (मोदते) प्रसन्न रहता है ||12||

(मृत्यु) हे मृत्यु ! (सः, त्वम) सो तू (स्वर्ग्य‌म्) स्वर्ग के साधन (अग्निम्) अग्नि को (अध्येषि) जानता है (तम्) उसे (श्रद्दधानाय) श्रद्धा रखने वाले (मह्म्) मेरे लिए (प्रब्रूहि) वर्णन कर (स्वर्गलोकाः) स्वर्ग प्राप्त पुरुष (अमृतत्वम्) अमृत्व को (भजन्ते) सेवा करते हैं (एतद्) यह (द्वितीयेन) दूसरे (वरेण) वर से (वृणे) माँगता हूँ ||13||

(नचिकेतः) हे नचिकेता ! (स्वर्ग्यम्) स्वर्ग प्राप्ति के साधन (अग्निम्) अग्नि को (प्रजानन्) जानता हुआ (ते) तेरे लिए (तत्) उसको (प्रब्रवीमि) कहता हूँ (मे, निबोध) मेरे वचन को सुन और जान (अथ) और (त्वम्) तू (एनम्) इस (अग्नि) को (अनन्त) विविध (लोकाप्तिम्) लोकों (योनियों) को प्राप्त कराने वाला (प्रतिष्ठाम्) जगत की स्थिति का हेतु (गृहायाम्) ह्रदयाकाश में (निहितम्) स्थित (विद्धि) जान ||14||

(तस्मै) नचिकेता के लिए (लोकादिम्) सृष्‍टि के भी गया और आदि में उत्पन्न (तम्, अग्निम्) उस अग्नि को (उवाच) बतलाया (याः) जो (वा) या (यावतीः) जितनी (वा यथा) या जिस प्रकार से (इष्‍टकाः) ईंटें चिननी चाहियें (च) और (स) उस नचिकेता ने (अपि) भी (यथा) जिस प्रकार मृत्यु ने (उक्तम्) बतलाया या (तत्) उसको (प्रति अवदत्) कहकर सुनाया (अथ) तब (अस्य) इस (नचिकेता) के ऊपर (तुष्‍टः सन्) प्रसन्न होता हुआ (पुनः एव) फिर भी मृत्यु (आह) बोला ||15||

(महात्मा) मृत्यु (प्रीयमाणः) प्रसन्न होकर (तम्) उस नचिकेता से (अब्रवीत्) बोला (भूयः) और भी (इह) इस (दूसरे वर के प्रसंग) में (तव) तेरे लिए (अद्य) अब (वरम्) वर (ददामि) देता हूँ (अयम्) यह (अग्निः) अग्नि (तव) तेरे (एव) ही (नाम्ना) नाम से (भविता) प्रसिद्ध होगा (च) और (इमाम्) तू इस (अनेक रूपाम्) अनेक रूप वाली (सृङ्काम्) माला को (गृहाण) ग्रहण कर ||16||

(त्रिणाचिकेतः) तीन बार (जिस अग्नि का उपदेश नचिकेता को किया गया और जो उसके नाम से प्रसिद्ध हुआ) उस नाचिकेतन अग्नि का चयन करने वाला (त्रिभिः) तीन से (सन्धिम्) मेल को (एत्य) प्राप्त होकर (त्रिकर्मकृत्) तीन कर्म करने वाला (जन्म मृत्यु) जन्म और मरण के (तरति) पार हो जाता है (ब्रह्मयज्ञम्) वेद के उत्पन्न करने वाले (ईड्‍यम्) स्तुति के योग्य (देवम्) ईश्‍वर को (विदित्वा) जान (निचाथ्य) और निश्‍चय करके (अत्यन्तम्) अत्यन्त (शान्तिम्) शान्ति को (एति) प्राप्त होता है ||17||

(यः) जो (विद्वान) विद्वान (त्रिणाचिकेतः) तीन बार अग्नि का चयन करने वाला (एतत्) इस (त्रयम्) त्रित्व को (विदित्वा) जानकर (एवम्) इस प्रकार (नाचिकेतम्) नाचिकेत अग्नि को (चिनुते) चयन करता है (सः) वह (मृत्युपाशान्) मृत्यु की बेड़ियों को (पुरुतः) आगे (प्रणोध) काटकर (शोकातिगः) शोक से रहित होकर (स्वर्गलोके) स्वर्ग लोक में (मोदते) आनन्द करता है ||18||

व्याख्या - नचिकेता ने स्वर्ग के साधन रूप अग्नि को दूसरे वर से जानने की इच्छा प्रकट की और यम ने उसको उस अग्नि का यथोचित उपदेश किया | वह स्वर्ग क्या था और उसकी प्राप्ति का साधन रूप वह अग्नि क्या थी ? सकामता के साथ यज्ञादि करने से जिस स्वर्ग की प्राप्ति का विधान ब्राह्मण तथा उपनिषद ग्रन्थों में किया गया स्पष्‍ट है कि उस स्वर्ग के सम्बन्ध में न तो नचिकेता ने प्रश्न किया था और न यमाचार्य ने उस स्वर्ग की प्राप्ति के साधन ही नचिकेता को बतलाये थे | नचिकेता के स्वर्ग में अभिलषित स्वर्ग के विशेषण दिये हैं वे ये हैं कि वहाँ जरा (बुढ़ापा आदि) और मृत्यु नहीं हैं और न भूख प्यास का वहाँ कष्‍ट भोगना पड़ता है | वहाँ निर्भीक्‍ता के साथ सुखोपभोग करते हुए स्वर्गवासी अमरता का सेवन करते हैं | यम ने स्वर्ग की साधनभूत जिस अग्नि का विधान किया है, उसको उसने अनेक लोकों (योनियों) को प्राप्त कराने वाला, जगत् की स्थिति का कारण और ह्रदयाकाश में स्थित बतलाया है | ये प्रश्नोत्तर स्पष्‍ट रीति से प्रकट करते हैं कि कि नचिकेता ने ब्रह्मलोक (मोक्ष) प्राप्ति का साधन पूछा था और यम ने ईश्‍वर प्राप्ति का साधन उसको बतलाया है | वह स्वर्ग जो सकाम कर्म यज्ञादि से प्राप्त हुआ करता है वह मनुष्यों में सर्वश्रेष्‍ठ (देवयोनि) में पैदा होने से बढ़कर और कुछ नहीं, अवश्य वह देवयोनि दुःखों से रहित और उत्कृष्‍टतम साँसारिक सुखों से पूर्ण होती है | इसलिए शतपथ ब्राह्मण में कहा गया है कि "सकामजन्म स्वर्ग" में मनुष्य स्थूल शरीर के साथ उत्पन्न हुआ करता है :-

"स ह सर्वतनूरेव यजमानोSमुष्मिल्लोके सम्भवति ||"
(शतपथ ब्राह्मण 4|6|1|1|)

साफ जाहिर है कि स्थूल शरीर के साथ उत्पन्न होकर जरा मृत्यु भूख प्यासादि से छुटकारा पा लेना सम्भव नहीं है | जो स्वर्ग प्रश्नोत्तर में पूछा और बतलाया गया है उसकी प्राप्ति का मुख्य साधन ईश्‍वर प्राप्ति ही है | हाँ, गौण साधन उसकी प्राप्ति का भौतिक अग्नि भी हो सकता है और इसलिए यम ने ईंटों से यज्ञकुण्ड बनाने की पूर्ण विधि भी, ईश्‍वर प्राप्ति के साधन = निश्‍चयात्मक ज्ञान प्राप्ति के अतिरिक्त, नचिकेता को बतलाई थी | यज्ञ मोक्ष की प्राप्ति का गौण साधन अवश्य हो सकता है और वह इस प्रकार कि उसे सकामता दूर करके पूर्ण निष्‍कामता के साथ किया जाय | निष्‍काम कर्म के मोक्ष का साधन होने में किसी को सन्देह हो ही नहीं सकता | उपनिषद के अन्त में कहे हुये शब्द कि "मृत्यु के बन्धन से मुक्त हो , और शोक रहित होकर प्राणी स्वर्गलोक में आनन्द प्राप्त करता है " स्पष्‍ट रीति से स्वर्गलोक का अभिप्राय ब्रह्मलोक प्रकट करते हैं |

(कमशः)