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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

पञ्च कोश

ओउम् | केष्‍वन्तः पुरुष आ विवेश कान्यन्तः पुरुषे अर्पितानि |
एतद् ब्रह्मन्नुप वल्हामसि त्वा किँ स्विन्नः प्रति वोचास्यत्र ||

ओउम् | पञ्चस्वन्तः पुरुषSआ विवेश तान्यतः पुरुषे अर्पितानि |
एतत्त्वात्र प्रतिमन्वानोSअस्मि न मायया भवस्युत्तरो मत् ||
यजुर्वेद 23|51,52

शब्दार्थ -

प्रश्न -

केषु+अन्तः........किनमें
पुरुषः..............पुरुष
आविवेश..........आविष्‍ट है, समाया है ? और
कानि..............कौन
पुरुषे+अन्तः.......पुरुष में या पुरुष के लिए
अर्पितानि..........अर्पित हैं |
ब्रह्मऩ्..............हे ब्रह्मन् ! चतुर्वेदवित् अथवा साक्षात् ब्रह्म !
एतत्..............यह
त्वा................तुझसे
उप................समीप आकर
वल्हामसि..........हम प्रश्न करते हैं |
अत्र................इस विषय में
नः.................हमें
किं+स्वित्..........क्या
प्रति+वोचासि.......प्रत्युत्तर देते हो, समाधान देते हो ?

उत्तर -

पञ्चसु+अन्तः.........पाँच में
पुरुषः...................पुरुष
आ+विवेश.............आविष्‍ट है |
तानि...................वही पाँच‌
पुरुषे+अन्तः...........पुरुष में या पुरुष के लिए
अर्पितानि...............अर्पित हैं |
त्वा....................तुझको
अत्र....................इस विषय में
एतत्..................यह
प्रतिमन्वानः+अस्मि..प्रत्युत्तर देता हूँ=समाधान देता हूँ |तू
मायया................बुद्धि के द्वारा
मत्...................मुझसे
उत्तरः..................उत्कृष्‍ट
न.....................नहीं
भवसि..................है |

व्याख्या -

पुरुष=जीव पाँच में आविष्‍ट हैं और पाँच पुरुष के अर्पित हैं | पाँच से यहां तात्पर्य्य पाँच कोश‌ हैं | जीवात्मा उनमें रहता हुआ उनसे पृथ‌क् है | वे पाँच कोश निम्नलिखित हैं - 1. अन्नमय कोश, 2. प्राणमय कोश, 3. मनोमय कोश, 4. विज्ञानमय कोश, तथा 5. आनन्दमय कोश | आचार्य इन कोशों का वर्णन इस प्रकार करते हैं -

1. पहला अन्नमय जो त्वचा से लेकर अस्थिपर्य्यन्त का समुदाय पृथिवीमय है |

2. दूसरा प्राणमय जिसमें निम्न पञ्चविध प्राण समाविष्‍ट हैं - 1. प्राण अर्थात् जो भीतर से बाहर आता है; 2. अपान‌ जो बाहर से भीतर जाता है; 3. समान‌ जो नाभिस्थ होकर शरीर में सर्वत्र रस पहुँचाता है; 4. उदान‌ जिससे कण्‍ठस्थ अन्नपान खींचा जाता है और बल पराक्रम होता है; 5. व्यान‌ जिससे सब शरीर में चेष्‍टादि कर्म जीव करता है |

3. तीसरा मनोमय‌ जिसमें मन के साथ अहंकार, वाक्, पाद्, पाणि, पायु, और उपस्थ पाँच कर्म्मेन्द्रियाँ हैं |

4. चौथा विज्ञानमय‌ जिसमें बुद्धि, चित्त, श्रोत्र, त्वचा, नेत्र, जिह्वा और नासिका ये पाँच ज्ञान‍-इन्द्रियाँ हैं जिनसे जीव ज्ञानादि व्यवहार करता है |

5. पाँचवाँ आनन्दमय कोश‌ जिसमें प्रीति, प्रसन्नता, न्यून आनन्द्, अधिक आनन्द और आनन्द का आधार कारणरूप प्रकृति हैं | ये पाँच कोश कहाते हैं, इन्हीं से जीव सब प्रकार के कर्म्म, उपासना और ज्ञानादि व्यवहारों को करता है |
(सत्यार्थप्रकाश, नवम् समुल्लास)

इस सन्दर्भ में स्पष्‍ट सिद्ध है कि जीवात्मा इन सबसे पृथक् है, और मानो इनके अन्दर छिपा हुआ है | इन कोशों को = पर्दों को दूर करो, तो आत्मा का दर्शन सुलभ हो जाता है | ये पाँच कोश स्थूल और कारणशरीर से भिन्न हैं | कोई-कोई यहाँ पाँच से पाँच प्राण लेते हैं, जैसा कि मुडकोपनिषद् में लिखा है -

एषोSणुरात्मा चेतसा वेदितव्यो यस्मिन् प्राणः पञ्चधा संविवेश |
प्राणैश्‍चित्तं सर्वमोतं प्रजानां यस्मिन् विशुद्धे विभवत्येष आत्मा || - 3|1|6

पूर्वोक्त जीवात्मा चित्त से = चिन्तन से जाना जा सकता है | इसमें प्राण‌ प्राण, अपान, समान, व्यान और उदान भेदों से संविष्‍ट हुआ है | सब प्राणियों का चित्त प्राणों से ओतप्रोत है, जिसके शुद्ध होने पर यह आत्मा विभूतियों वाला हो जाता है |

उपनिषद् के इस भाव का वेद में भी वर्णन किया गया है -

पञ्च नद्यः सरस्वतीमपि यन्ति सस्रोतसः
सरस्वती तु पञ्चधा सो देशेSभवत्सरित् || यजु. 34|11

स्रोतोंसहित पाँच नदियाँ = इन्द्रियाँ, सरस्वती=ज्ञानस्वरूप आत्मा को प्राप्त हो रही हैं और वह सरस्वती=आत्मा भी शरीररूप देश में पाँच प्रकार की सरित्=गतिवाला हो गया है | पाँच इन्द्रियाँ बाहर से लाकर आत्मा को ज्ञान देती हैं, और आत्मा सब शरीर में इन्द्रियों द्वारा अपना प्रकाश करता है

यही पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ जब पुरुष के वश में आ जाती हैं तब मोक्ष प्राप्त हो जाता है, जैसा कि कठोपनिषद् में कहा है -

यदा पञ्चावतिष्‍ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह |
बुद्धिश्‍च न विचेष्‍टते तामाहुः परमां गतिम् - 2|6|10

जब मनसहित पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ अपने व्यापार से विरत हो जाती हैं और बुद्धि भी चेष्‍टा नहीं करती, उसे परमगति कहते हैं |

स्वामी वेदानन्द तीर्थ सरस्वती
(स्वाध्याय-सन्दोह से साभार)