User loginHindi typingRecent blog posts
AryasamajOnline |
हमको कैसा लगता होगा ?हमको कैसा लगता होगा, जब हम इस शरीर को छोड़कर, पूरे नंग-धड़ंग होकर बाहर निकल जाते हैं, अथवा निकाल दिये जाते हैं ? क्या ठंड़ लगती होगी, क्या गर्मी लगती होगी ? क्या अंधेरा लगता होगा या क्या चकाचोन्ध रोशनी नजर आती होगी ? क्या राह दिखती होगी अथवा गुमराह अनुभव करते होंगे ? क्या भय लगता होगा अथवा अभय होंगे ? क्या हम प्रसन्न होंगे अथवा दुखी ? क्या तृष्णाएँ सता रही होंगी अथवा सन्तुष्टी होगी ? क्या कोई साथी दिखाई दे रहा होगा अथवा अकेलापन खाए जा रहा होगा ? बहुत कठिन तो नहीं है कहना कि लगभग कैसा लगेगा हमें, क्योंकि अपने आप को तो हम खूब जानते हैं | हम कितने पानी में हैं | जो कहें कि हम तो निकलते ही नहीं, शरीर में ही रहते हैं तो उन पर तो तरस खाने का दिल करता है | मरना फिर शरीर का बदबू से सड़ांद से भरना, कीटाणुओं से इसका खाया जाना, गलना सड़ना, जाने क्या क्या ? मरने के पश्चात तो क्या, ऐसी दुर्दशा पहले होने पर तो, मरने से पूर्व भी इसे छोड़ जाने को जी चाहने लगता है, बस मुश्किल होती है तो साँस की जो आसानी से बाहर नहीं निकलती है और शरीर को न इधर का न उधर का रहने देती है | | अब छूट गया तन , स्वतन्त्र हो गए हम, खुली उड़ान सामने है, दुख के घेरे से बाहर आ गये, एक तूफान आया और चला गया अब तो हवा के झोंके हमें जहाँ ले जाएँ क्या फर्क पड़ता है ? अब हम स्वतन्त्र हैं इस शरीर की कैद से, क्या ऐसा नहीं लगता होगा ??? अथवा ऐसा नहीं लगना चाहिए ?
|