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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

'राष्ट्र संध्या'

दिल्ली के एक संन्यासी श्री परमहंस स्वामी अनंत भारती जी (म. म. ब्रहममित्र अवस्थी) ने 'राष्ट्र संध्या' नाम की एक हिन्दी पुस्तक अभी अभी लिखकर प्रकाशित की है.

उसमें वैदिक संध्या के सभी मंत्रों के राष्ट्रीय भावनापरक अर्थ किए गए हैं. और यह सिद्ध करने का व्यर्थ प्रयास किया है की स्वामी दयानन्द का अभिप्राय संध्या के माध्यम से लोगों को राष्ट्रीय जीवन का संदेश देना था, ईश्वर प्राप्ति प्रयोजन नहीं था.

लेखक के ऐसे कल्पना आधारित प्रयास को प्रशंस‌‌नीय नहीं कहा जा सकता.

- भावेश मेरजा

श्री भावेश

श्री भावेश जी
नमस्ते
ईश्‍वर प्राप्ति ही सन्ध्या का मुख्य प्रयोजन है, इसमे तो किसी को सन्देह नहीं होना चाहिए | हां उसी के अन्तर्गत् स्वास्थ्य, विवेक, आचार विचार, उत्साह आदि की शुद्धि एवं वृद्धि हेतु मानसिक, बौद्धिक व आत्मिक विकास आदि अनकानेक‌ गुणों की उपलब्धी भी उसी सन्ध्या के फलस्वरूप मिलते हैं, अतः इनमें से किसी को भी प्राप्त करने हेतु सन्ध्या का सहारा लिया जा सकता है, लेकिन मुख्य उद्देष्य ही को यदि गौण कर दिया जाय तो , फिर तो शायद केवल बाहरी आवरण ही उपलब्ध हो सकेगा | उपरोक्त पुस्तक में क्या लिखा है उसका यदि आप कुछ् दिग्दर्शन कराते तो समझ पाना आसान होता |
आनन्द‌

Bhaveshji , how do you

Bhaveshji , how do you relate this shloka with sandhyavandan ?
Yaanishaa sarvabhootaanaam tasyaam jaagarti samyamee;
Yasyaam jaagrati bhootaani saa nishaa pashyato muneh.
That which is night to all beings, then the self-controlled man is awake; when all beings
are awake, that is night for the sage who sees.

Only after that, I shall like to comment on your views .

The issue is of Vedic

The issue is of Vedic Sandhya as presented by Swami Dayananda.

The quoted shloka is not part of the Vedic Sandhya.

Sandhya is mainly meant for meditation & worship of God. Swami Dayananda himself has given explanation of the Sandhya mantras in that way.

= Bhavesh