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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

वेदो में विज्ञान व शिल्पविद्या के रहस्य (21)

गायन्ति त्वा गायत्रिणोSर्चन्त्यर्कमर्किणः |
ब्रह्माणस्त्वा शतक्रत उद्वंशमिव येमिरे ||1||
ऋग्वेद 1|10|1||

पदार्थ -

हे, शतक्रतो............हे असंख्यात कर्म और उत्तम ज्ञानयुक्‍त परमेश्‍वर !
ब्रह्माणः................जैसे वेदों को पढ़कर उत्तम उत्तम क्रिया करनेवाले मनुष्य श्रेष्‍ठ उपदेश, गुण और अच्छी शिक्षाओं से
वंशम्..................अपने वंश को
उद्येमिरे................प्रशस्त गुणयुक्‍त करके उद्यमवान् करते हैं, वैसे ही
गायत्रिणः..............जिन्हों के गायत्र अर्थात् प्रशंसा करने योग्य छन्द राग आदि पढ़े हुये धार्मिक और ईश्‍वर की उपासना करने वाले हैं, वे पुरुष
त्वा....................आपकी
गायन्ति..............सामवेदादि के गानों से प्रशंसा करते हैं, तथा
अर्किणः...............अर्क अर्थात् जो कि वेद के मन्त्र पढ़ने के नित्य अभ्यासी हैं, वे
अर्कम्.................सब मनुष्यों को पूजने योग्य
त्वः....................आपका
अर्चन्ति...............नित्य पूजन करते हैं ||1||

भावार्थ -

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है, जैसे सब मनुष्यों को परमेश्‍वर ही की पूजा करनी चाहिये, अर्थात उसकी आज्ञा के अनुकूल वेदविद्या को पढ़कर अच्छे अच्छे गुणों के साथ अपने और अन्यों के वंश को भी पुरुषार्थी करते हैं, वैसे ही अपने आप को भी होना चाहिये | और जो परमेश्‍वर के बजाय दूसरे का पूजन करनेवाला पुरुष है, वह कभी उत्तम फल को प्राप्त करने योग्य नहीं हो सकता, क्योंकि न तो ईश्‍वर की ऐसी आज्ञा ही है, और न ईश्‍वर के समान कोई दूसरा पदार्थ है जिसका उसके स्थान में पूजन किया जावे | इससे सब मनुष्यों को उचित है कि परमेश्‍वर ही का गान और पूजन करे ||1||

यत्सानोः सानुमारुहद्भर्य्यस्पष्ट कर्त्त्व‌म् |
तदिन्द्रों अर्थं चेतति यूथेन वृष्णिरेजति ||2||
ऋग्वेद 1|10|2||

पदार्थ ‍ -

जैसे, यूथेन.............जैसे वायुगण अथवा सुख के साधन हेतु पदार्थों के साथ
वृष्णिः ..................वर्षा करनेवाला सूर्य्य अपने प्रकाश करके
सानोः....................पर्वत के एक शिखर से
सानुम्...................दूसरे शिखर को
भूरि.....................बहुधा
आरुहत्.................प्राप्त होता
अस्पष्‍ट.................स्पर्श करता हुआ
एजति...................क्रम से अपनी कक्षा में घूमता और घुमाता है, वैसे ही जो मनुष्य क्रम से एक कर्म को सिद्ध करके दूसरे को
कर्त्वम्..................करने को
भूरि....................,बहुधा
आरुहत्.................आरम्भ तथा
अस्पष्‍ट.................स्पर्श करता हुआ
एजति...................प्राप्त होता है, उस पुरुष के लिये
इन्द्रः....................सर्वज्ञ ईश्‍वर उन कर्मों के करने को
सानोः...................अनुक्रम से
अर्यम्...................प्रयोजन के विभाग के साथ
भूरि.....................अच्छी प्रकार
चेतति...................प्रकाश करता है ||2||

भावार्थ -

इस मन्त्र में भी 'इव' शब्द की अनुवृत्ति से उपमालङ्कार समझना चाहिये | जैसे सूर्य्य अपने सम्मुख के पदार्थों को वायु के साथ वारंवार क्रम से अच्छी प्रकार आक्रमण आकर्षण और प्रकाश करके सब पृथिवीलोकों को घुमाता है, वैसे ही जो मनुष्य विद्या से करने योग्य अनेक कर्मों को सिद्ध करने के लिये प्रवृत्त होता है, वही अनेक क्रियाओं से सब कार्य्यों के करने में समर्थ हो सकता तथा ईश्‍वर की सृष्‍टि में अनेक सुखों को प्राप्त होता, और उसी मनुष्य को ईश्‍वर भी अपनी कृपादृष्‍टि से देखता है, आलसी को नहीं ||2||

युक्ष्वा हि केशिना हरी वृषणा कक्ष्यप्रा |
अथा न इन्द्र सोमपा गिरामुपश्रुतिं चर ||3||
ऋग्वेद 1|10|3||

पदार्थ -

हे, सोमपाः...........उत्तम पदार्थों के रक्षक
इन्द्र...................सब में व्याप्त होने वाले ईश्‍वर ! जैसे आपका रचा हुआ सूर्य्यलोक जो अपने
केशिना................प्रकाशयुक्‍त बल और आकर्षण अर्थात् पदार्थों को खीचने का सामर्थ्य जो कि
वृषणा.................वर्षा के हेतु और
कक्ष्यप्रा...............अपनी अपनी कक्षाओं में उत्पन्न हुए पदार्थों को पूरण करने अथवा
हरी....................हरण और व्याप्‍ति स्वभाववाले घोड़ों के समान और आकर्षण गुण है, उनको अपने कार्यों में जोड़ता है, वैसे ही आप
नः......................हम लोगों को भी सब विद्या के प्रकाश के लिए उन विद्याओं में
युङ्‍क्ष्व.................युक्त‌ कीजिए |
अथ....................इसके अनन्तर आपकी स्तुति में प्रवृत्त जो
नः......................हमारी
गिराम्.................वाणी हैं, उनका
उपश्रुतिम्..............श्रवण
चर....................स्वीकार व प्राप्त कीजिये ||3||

भावार्थ ‍-

इस मन्त्र में लुप्‍तोपमालङ्कार है | सब मनुष्यों को सब विद्या पढ़ने के पीछे उत्तम क्रियाओं की कुशलता में प्रवृत्त होना चाहिये | जैसे सूर्य्य का उत्तम प्रकाश संसार में वर्त्तमान है, वैसे ही ईश्‍वर के गुण और विद्या के प्रकाश का सब में उपयोग करना चाहिये ||3||

(महर्षि दयानन्द सरस्वती के ऋग्वेदभाष्य पर आधारित एवं संक्षेप में उद्दृत्)
THE SECRETS OF SCIENCE & TECHNOLOGY IN VEDAS (21)
(Based on & Reproduced from Maharshi Dayanand Saraswati's RIGVED BHASHYA)