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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

महात्मा नारायण स्वामी जी की कठोपनिषद्' पर टीका - प्रथमा वल्ली(5)

(गतांक से आगे)

एष तेSग्निर्नचिकेतः स्वर्ग्यो, यमवृणीथा द्वितीयेने वरेण |

एतमग्निं तवैव प्रवक्ष्यन्ति जनास, स्तृतीयं वरं नचिकेतो वृणीष्‍व ||19||

येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्ये, Sस्तीत्येके नायमस्तीति चैके |

एतद्विद्यामनुशिष्‍टस्त्वयाहं, वराणामेष वरस्तृतीयः ||20||

देवैरत्रापि विचिकित्सितं पुरा, न हि सुविज्ञेयमणुरेष धर्मः |

अन्यं वरं नचिकेतो वृणीष्‍व, मा मोपरोत्सीरति मा सृजैनम् ||21||

देवैरत्रापि विचिकित्सितं किल, त्वञ्च मृत्यो यन्न सुविज्ञेयमात्थ |
वक्ता चास्य त्वादृगन्यो न लभ्यो, नान्यो वरस्तुल्य एतस्य कश्‍चित् ||22||

शतायुषः पुत्रपौत्रान् वृणीष्‍व, बहून् पशून हस्तिहिरण्यमश्‍वान् |
भूभेर्महदायतनं वृणीष्‍व, स्वयं च जीव शरदो यावदिच्छसि ||23||

एतत्तुल्यं यदि मन्यसे वरं, वृणीष्‍व वितं चिरजीविकाञ्च |
महाभूमौ नचिकेतस्वमेधि, कामनां त्वा कामभाजं करोमि ||24||

ये ये कामा दुर्लभा मर्त्यलोके, सर्वान् कामाँश्छन्दतः प्रार्थयस्व |
इमा रामाः सरथाः सतूर्या, नहीदृशा लम्मनीया मनुत्ष्यैः |
आभिर्मत्प्रत्ताभिः परिचारयस्व, नचिकेतो मरणं भानुप्राक्षीः ||25||

अर्थ -

(नचिकेतः) हे नचिकेता (एषः) यह अग्नि (स्वर्ग्यः) स्वर्ग का साधन (ते) तेरे लिए कहा गया (यम्) जिसको (द्वितीयेन) दूसरे (वरेण) वर से (अवृणीथाः) तूने मांगा था (एतम्) इस (अग्निम्) अग्नि को (जनासः) मनुष्य (तव, एव) तेरे ही नाम से (प्रवक्ष्यन्ति) कहेंगे (नचिकेतः) हे नचिकेता ! (तृतीयम्) तीसरा (वरं) वर (वृणीष्‍व) मांग ||19||

(मनुष्ये) मनुष्य के (प्रेते) मरने पर (अयम्) यह आत्मा (अस्ति) बाकी रहता है (इति) ऐसा (एके) कुछ लोग (च) और (न) नहीं (अस्ति) रहता (इति) ऐसा भी (एके) कुछ लोग मानते हैं (या) जो (इयम्) यह (विचिकित्सा) सन्देह है (त्वया) आपसे (अनुशिष्‍टः) उपदेश किया हुआ (अहम्) मैं (एतत्) इसको (विद्याम्) जानूँ (वराणाम्) वरों में (एषः) यह (तृतीयः) तीसरा (वरः) वर है ||20||

(पुरा) पहले (अत्र) इसमें (देवेः) विद्वानों ने (अपि) भी (विचिकित्सितम्) सन्देह किया था (हि) निश्‍चय (एषः) यह (धर्मः) विषय (अणुः) सूक्ष्म होने से (सुविज्ञेयम्, न) सुगमता से जानने योग्य नहीं है [नचिकेतः] इसलिए हे नचिकेता [अन्यम्] कोई और (वरम्) वर (वृणीष्‍व) माँग (मा) मुझको (मा) मत (उपरोत्सीः) ऋणी के तुल्य दबा (एनम्) इस वर को (अतिसृज) छोड़ दे ||21||

[मृत्यो] हे मृत्यु ! [अत्र] इस विषय में [देवेः] देवों ने [अपि] भी [विचिकित्सितम्] सन्देह किया था [त्वम् च किल] और तू भी [यत्] जो [सुविज्ञेयं न] सुगमता से जानने के योग्य नहीं है ऐसा [आत्थं] कहता है परन्तु [अस्य] इस विषय का [वक्‍ता] उपदेश करने वाला [त्वा दृग] तेरे तुल्य [अन्यः] और [न लभ्यः] नहीं मिल सकता [च] और [एतस्य] इस वर के [तुल्यः] सदृश [अन्यः] और [कश्‍चित्] कोई [वरः न] वर नहीं है ||22||

(शतायुषः) 100 वर्ष जीने वाले (पुत्र-पौत्रात्) पुत्र और पौत्रों को (वृणीष्व) माँग (बहून्) बहुत (पशून्) पशु, (अश्‍वान्) घोड़े, (हस्ति) हाथी, (हिरण्यम्) सुवर्ण, (भूमेः) पृथ्वी के (महत्) बड़े (आयतनम्) माण्डलिक राज्य को (वृणीष्‍व) माँग (स्वयं च) और तू स्वयं (यावत्) जितने (शरदः) वर्ष (इच्छसि) इच्छा करता है (जीव) जीवित रह ||23||

(यदि) जो (एतत्) इस (वरम्) वर के (तुल्यम्) तुल्य तू (मन्यसे) मानता है तो (वित्तम्) धन और (चिरजीविका को) (वृणीष्‍व) माँग | (नचिकेतः) हे नचिकेता ! (त्वम्) तू (महाभूमौ) इस महान् पृथ्वी पर (एधि) बढ़ने वाला हो (त्वा) तुझको (कामानाम्) कामनाओं का (कामभाजम्) भोग करने वाला (करोमि) करता हूँ ||24||

(मर्त्यलोके) संसार में (ये, ये कामाः) जो जो कामनायें (दुर्लभाः) दुर्लभ हैं (सर्वान्) उन सब (कामान्) कामनाओं को (छन्दतः) यथेष्‍ट (प्रार्थस्व) मांग (इमाः) ये (सरथाः) रथों, सहित (सतूर्याः) बाजों के साथ (राभाः) रमणीय स्त्रियाँ हैं (आभिः) इन (मत्प्रत्ताभि,) मेरी दी हुई (स्त्रियों) से (परिचारयस्व) अपनी सेवा कर | (हि) निश्‍चय) (ईदृशाः) ऐसी (मनुष्येः) साधारण मनुष्यों से (न लम्भनीयाः) प्राप्त होने योग्य नहीं है | हे नचिकेता ! (मरणम्) मौत को (मा) मत (अनु प्राक्षीः) पूछ ||25||

(कमशः)