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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

अथ वेदविषयविचारः (10)

..इसमें निरुक्‍त का भी प्रमाण है कि व्यवहार के देवताओं की उपासना कभी नहीं करनी चहिए, किन्तु एक परमेश्वर ही की करनी उचित है | इसका निश्चय वेदों में अनेक‌ प्रकार से किया गया है कि एक अद्वितीय परमेश्वर के ही प्रकाश, धारण उत्पादन करने से वे सब व्यवहार के देव प्रकाशित हो रहे हैं | इनका जन्म, कर्म और ईश्वर के सामर्थ्य से होता है और इनका रथ जो रमण स्थान, अश्वा अर्थात् शीघ्र सुख प्राप्ति का कारण, आयुध अर्थात् सब शत्रुओं के नाश करने का हेतु और इषु अर्थात् जो वाण के समान सब दुष्टगुणों के छेदन करने वाला शस्त्र है, सो एक परमेश्वर ही है | क्योंकि परमेश्वर ने जिस जिस में जितना दिव्य‌गुण रक्खा है उतना उतना ही उन द्रव्यों में देवपन है, अधिक नहीं | इससे क्या सिद्ध हुआ कि केवल परमेश्वर ही उन सबका उत्पादन, धारण और मुक्‍ति का देने वाला है |

(अब गतांक से आगे) -

अब आगे देवता विषय में तेतीस देवों का व्याख्यान लिखते हैं जैसा ब्राह्मणग्रन्थों में वेदमन्त्रों का व्याख्यान लिखा है | (त्रयस्त्रिंशत्.) अर्थात व्यवहार के ये (33)तेतीस‌ देवता हैं, (8)आठ‌ वसु, (11)ग्यारह‌ रुद्र, (12)बारह आदित्य, एक इन्द्र और एक प्रजापति |

उनमें से आठ वसु ये हैं - अग्नि, पृथिवी, वायु, अन्तरिक्ष, आदित्य, द्यौः, चन्द्रमा और नक्षत्र | इनका वसु नाम इस कारण से है कि सब पदार्थ इन्हीं में बसते हैं और ये ही सब के निवास करने के स्थान हैं |

(11)ग्यारह रुद्र ये कहाते हैं - जो शरीर में दश प्राण हैं, अर्थात् प्राण, अपान, व्यान, समान, उदान, नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त, धनञ्जय और ग्यारहवां जीवात्मा है | क्योंकि जब वे इस शरीर से निकल जाते हैं तब मरण होने से उसके सब सम्बन्धी लोग रोते हैं | वे निकलते हुए उनको रुलाते हैं, इससे इनका नाम रुद्र है |

इसी प्रकार आदित्य बारह महीनों को कहते हैं, क्योंकि वे सब पदार्थों का आदान अर्थात् सब की आयु को ग्रहण करते चले जाते हैं, इसी से इनका नाम आदित्य है |

ऐसे ही इन्द्र नाम बिजुली का है, क्योंकि वह उत्तम ऐश्‍वर्य की विद्या का मुख्य हेतु है और यज्ञ को प्रजापति इसलिये कहते हैं कि उससे वायु और वृष्टिजल की शुद्धि द्वारा प्रजा का पालन होता है | तथा पशुओं की यज्ञसंज्ञा होने का कारण यह है कि उनसे भी प्रजा का जीवन होता है | ये सब मिलके अपने अपने दिव्य गुणों से तेतीस देव कहाते हैं | और तीन देव - स्थान, नाम और जन्म को कहते हैं | दो देव - अन्न और प्राण को कहते हैं | अध्यर्ध‌देव अर्थात् जिससे सबका धारण और वृद्धि होती है, जो सूत्रात्मा वायु सब जगत् में भर रहा है, उसको अध्यर्धदेव कहते हैं |

प्र. - क्या ये चालीस देव भी सब मनुष्यों को उपासना के योग्य हैं ?

उ. - इनमें से कोई भी उपासना के योग्य नहीं है, किन्तु व्यवहारमात्र की सिद्धि के लिये ये सब देव हैं, और सब मनुष्यों के उपासना के योग्य तो देव एक ब्रह्म ही है | इसमें यह प्रमाण है - (स ब्रह्म.) जो सब जगत् का कर्त्ता, सर्वशक्‍तिमान् सबका इष्ट, सबको उपासना के योग्य, सब का धारण करने वाला, सबमें व्यापक और सबका कारण है, जिसका आदि अन्त नहीं, और जो सच्चिदानन्दस्वरूप है, जिस का जन्म कभी नहीं होता, और जो कभी अन्याय नही करता, इत्यादि विशेषणों से वेदादि शास्त्रों में जिसका प्रतिपादन किया है, उसी को इष्टदेव मानना चाहिये और जो कोई इससे भिन्न को इष्टदेव मानता है, उसको अनार्य्य अर्थात् अनाड़ी कहना चाहिये | क्योंकि -

(आत्मेत्ये.) इसमें आर्यों का इतिहास शतपथब्राह्मण में है कि परमेश्वर जो सब का आत्मा है, सब मनुष्यों को उसी की उपासना करनी उचित है | इसमें जो कोई कहे कि परमेश्वर को छोड़ के दूसरे में भी ईश्वर बुद्धि से प्रेमभक्ति करनी चाहिए तो उससे कहें कि तू सदा दुःखी होके रोदन करेगा, क्योंकि जो ईश्वर की उपासना करता है वह सदा आनन्द में ही रहता है | जो दूसरे में ईश्वर बुद्धि करके उपासना करता है वह कुछ भी नहीं जानता, इसलिये वह विद्वानों के बीच में पशु अर्थात् गधा के समान है | इससे यह निश्चय हुआ कि आर्य लोग सब दिन एक ईश्वर ही की उपासना करते आये हैं |

(अतः फलिता..)

भाषार्थ - इससे यह सिद्ध हुआ कि 'दिवु' धातु के जो दश अर्थ हैं वे व्यवहार और परमार्थ इन दोनों अर्थों में यथावत् घटते हैं, क्योंकि इनके दोनों अर्थों की योजना वेदों में अच्छी प्रकार से की है | इनमें इतना भेद है कि पूर्वोक्त वसु आदि देवता परमेश्वर के ही प्रकाश से प्रकाशित होते हैं, और परमेश्वर देव तो अपने ही प्रकाश से सदा प्रकाशित हो रहा है | इससे वही सब का पूज्यदेव है | और दिवु धातु के दश अर्थ ये हैं कि - एक क्रीड़ा जो खेलना, दूसरा विजिगीषा जो शत्रुओं को जीतने की इच्छा होना, तीसरा व्यवहार जो कि दो प्रकार का है एक बाहर और दूसरा भीतर का, चौथा निद्रा और पांचवां मद | ये पांच अर्थ मुख्य करके व्यवहार में ही घटते हैं, क्योंकि अग्नि आदि ही पदार्थ व्यवहारसिद्धि के हेतु हैं | परन्तु परमेश्वर का त्याग इसमें भी सर्वथा नहीं होता, क्योंकि वे देव उसी की व्यापकत्ता और रचना से दिव्य गुण वाले हुए हैं | तथा द्युति जो प्रकाश करना, स्तुति जो गुणों का कीर्तन करना, मोद प्रसन्नता, कान्ति जो शोभा, गति जो ज्ञान गमन और प्राप्ति है, ये पांच अर्थ परमेश्वर में मुख्य करके वर्त्तते हैं | क्योंकि इन‌से भिन्न अर्थों में जितने जितने जिन जिन में गुण है उतना उतना ही उनमें देवतापन लिया जाता है | परमेश्वर में तो सर्वशक्‍तिमत्त्वादि सब गुण अनन्त हैं, इससे पूज्यदेव एक वही है |

(क्रमशः)

(महर्षि दयानन्द कृत ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका से संक्षिप्त में उद्धृत)

subodhkumar आदरणी

subodhkumar
आदरणीय मित्र गण,
देवताओं के बारे में ऋग्वेद में ही साफ उपदेश मिलता है कि देवताओं की स्तुति नहीं करनी बनती.इस संदर्भ में ऋग्वेद में आया है,
अयं त एमि तन्वा पुरस्ताद्विश्व देवा अभि मा यन्ति पश्चात् !
यदा मह्यं दीधरो भागमिन्द्रा SSदिन्भया कृणवो वीर्याणि !! ऋग्वेद 8‌/100/1

“मैं” (अविनाशी आत्मा) सब से पहले इस शरीर में प्रकट होता हूं. उस के पश्चात विश्व के सारे देवता मेरी ओर चले आते हैं.
जैसे उदाहरण के लिए इन्द्र मेरे सौभाग्य के लिए मुझ में बहुमुखि पौरुष, अदीनता, निर्भयता से आत्मबल धारण कराता है.
अब इन्द्र कौन है यह भी इसी सूक्त में समझाया गया है.
प्र सु स्तोमं भरत वाजयंत इन्द्राय सत्यं यदि सत्यमस्ति !
नेन्द्रो अस्तीति नेम उ त्व आह क ई ददर्शं कमभि ष्टवाम !! ऋग्वेद 8/100/3
हे सम्पन्नता के अभिलाषी मनुष्यो यदि इन्द्र सचमुच में कोई शक्तिवान है तो अवश्य उस की स्तुति कहो. परन्तु नेम:- तर्कशील बुद्धि तो यह कह्ती है कि इन्द्र कर के कोई नही है. और यदि है तो किस ने इसे देखा है ? यदि नही है तो हम किस की स्तुति करें ?

मनुष्य की आत्मा में सत्प्रेरणा दायक शक्तियां जैसे जैसे स्थापित होती हैं वैसे वैसे वह व्यक्तित्व ‘देवत्व’ धारण करने लगता है.

आदरणीय

आदरणीय सुबोध जी
दूसरे मन्त्र के अर्थ से जो शंका उत्पन्न होती है, उस शंका का निवारण तो आवश्यक है ? क्या सत्प्रेरणा दायक शक्तियां हीं हमें प्रभु की और ले जाती हैं ?

subodhkumar ऋग्वे

subodhkumar
ऋग्वेदादि भाष्यभूमिका में महऋषि ने उपासना काण्ड का विस्तृत विवरण प्रदान किया है. यथा शक्ति अष्टांग योग की साधना ही एक मार्ग समझ में आता है. धारणा ध्यान तक प्रणव जप गायत्री जप की उपलाब्धियों में सत्प्रेरणा आने लगती है. ऐसी स्थिति तक पहुंचने में साधक को कितना समय लगेगा यह कुछ वर्षों से भी अधिक हो सकता है. जप, ध्यान उपासना यज्ञादि अनुकूल स्थिति बनाते हैं. यह व्यक्तिगत अनुभव और प्रयास से सम्बंधित विषय रहेगा. इस से अधिक यहां लिखना अनुचित होगा

आदरणीय

आदरणीय सुबोध जी
निश्चय ही यह ग‍भीर साधना का विषय है तथा व्यक्‍तिगत अनुभव को व्यक्त करना वा अन्यों द्वारा उसे समझ पाना भी तब ही संभव होगा जब व्यक्ति स्वयं ही उसका अनुभव करने का पहले भरपूर प्रयास कर ले | आपने यथोचित एवं सुन्दर मार्गदर्शन कर हमें अनुग्रहित किया, इसके लिए आपका बहुत 2 धन्यवाद |
आनन्द‌