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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

वेदो में विज्ञान व शिल्पविद्या के रहस्य (22)

एहि स्तोमाँ अभि स्वराभि गृणीह्यारुव |
ब्रह्म च नो वसो सचेन्द्र यज्ञं च वर्ध्य ||4||
ऋग्वेद 1|10|4||

पदार्थ -

हे, (इन्द्र) स्तुति करने के योग्य परमेश्वर ! जैसे कोई सब विद्याओं से परिपूर्ण विद्वान् (स्तोमान्) आपकी स्तुतियों के अर्थों को (अभिस्वर) यथावत् स्वीकार करता कराता वा गाता है, वैसे ही (नः) हम लोगों को प्राप्त कीजिये | तथा हे (वसो) सब प्राणियों को वसाने वा उनमें वसने वाले ! कृपा से इस प्रकार प्राप्त होके (नः) हम लोगों के (स्तोमान्) वेदस्तुति के अर्थों को (सचा) विज्ञान और उत्तम कर्मों का संयोग कराके (अभिस्वर) अच्छी प्रकार उपदेश कीजिये (ब्रह्म च) और वेदार्थ को (अभिगृणीहि) प्रकाशित कीजिये | (यज्ञं च) हमारे लिये होम ज्ञान और शिल्पविद्यारूप क्रियाओं को (वर्धय) नित्य बढ़ाइये ||4||

भावार्थ -

इस मन्त्र में लुप्तोपमालङ्कार है | जो पुरुष वेदविद्या वा सत्य के संयोग से परमेश्वर की स्तुति प्रार्थना और उपासना करते हैं, उनके ह्रदय में ईश्वर अन्तर्यामी रूप से वेदमन्त्रों के अर्थों को यथावत् प्रकाश करके निरन्तर उनके लिये सुख का प्रकाश करता है, इससे उन पुरुषों में विद्या और पुरुषार्थ कभी नष्ट नहीं होते ||4||

उक्थमिन्द्राय शस्यं वर्धनं पुरुनिष्षिधे |
शक्रो यथा सुतेषु णो रारणत्सख्येषु च ||5||
ऋग्वेद 1|10|5||

पदार्थ -

(यथा) जैसे कोई मनुष्य अपने (सुतेषु) सन्तानों और (सख्येषु) मित्रों के (उपकार) करने को प्रवृत होके सुखी होता है, वैसे ही (शक्रः) सर्वशक्तिमान् जगदीश्वर (पुरुनिष्षिधे) पुष्कल शास्त्रों को पढ़ने पढ़ाने और धर्मयुक्त कामों में विचरने वाले (इन्द्राय) सब के मित्र और ऐश्वर्य की इच्छा करने वाले धार्मिक जीव के लिये (वर्धनम्) विद्या आदि गुणों के बढ़ानेवाले (शंस्यम्) प्रशंसा (च) और (उक्थम्) उपदेश करने योग्य वेदोक्त स्तोत्रों के अर्थों का (रारणत्) अच्छी प्रकार प्रकाश करके सुखी बना रहे ||5||

भावार्थ -

इस मन्त्र में उपमालङ्कार है | इस संसार में जो जो शोभायुक्त रचना प्रशंसा और धन्यवाद हैं, वे सब परमेश्वर ही की अनन्त शक्ति का प्रकाश करते हैं, क्योंकि जैसे सिद्ध किये हुए पदार्थों में प्रशंसायुक्त रचना के अनेक गुण उन पदार्थों के रचनावाले की ही प्रशंसा के हेतु हैं, वैसे ही परमेश्वर की प्रशंसा जानने वा प्रार्थना के लिये हैं | इस कारण जो जो पदार्थ हम ईश्वर से प्रार्थना के साथ चाहते है, सो सो हमारे अत्यन्त पुरुषार्थ के द्वारा ही प्राप्त होने योग्य हैं, केवल प्रार्थनामात्र से नहीं ||5||

तमित्सखित्व ईमहे तं राये तं सुवीर्य्ये |
स शत्र्क उत नः शकदिन्द्रो वसु दयमानः ||6||
ऋग्वेद 1|10|6||

पदार्थ -

जो (नः) हमारे लिये (वयमानः) सुखपूर्वक रमण करने योग्य विद्या, आरोग्यता और सुवर्णादि धन का देनेवाला, विद्यादि गुणों का प्रकाशक और निरन्तर रक्षक तथा दुःख दोष वा शत्रुओं के विनाश और अपने धार्मिक सज्जन भक्तों के ग्रहण करने (शक्रः) अनन्त सामर्थ्ययुक्त (इन्द्रः) दुःखों का विनाश करनेवाला परमेश्वर है, वही (वसु) विद्या और चक्रवर्ति राज्यादि परम धन देने को (शकत्) समर्थ है, (तमित्) उसी को हम लोग (उत्) वेदादि शास्त्र सब विद्वान् प्रत्यक्षादि प्रमाण और अपने भी निश्चय से (सखित्वे) मित्रों और अच्छे कर्मों के होने के निमित्त (तम्) उसको (राये) पूर्वोक्त विद्यादि धन के अर्थ और (तम्) उसी को (सुवीर्य्ये) श्रेष्ठ गुणों से युक्त उत्तम पराक्रम की प्राप्ति के लिये (ईमहे) याचते हैं ||6||

भावार्थ -

सब मनुष्यों को उचित है कि सब सुख और शुभ गुणों की प्राप्ति के लिये परमेश्वर ही की प्रार्थना करें, क्योंकि वह अद्वितीय सर्वमित्र परमैश्वर्य्यवाला अनन्त शक्तिमान् ही का उक्त पदार्थों के देने में सामर्थ्य है ||6||

सुविवृतं सुनिरजमिन्द्र त्वादातमिद्यशः |
गवामप व्रजं वृधि कृणुष्व राधो अद्रिवः ||7||
ऋग्वेद 1|10|7||

पदार्थ -

जैसे यह (अद्रिवः) उत्तम प्रकाशादि धनवाला (इन्द्रः) सूर्य्यलोक (सुनिरजम्) सुख से प्राप्त होने योग्य (त्वादातम्) उसी से सिद्ध होनेवाले (यशः) जल को (सुविवृतम्) अच्छी प्रकार विस्तार को प्राप्त (गवाम्) किरणों के (व्रजम्) समूह को संसार में प्रकाश होने के लिये (अपवृधि) फैलाता तथा (राधः) धन को प्रकाशित (कृणुष्व) करता है, वैसे हे (अद्रिवः) प्रशंसा करने योग्य (इन्द्र) महायशस्वी सब पदार्थों के यथायोग्य बांटनेवाले परमेश्वर ! आप हम लोगों के लिये (गवाम्) अपने विषय को प्राप्त होनेवाली मन आदि इन्द्रियों के ज्ञान और उत्तम उत्तम सुख देनेवाले पशुओं के (व्रजम्) समूह को (अपवृधि) प्राप्त करके उनके सुख के दरवाजे खोल तथा (सुविवृतम्) देश देशान्तर में प्रसिद्ध और (सुनिरजम्) सुख से करने और व्यवहारों में यथायोग्य प्रतीत होने योग्य (यशः) कीर्ति को बढ़ानेवाले अत्युत्तम (त्वादातम्) आपके ज्ञान से शुद्ध किया हुआ (राधः) जिससे कि अनेक सुख सिद्ध हों, ऐसे विद्या सुवर्णादि धन को हमारे लिये (कृणुष्व) कृपा करके प्राप्त कीजिये ||7||

भावार्थ -

इस मन्त्र में श्‍लेष और लुप्तोपमालङ्कार है | हे परमेश्वर ! जैसे आपने सूर्य्यादि जगत् को उत्पन्न करके अपना यश और संसार का सब सुख प्रसिद्ध किया है, वैसे ही आप की कृपा से हम लोग भी अपने मन आदि इन्द्रियों को शुद्धि के साथ विद्या और धर्म के प्रकाश से युक्त तथा सुखपूर्वक सिद्ध और अपनी कीर्ति, विद्याधन और चक्रवर्ति राज्य का प्रकाश करके सब मनुष्यों को निरन्तर आनन्दित और कीर्तिमान् करें ||7||

(महर्षि दयानन्द सरस्वती के ऋग्वेदभाष्य पर आधारित एवं संक्षेप में उद्दृत्)
THE SECRETS OF SCIENCE & TECHNOLOGY IN VEDAS (22)
(Based on & Reproduced from Maharshi Dayanand Saraswati's RIGVED BHASHYA)