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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

अथ वेदविषयविचारः (9)

(गतांक से आगे) -

(देवो दाना.) दान देने से देव नाम पड़ता है और दान कहते हैं अपनी चीज दूसरे के अर्थ दे देना | दीपन कहते हैं प्रकाश करने को, द्योतन कहते हैं सत्योपदेश को, इनमें से दान का दाता मुख्य एक ईश्वर ही है कि जिसने जगत् को सब पदार्थ दे रक्खे हैं, तथा विद्वान मनुष्य भी विद्यादि पदार्थों के देने वाले होने से देव कहाते हैं | (दीपन) अर्थात् सब मूर्तिमान द्रव्यों का प्रकाश करने से सूर्य्यादि लोकों का नाम भी देव है | तथा माता, पिता, आचार्य्य और अतिथि भी पालन, विद्या और सत्योपदेश के करने से देव कहाते हैं | वैसे ही सूर्य्यादि लोकों का भी जो प्रकाश करने वाला है, सो ही ईश्‍वर सब मनुष्यों को उपासना करने के योग्य इष्‍टदेव है, अन्य कोई नहीं | इसमें कठोपनिषद् का भी प्रमाण है कि -

सूर्य, चन्द्रमा, तारे, बिजुली और अग्नि ये सब परमेश्वर में प्रकाश नहीं कर सकते, किन्तु इन सबका प्रकाश करने वाला एक वही है क्योंकि परमेश्वर के प्रकाश से ही सूर्य्य आदि सब जगत् प्रकाशित हो रहा है | इसमें यह जानना चाहिये कि ईश्वर से भिन्न कोई पदार्थ स्वतन्त्र प्रकाश करने वाला नहीं है, इससे एक परमेश्वर ही मुख्य देव है |

(नैनद्देवा.) इस वचन में देव शब्द से इन्द्रियों का ग्रहण होता है | जो कि क्षोत्र, त्वचा, नेत्र, जीभ, नाक और मन, यह छैः देव कहाते हैं | क्योंकि श‌ब्द, स्पर्ष, रूप, रस, गन्ध, सत्य‌ और असत्य इत्यादि अर्थों का इनसे प्रकाश होता है | और देव शब्द से स्वार्थ में 'तल्' प्रत्यय करने से देवता शब्द सिद्ध होता है | जो जो गुण जिस जिस पदार्थ में ईश्वर नें रचे हैं, उन उन गुणों का लेख, उपदेश, श्रवण और विज्ञान करना तथा मनुष्य सृष्‍टि के गुण दोषों का भी लेख आदि करना इसको स्तुति कहते हैं | क्योंकि जितना जितना जिस जिस में गुण है उतना उतना उसमें देवपन है | इससे वे किसी के इष्‍ट‌देव नहीं हो सकते | जैसे किसी ने किसी से कहा कि यह तलवार काट करने में बहुत अच्छी और निर्मल है, इसकी धार बहुत तेज है, और यह धनुष के समान नमाने से भी नहीं टूटती, इत्यादि तलवार के गुण कथन को स्तुति कहते हैं |

इसी प्रकार सर्वत्र जान लेना | इस नियम के साथ कि केवल परमेश्वर ही कर्म उपासना और ज्ञानकाण्ड में सबका इष्‍टदेव स्तुति, प्रार्थना, पूजा और उपासना करने के योग्य है | क्योंकि गुण वे कहाते हैं, जिनसे कर्मकाण्डादि में उपकार लेना होता है | परन्तु सर्वत्र कर्मकाण्ड में भी इष्‍टभोग प्राप्ति के लिये परमेश्वर का त्याग नहीं होता, क्योंकि कार्य्य कारण सम्बन्ध से ईश्वर ही सर्वत्र स्तुति, प्रार्थना, उपासना से पूजा करने के योग्य होता है |

इसमें निरुक्‍त का भी प्रमाण है कि व्यवहार के देवताओं की उपासना कभी नहीं करनी चहिए, किन्तु एक परमेश्वर ही की करनी उचित है | इसका निश्चय वेदों में अनेक‌ प्रकार से किया गया है कि एक अद्वितीय परमेश्वर के ही प्रकाश, धारण उत्पादन करने से वे सब व्यवहार के देव प्रकाशित हो रहे हैं | इनका जन्म, कर्म और ईश्वर के सामर्थ्य से होता है और इनका रथ जो रमण स्थान, अश्वा अर्थात् शीघ्र सुख प्राप्ति का कारण, आयुध अर्थात् सब शत्रुओं के नाश करने का हेतु और इषु अर्थात् जो वाण के समान सब दुष्टगुणों के छेदन करने वाला शस्त्र है, सो एक परमेश्वर ही है | क्योंकि परमेश्वर ने जिस जिस में जितना दिव्य‌गुण रक्खा है उतना उतना ही उन द्रव्यों में देवपन है, अधिक नहीं | इससे क्या सिद्ध हुआ कि केवल परमेश्वर ही उन सबका उत्पादन, धारण और मुक्‍ति का देने वाला है |




(क्रमशः)

(महर्षि दयानन्द कृत ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका से संक्षिप्त में उद्धृत)