Skip navigation.
कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

महात्मा नारायण स्वामी जी की कठोपनिषद्' पर टीका - प्रथमा वल्ली (6)

(गतांक से आगे)

व्याख्या -

नचिकेता का तीसरा प्रश्न आत्मा की अमरता से सम्बन्धित था | आस्तिक और नास्तिक संसार में सदा से रहते चले आये हैं | आस्तिक का सिद्धान्त है कि जीवात्मा अमर है और शरीर नष्‍ट होने के साथ वह नष्‍ट नहीं होता किन्तु आवागमन के द्वारा एक को छोड़कर दूसरी योनियों में आया जाया करता है | परन्तु नास्तिकवाद यह है कि शरीर के मेल का परिणाम आत्मोपत्ति है और इसलिए शरीर के नष्‍ट होने के साथ वह भी नष्‍ट हो जाता है | नचिकेता एक नवयुवक ब्रह्मचारी था | इस प्रकार का सन्देह उसे हो जाना स्वाभाविक था और उसी सन्देह की निवृत्ति के लिए उसने यम से यह तीसरा प्रश्न किया था | यम ने पहले वरों की तरह इसका उत्तर न देकर क्यों नचिकेता को अनेक प्रकार के प्रलोभन देकर इस प्रश्न का उत्तर देने से अपने को बचाना चाहा

इसका कारण यह है कि प्राचीन पद्धति यह थी कि आत्म विद्या सम्बन्धी प्रश्नों के उत्तर केवल उन्हीं व्यक्तियों को दिये जाते थे जिनको आचार्य इस विद्या के जानने का पात्र समझा करते थे | नचिकेता इस विद्या को प्राप्‍त करने का अधिकारी है या नहीं, इसी के जानने के लिए, उसकी परीक्षा लेने के उद्देश्य ही से, इसी प्रकार के प्रलोभन उसे दिये गये थे और जब वह प्रलोभनों में न आकर परीक्षोतीर्ण हुआ तो यम ने उसे अपेक्षित शिक्षा दी | यम ने जो प्रलोभन नचिकेता को दिये थे उनमें उसने सौ वर्ष जीने वाले पुत्र-पौत्रों के देने की बात कही तथा मांडलिक राज्य देने का प्रलोभन भी उसे दिया था | यम के लिए किस प्रकार यह सम्भव था कि वह इन दिये गये प्रलोभनों की पूर्ति करता, यह सन्देह है जो उपनिषद् के पढ़ने वालों के ह्रदयों में प्रायः उठा करता है | इसका समाधान यह है :- (1) योग दर्शन में कहा गया है कि जो मनुष्य सत्य की सिद्धि कर लेता है उसकी वाणी में अमोधता आ जाती है अर्थात् ऐसी सिद्धि प्राप्त होती है वह जो कुछ भी कह देता है वह सत्य हो जाता है* | सम्भव है कि यम ऐसी ही सिद्धि प्राप्त योगी हो | दूसरी बात माण्डलिक राज्य देने के सम्बन्ध में यह कहा जा सकता है संभव है जनक और अजात शत्रु आदि की तरह आत्मज्ञानी होने के सिवाय यम समृद्धिशाली भी हो और ऐसी हालत में उसके लिए यह सर्वथा संभव था कि वह नचिकेता को अपने राज्य का कोई भाग दे डालता , यदि नचिकेता प्रलोभन में आ जाता | एक बात और भी इस सम्बन्ध में कही जाती है और वह यह कि यम ने दूसरे वर 'ईश्‍वर प्राप्ति' के सम्बन्ध में जो ब्रह्मविद्या का गहनतम प्रश्न है, नचिकेता को 'ननु-नुच' किये बिना ही उसका उत्तर दे दिया परन्तु जीवात्मा के वर्णन करने में इस प्रकार की परीक्षा लेना क्यों आवश्यक समझा इसका उत्तर यह है कि यम को दूसरे वर के सम्बन्ध में नचिकेता को स्थूल विवरण दे देनें के सिवाय‌ कुछ सूक्ष्म रहस्य उद्‍घाटित नहीं करने थे इसलिए कि वह उपनिषद् का मुख्य प्रश्न नहीं था | परन्तु तीसरा प्रश्न उपनिषद् का मुख्य प्रश्न है और इसमें यम को ब्रह्मविद्या का ह्रदय खोलकर नचिकेता के सम्मुख रखना था, इसलिए ऐसा करने से पूर्व उसने नचिकेता की परीक्षा ले लेनी आवश्यक समझी और इसीलिए उसने उसे तरह-तरह के प्रलोभन दिये |
............................................................................................................................

* योगदर्शन 2|36 और इसी सूत्र का व्यास भाष्य देखना चाहिए |

(कमशः