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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

महर्षि दयानन्द कृत आर्याभिविनयः से (48)

***ओउम्***

स्तुति विषय

देवा देवानामसि मित्रो अद्‍भुतो वसुर्व‌सूनामसि चारुरध्वरे |
शर्मन्त्स्याम तब सप्रथस्तमेSग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तब ||48||
ऋ. 1|6|32|13||

व्याख्यान - हे मनुस्यो ! वह परमात्मा कैसा है ? कि हम लोग उसकी स्तुति करें | हे अग्ने परमेश्‍वर ! आप "देवः, देवानामसि" देवों (परम विद्वानों) के भी देव (परम विद्वान्) हो, तथा उनको परमानन्द देने वाले हो, तथा "अद्‍भुतः" अत्यन्त आश्‍चर्यरूप मित्र सर्व सुखकारक सबके सखा हो, "वसु" पृथिव्यादि वसुओं के भी वास कराने वाले हो, तथा "अध्‍वरे" ज्ञानादि यज्ञ में "चारुः" अत्यन्त शोभायमान और शोभा को देने वाले हो | हे परमात्मन् ! "सप्रथस्तमे सख्ये, शर्मणि तव" आपके अतिविस्तीर्ण, आनन्दस्वरूप सखाओं के कर्म में, हम लोग स्थिर हों, जिससे हमको कभी दुःख न प्राप्त हो और आपके अनुग्रह से हम लोग परस्पर अप्रीतियुक्त कभी न हों ||48||

From MAHARSHI DAYANAND SARASWATI's 'ARYABHIVINAY'